Monday, November 2, 2026
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Caste Census: जनगणना में जाति के कॉलम हेतु प्री-लोडेड OBC ड्रॉप-डाउन मेन्यू नीतिगत फैसला है; नीति-निर्माता ही इस पर निर्णय लें’

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मामले की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ता के तर्क

  1. अधिसूचना और कॉलम 10 का ढांचा:भारत सरकार के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त द्वारा 14 अगस्त 2026 को राजपत्र अधिसूचना (Gazette Notification S. O. 4505(E)) जारी की गई थी, जिसके तहत जनगणना 2027 के जनसंख्या प्रगणन (Population Enumeration) का शेड्यूल तय किया गया। इस अनुसूची के कॉलम नंबर 10 में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा सामान्य जाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए ‘ओपन टेक्स्ट फ़ील्ड’ दिया गया है।
  2. SECC 2011 की विफलता का तर्क:अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर के माध्यम से दायर याचिका में तर्क दिया गया कि ओपन टेक्स्ट फ़ील्ड होने से लोग अपनी जातियों के नाम अलग-अलग वर्तनी (Spellings) और उप-नामों में लिखेंगे, जिससे सोशियो-इकोनॉमिक कास्ट सेंसस 2011 (SECC 2011) की तरह डेटा का दोहराव और विसंगति पैदा होगी। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि प्रगणकों (Enumerators) के डिजिटल ऐप/टूल्स में OBC की मान्यता प्राप्त जातियों की पूर्व-निर्धारित सूची ड्रॉप-डाउन विकल्प के रूप में उपलब्ध कराई जाए।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार), जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948) के तहत गणना प्रपत्रों के प्रारूपण, प्रशासनिक एवं तकनीकी नीति निर्माण में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं (Doctrine of Separation of Powers & Judicial Restraint in Policy Matters), तथा सामाजिक-आर्थिक व जाति जनगणना (SECC 2011) के ऐतिहासिक अनुभवों के विधिक परिप्रेक्ष्य में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने ‘ओबीसी फेडरेशन ऑफ इंडिया’ (OBC Federation of India) द्वारा दायर रिट याचिका पर विचार करते हुए आगामी जनगणना 2027 के डिजिटल टूल्स में जाति संबंधी प्रश्न (कॉलम संख्या 10) के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आधिकारिक सूची का प्री-लोडेड ‘ड्रॉप-डाउन मेन्यू’ (Pre-loaded Drop-Down Menu) शामिल करने का न्यायिक निर्देश देने से इनकार कर दिया।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि गणना प्रपत्र में डिजिटल ड्रॉप-डाउन मेन्यू देना है या ओपन टेक्स्ट फील्ड रखना है, यह शुद्ध रूप से कार्यपालिका का नीतिगत निर्णय (Policy Decision) है, जिसे नीति-निर्माता ही सबसे प्रभावी ढंग से तय कर सकते हैं। न्यायालय ने याचिका के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना याचिकाकर्ता संगठन को भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त (Registrar General and Census Commissioner of India) के समक्ष जाने की छूट प्रदान की और निर्देश दिया कि इस याचिका की एक प्रति उक्त प्राधिकरण को भेजी जाए जिसे उनके औपचारिक अभ्यावेदन (Representation) के रूप में माना जाए।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘उठाया गया मुद्दा मूलतः एक नीतिगत निर्णय है; नीति-निर्माता ही इसका समाधान करें’:

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने तकनीकी और जनगणना प्रारूपण के मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमाओं को रेखांकित करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “हमारी सुविचारित राय में, याचिका में उठाया गया यह विषय अनिवार्य रूप से एक नीतिगत निर्णय (Policy Decision) से संबंधित है, जिसका प्रभावी समाधान नीति-निर्माताओं (Policy Makers) द्वारा ही किया जा सकता है। इसलिए, हम मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई भी राय व्यक्त किए बिना, इस रिट याचिका का निस्तारण करते हैं और याचिकाकर्ता को भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त के समक्ष जाने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। इस याचिका की एक प्रति संबंधित प्राधिकरण को प्रेषित की जाए, जिसे एक औपचारिक अभ्यावेदन (Representation) के रूप में माना जाए, ताकि वह प्राधिकरण याचिकाकर्ता की ओर से उठाए गए मुद्दे पर विधिवत विचार कर सके।”

2. जनगणना टूल्स के प्रारूपण में कार्यपालिका का विशेष अधिकार क्षेत्र:

  • न्यायालय ने माना कि जनगणना किस तकनीक, प्रारूप या डेटा-कलेक्शन मॉड्यूल के आधार पर कराई जाएगी, यह जनगणना संगठन और गृह मंत्रालय के विशेषज्ञ सांख्यिकीविदों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
  • न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत ऐसे तकनीकी मामलों में ‘सर्टिओरारी’ या ‘परमादेश’ जारी कर कार्यपालिका को किसी विशिष्ट सॉफ्टवेयर या डेटाबेस आर्किटेक्चर (जैसे ड्रॉप-डाउन मेन्यू) को पूर्व-निर्धारित करने का आदेश नहीं दे सकता।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं याचिकाकर्ता के दावे
याचिकाकर्ता पक्षओबीसी फेडरेशन ऑफ इंडिया (OBC Federation of India)
प्रतिवादी पक्षभारत संघ, महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त, भारत (RGI)
याचिकाकर्ता के अधिवक्ताअधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर (Advocate Rameshwar Thakur)
विवादित गजट अधिसूचनाअधिसूचना सं. S.O. 4505(E) दिनांक 14 अगस्त 2026 — जिसके द्वारा आगामी जनगणना 2027 के लिए जनसंख्या गणना अनुसूची (Population Enumeration Schedule) अधिसूचित की गई।
विवाद का केंद्र: कॉलम संख्या 10अनुसूची के कॉलम संख्या 10 में ‘अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य जाति’ का विवरण दर्ज करने का प्रावधान है। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा अन्य सभी वर्गों/जातियों के लिए गणना ऐप/टूल में एक ‘ओपन टेक्स्ट फील्ड’ (Open Text Field) दिया गया है, जहां प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जाति का नाम स्वयं अपने शब्दों में प्रगणक (Enumerator) को दर्ज कराना होगा।
याचिकाकर्ता के मुख्य विधिक व तकनीकी तर्क1. SECC 2011 की विफलता दोहराने की आशंका: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यदि ओपन टेक्स्ट फील्ड रखा गया, तो वर्तनी (Spelling), उप-जातियों, कुल-नामों और स्थानीय बोलियों की भिन्नता के कारण डेटा पूरी तरह विकृत हो जाएगा। 2011 की सामाजिक-आर्थिक व जाति जनगणना में ओपन फील्ड के कारण देश भर में 46 लाख से अधिक जातियों/उप-जातियों के नाम दर्ज हो गए थे, जिसके चलते डेटा कभी सार्वजनिक नहीं किया जा सका।
2. मानकीकरण की आवश्यकता: केंद्र और राज्य सरकारों के पास अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की पहले से अधिसूचित और मान्यता प्राप्त सूचियां उपलब्ध हैं। डिजिटल टूल्स में इन सूचियों का एक ‘ड्रॉप-डाउन मेन्यू’ पूर्व-लोड किया जाना चाहिए ताकि प्रगणक और नागरिक सूची से सीधे अपनी जाति का चयन कर सकें।
सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णययाचिका निस्तारित (Disposed of); सीधे परमादेश जारी करने से इनकार; महारजिस्ट्रार को अभ्यावेदन सौंपने की स्वतंत्रता।

विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण: ‘न्यायिक आत्मसंयम बनाम नीतिगत निर्माण’

  • जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत कार्यपालिका का विशेषाधिकार:
    • कानूनन जनगणना के प्रश्नों का चयन, उनका क्रम, और डेटा दर्ज करने के माध्यम (भौतिक रजिस्टर अथवा मोबाइल टैबलेट/ऐप्लिकेशन) का निर्धारण करना केंद्र सरकार और महारजिस्ट्रार का संप्रभु दायित्व है।
    • धारा 8 के तहत नागरिकों का कर्तव्य प्रगणक द्वारा पूछे गए सवालों का उत्तर देना है। प्रपत्र में ड्रॉप-डाउन मेन्यू रखना व्यावहारिक है या नहीं, यह कई तकनीकी कारकों पर निर्भर करता है।
  • ड्रॉप-डाउन मेन्यू की तकनीकी और संवैधानिक चुनौतियां:
    • केंद्रीय बनाम राज्य सूची का टकराव: भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की दोहरी व्यवस्था है—एक केंद्रीय OBC सूची और विभिन्न राज्यों की पृथक राज्य-स्तरीय OBC सूचियां। कई जातियां जो राज्य में OBC हैं, वे केंद्र में अनारक्षित हो सकती हैं।
    • यदि डिजिटल टूल्स में केवल केंद्रीय सूची लोड की जाती है, तो राज्य-सूची के व्यक्ति बाहर हो सकते हैं; और यदि सभी राज्यों की सूचियां मिलाई जाती हैं, तो ड्रॉप-डाउन मेन्यू हजारों प्रविष्टियों के साथ अत्यंत जटिल हो सकता है, जिससे प्रगणकों के लिए फील्ड में काम करना दुष्कर हो जाएगा। यही कारण है कि अदालत ने इसे ‘नीति-निर्माताओं द्वारा हल किए जाने योग्य’ विषय माना।
  • सर्वोच्च न्यायालय का सुस्थापित सिद्धांत (Judicial Restraint):
    • स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम स्टूडेंट-पेरेंट्स एसोसिएशन [(1985) 3 SCC 169] और डी.एन. जीवनराज बनाम महाराष्ट्र राज्य में स्थापित विधि के अनुसार, अदालतें कार्यपालिका को नीति बनाने का निर्देश नहीं दे सकतीं।
    • जब तक कोई सरकारी नियम संविधान के भाग III के किसी मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन न करता हो या प्रत्यक्षतः दुर्भावनापूर्ण न हो, तब तक अदालतें केवल याचिकाकर्ताओं के सुझावों को लागू कराने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप नहीं करतीं।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक मूल रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: ओबीसी फेडरेशन ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) No. … / 2026]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • आदेश की तिथि: 30–31 अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: गुण-दोष पर राय दिए बिना याचिका का निस्तारण; महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त, भारत के समक्ष अभ्यावेदन देने की छूट।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) एवं अनुच्छेद 14
    • जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948) — जनगणना के संचालन और प्रपत्रों के नियमन की शक्तियां
    • गृह मंत्रालय (RGI) राजपत्र अधिसूचना S.O. 4505(E) दिनांक 14.08.2026 — जनगणना 2027 की जनसंख्या गणना अनुसूची (कॉलम संख्या 10)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • जनगणना प्रक्रियाओं और तकनीकी प्रारूपण का विधिक मानक: ‘जनगणना के डिजिटल टूल्स में डेटा दर्ज करने के तकनीकी माध्यम (ओपन टेक्स्ट फील्ड बनाम प्री-लोडेड ड्रॉप-डाउन मेन्यू) का निर्धारण पूरी तरह से कार्यपालिका के नीति-निर्माताओं के प्रशासनिक व सांख्यिकीय विवेक पर निर्भर करता है; अदालतें अनुच्छेद 32 के तहत ऐसे तकनीकी नीतिगत निर्णयों में निर्देश थोपने से न्यायिक आत्मसंयम बरतेंगी; हालांकि, नागरिक और सामाजिक संगठन अपनी व्यावहारिक चिंताओं के समाधान हेतु संबंधित सांविधिक प्राधिकारी (महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त) के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र हैं।’
  • वर्तमान स्थिति व भावी प्रक्रिया: सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के पश्चात अब OBC फेडरेशन ऑफ इंडिया अपनी तकनीकी और सांख्यिकीय चिंताओं को औपचारिक रूप से भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त के समक्ष रखेगा; जनगणना 2027 के लिए डिजिटल टूल्स में ड्रॉप-डाउन मेन्यू शामिल करने का अंतिम तकनीकी और प्रशासनिक निर्णय अब पूरी तरह से केंद्र सरकार और जनगणना निदेशालय के नीतिगत मूल्यांकन के अधीन रहेगा।

Caste Census:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना
याचिकाकर्ताओबीसी फेडरेशन ऑफ इंडिया (OBC Federation of India) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर
संबंधित विषय14 अगस्त 2026 को अधिसूचित जनगणना 2027 के कॉलम नंबर 10 (जाति विवरण) में OBC जातियों का पूर्व-लोड ड्रॉप-डाउन मेनू शामिल करना।
मूल विवादकॉलम 10 में SC/ST के अलावा ‘ओपन टेक्स्ट फील्ड’ (Open Text Field) रखा गया है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जाति खुद लिखनी होगी।
अदालत का फैसलायाचिका का निपटारा: कोर्ट ने इसे नीतिगत विषय माना और महारजिस्ट्रार को याचिका की प्रति अभ्यावेदन के रूप में भेजकर विचार करने की छूट दी।

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