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मामले की पृष्ठभूमि और पक्षकारों के तर्क
- इंस्टाग्राम से संपर्क और विवाह का वादा:शिकायतकर्ता (वयस्क महिला) ने आरोप लगाया कि आरोपी डॉक्टर ने नवंबर 2025 में इंस्टाग्राम के माध्यम से उससे संपर्क किया और शादी का झूठा वादा किया। पीड़िता का आरोप है कि आरोपी ने 21 दिसंबर 2025, 8 मार्च 2026 और 3 जून 2026 को उसके साथ बलपूर्वक शारीरिक संबंध बनाए तथा 11 अप्रैल 2026 को खुद को नुकसान पहुँचाने की धमकी देकर ऐसा करने का प्रयास किया।
- अदालती घटनाक्रम और फोन गुम होने की कहानी:आरोपी को 30 जुलाई 2026 को पटना में हिरासत में लिया गया था, लेकिन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) पटना ने प्रक्रियात्मक आधारों पर ट्रांजिट रिमांड देने से इंकार कर उसे रिहा कर दिया। साकेत सत्र अदालत द्वारा 10 अगस्त 2026 को अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद, हाईकोर्ट ने 17 अगस्त को उसे अंतरिम राहत दी थी। राज्य सरकार ने इस राहत को रद्द करने की मांग की।
- सबूत मिटाने के आरोप:जांच के दौरान आरोपी ने दावा किया कि उसका मोबाइल फोन चाकू की नोक पर छीन लिया गया था। हालांकि, उसने इस संबंध में पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। इंस्टाग्राम मैसेज डिलीट होने और फोन गायब होने की संदिग्ध परिस्थितियों ने उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
हाईकोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष और धारा 69 BNS का दायरा
1. धारा 69 BNS बनाम धारा 64 BNS (बलात्कार):
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNS की धारा 69 (झूठे वादे या पहचान छिपाकर शारीरिक संबंध बनाना) एक अवशेषी प्रावधान (Residual Provision) है। जहाँ पीड़िता विशिष्ट तिथियों पर जबरन संबंध बनाने (बल प्रयोग) का स्पष्ट आरोप लगाती है, वहाँ मामला केवल शादी के झूठे वादे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे धारा 64 (बलात्कार) के तहत आता है।
2. हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता:
अदालत ने माना कि पीड़िता के BNSS की धारा 183 के तहत दर्ज बयान, मेडिकल परीक्षण रिपोर्ट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR), लोकेशन डेटा और होटल रिकॉर्ड्स प्राथमिक रूप से उसके आरोपों का समर्थन करते हैं। मोबाइल फोन गायब होने के आरोपी के असंदिग्ध स्पष्टीकरण को देखते हुए, मामले की निष्पक्ष जांच और डिजिटल साक्ष्यों की पुनर्प्राप्ति के लिए हिरासत में लेकर पूछताछ (Custodial Interrogation) आवश्यक है।
नई दिल्ली: भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 63 (स्पष्टीकरण 2) (सहमति की विधिक परिभाषा—महिला के शारीरिक या मौखिक प्रतिरोध न करने को संभोग की वैध सहमति नहीं माना जा सकता), धारा 64(1) व धारा 64(2)(m) (बलात्कार—बार-बार एक ही महिला से दुष्कर्म), धारा 69 (विवाह के झूठे वादे या भ्रामक साधनों से यौन संबंध बनाने का अवशिष्ट/रेसिड्यूअल अपराध), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 183 (मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान / पूर्व CrPC धारा 164), तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से छेड़छाड़ (Tampering with electronic evidence / Deletion of Instagram chats) के मामलों में हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) की अनिवार्यता पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं नज़ीरी फैसला सुनाया है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सचिन दत्ता (Justice Sachin Datta) की एकल पीठ ने एक स्नातकोत्तर (MD/MS) मेडिकल छात्र/रेजिडेंट डॉक्टर की अग्रिम जमानत याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। साथ ही अदालत ने 17 अगस्त 2026 को अभियुक्त को दी गई अंतरिम गिरफ्तारी संरक्षण (Interim Protection) को भी औपचारिक रूप से रद्द (Vacate) कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि भले ही पक्षों के बीच समग्र संबंध सहमति-आधारित (Consensual Relationship) रहे हों, किंतु वह तथ्य प्राथमिकी (FIR) में निर्दिष्ट विशिष्ट तारीखों पर जबरन शारीरिक संबंध (Forcible Intercourse) के लगाए गए ठोस आरोपों का उत्तर नहीं हो सकता। खंडपीठ ने दो-टूक कहा कि किसी रिश्ते में रहने की सहमति को उस रिश्ते के दौरान होने वाले प्रत्येक शारीरिक कृत्य के लिए सहमति नहीं माना जा सकता। अदालत ने पाया कि मोबाइल फोन लूटने की मनगढ़ंत कहानी और इंस्टाग्राम चैट को डिलीट करने का आचरण अभियुक्त की विश्वसनीयता को समाप्त करता है, जिसके चलते निष्पक्ष जांच हेतु उसकी कस्टोडियल पूछताछ अनिवार्य है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘रिश्ते में सहमति का अर्थ हर कृत्य की सहमति नहीं; धारा 63 BNS का स्पष्टीकरण 2’
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने सहमति के विधिक सिद्धांत का विश्लेषण करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “संबंधों की सहमति-आधारित प्रकृति, भले ही इसे मान लिया जाए, अपने आप में प्राथमिकी में दर्ज और धारा 183 BNSS के तहत शिकायतकर्ता के बयान में दोहराई गई निर्दिष्ट तारीखों पर जबरन शारीरिक संबंध (Allegation of force on identified dates) के विशिष्ट आरोपों का समाधान नहीं करती है। इस संबंध में यह विशेष रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए कि किसी रिश्ते के लिए सहमति होना उसके भीतर के प्रत्येक कृत्य के लिए सहमति होने के समतुल्य (Consent to a relationship is not tantamount to consent to each act within it) नहीं है।”
2. धारा 69 BNS एक अवशिष्ट (Residual) प्रावधान है; जहां जबरदस्ती हो वहां बलात्कार की धाराएं लागू होंगी:
- अदालत ने BNS की धारा 69 (शादी के झूठे वादे पर संभोग) और धारा 64 (बलात्कार) के पारस्परिक संबंध की व्याख्या की:“धारा 69 BNS एक अवशिष्ट (Residual) प्रावधान के रूप में कार्य करती है और यह केवल तभी लागू होती है जब कोई कृत्य बलात्कार के अपराध के दायरे में नहीं आता हो। जहाँ शिकायतकर्ता ने स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट अवसरों पर अपनी सहमति से इनकार किया है और बल प्रयोग का आरोप लगाया है, वहाँ केवल शादी के झूठे वादे (False promise of marriage) का प्रश्न ही नहीं उठता; वह मामला सीधे तौर पर धारा 64 BNS के तहत बलात्कार का अपराध बनता है।”
3. मोबाइल फोन ‘छिनने’ की मनगढ़ंत कहानी और डिजिटल साक्ष्यों का विलोपन:
- अभियुक्त ने बचाव में दावा किया था कि उसका फोन चाकू की नोक पर छीन लिया गया था, जिसके कारण वह चैट और इंस्टाग्राम रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका।
- अदालत ने इस दावे को पूरी तरह अविश्वसनीय पाया:“चाकू की नोक पर मोबाइल फोन छीने जाने के संबंध में रिकॉर्ड पर कोई भी पुलिस शिकायत (FIR/NCR) प्रस्तुत नहीं की गई। इसके विपरीत, परिस्थितियां दर्शाती हैं कि महत्वपूर्ण इंस्टाग्राम संदेशों को जानबूझकर हटाया और डिलीट किया गया था, जो अभियुक्त की विश्वसनीयता (Credibility) पर गंभीर आघात पहुंचाता है।”
4. जांच में शामिल होना कस्टडी से बचने का पूर्ण आधार नहीं:
- अदालत ने दोहराया कि अग्रिम जमानत एक असाधारण उपाय (Extraordinary Remedy) है जो केवल असाधारण मामलों में ही दी जा सकती है। केवल जांच में शामिल हो जाना (Joining the investigation) बाद में हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (नवंबर 2025 – अक्टूबर 2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक संदर्भ |
| आरोपी/याचिकाकर्ता | स्नातकोत्तर चिकित्सा छात्र (Doctor/PG Medical Student) |
| शिकायतकर्ता | एक वयस्क महिला, जिससे डॉक्टर ने शादी का झांसा देकर संपर्क स्थापित किया था। |
| प्राथमिकी (FIR) | 29 जुलाई 2026 को दर्ज। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64(1) (बलात्कार), धारा 69 (धोखा देकर संभोग), धारा 351(2) (आपराधिक धमकी), और धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) के तहत मामला दर्ज हुआ। बाद में जांच के आधार पर धारा 64(2)(m) (एक ही महिला के साथ बार-बार संभोग/बलात्कार) जोड़ी गई। |
| विशिष्ट घटनाएं (तारीख-वार आरोप) | 1. 21 दिसंबर 2025, 8 मार्च 2026, और 3 जून 2026: इन तीन निर्दिष्ट तारीखों पर होटल/कमरे में जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए। 2. 11 अप्रैल 2026: बलात्कार का असफल प्रयास किया गया और विरोध करने पर अभियुक्त ने स्वयं को चोट पहुंचाने (आत्महत्या/Self-harm) की धमकी दी। |
| पटना में ट्रांजिट रिमांड का विवाद | 30 जुलाई 2026 को दिल्ली पुलिस ने आरोपी को पटना (बिहार) में हिरासत में लिया, किंतु मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), पटना ने तकनीकी और प्रक्रियात्मक आधारों पर ट्रांजिट रिमांड देने से इनकार कर उसे रिहा कर दिया था। |
| साकेत सेशंस कोर्ट | 10 अगस्त 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (साकेत कोर्ट) ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टर की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी। |
| हाईकोर्ट में अंतरिम सुरक्षा | दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 अगस्त 2026 को आरोपी को अंतरिम सुरक्षा (गिरफ्तारी पर रोक) प्रदान की थी, जिसे 17 सितंबर 2026 को आगे बढ़ाया गया था। राज्य सरकार (अभियोजन) ने इस अंतरिम सुरक्षा को वापस लेने की औपचारिक अर्जी लगाई थी। |
| समर्थक साक्ष्य | पीड़िता का धारा 183 BNSS (मजिस्ट्रेट के समक्ष) बयान, मेडिकल रिपोर्ट, होटल के प्रवेश व निकास रजिस्टर, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), मोबाइल टॉवर लोकेशन और आरोपी द्वारा पूर्व में भेजे गए संदेश। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | अग्रिम जमानत याचिका खारिज (Dismissed); 17 अगस्त 2026 का अंतरिम संरक्षण आदेश निरस्त (Vacated); पुलिस को हिरासत में लेकर पूछताछ की खुली छूट। |
विधिक एवं दंडात्मक विश्लेषण: ‘BNS की धारा 63 व 69 और सहमति का विधिक दायरा’
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 63 (स्पष्टीकरण 2) का प्रभाव:
- BNS की धारा 63 के स्पष्टीकरण 2 में स्पष्ट रूप से यह विधायी सिद्धांत शामिल किया गया है कि “सहमति” का अर्थ एक स्पष्ट, स्वतंत्र और स्वैच्छिक सहमति है।
- केवल इसलिए कि कोई महिला किसी पुरुष के साथ प्रेम संबंध में है, लिव-इन में रह रही है, या अतीत में उनके बीच सहमति से संबंध बने थे, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भविष्य के प्रत्येक अवसर पर उसकी सहमति अंतर्निहित है। किसी विशेष दिन या क्षण पर महिला द्वारा किया गया ‘ना’ या विरोध उस कृत्य को सीधे बलात्कार की श्रेणी में ले आता है।
- धारा 69 BNS का सही विधिक दायरा:
- भारतीय दंड संहिता (IPC) में शादी के झूठे वादे पर संबंध बनाने के मामलों को धारा 375/376 के तहत ‘तथ्य की भूल’ (Section 90 IPC) के सहारे निपटाया जाता था। BNS में धारा 69 को एक अलग अपराध के रूप में लाया गया है।
- हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 69 केवल उन मामलों के लिए है जहाँ संबंध पूरी तरह ‘धोखे’ के आधार पर सहमति से बने हों, किंतु उनमें कोई शारीरिक बलप्रयोग या जबरदस्ती न रही हो। यदि पीड़िता यह साबित करती है कि उसके साथ हाथ-पैर पकड़कर या धमकी देकर जबरन संबंध बनाए गए, तो वह धारा 69 का हल्का मामला नहीं बल्कि धारा 64 का पूर्ण बलात्कार है।
- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नष्ट करने पर कस्टोडियल रिमांड:
- उच्चतम न्यायालय ने स्टेट रिप्रेजेंटेड बाय सीबीआई बनाम अनिल शर्मा और सुशीला अग्रवाल मामलों में तय किया है कि जहाँ अपराध डिजिटल बातचीत (सोशल मीडिया, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम) से जुड़ा हो और आरोपी ने सबूत मिटाने के उद्देश्य से डिवाइस बदल दिया हो, वहाँ निष्पक्ष जांच के लिए पुलिस हिरासत अनिवार्य हो जाती है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (आपराधिक अपीलीय/जमानत क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: अग्रिम जमानत आवेदन [Bail Appln. No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति सचिन दत्ता (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: अक्टूबर–नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: अग्रिम जमानत याचिका खारिज; 17 अगस्त 2026 को दिया गया गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण का आदेश पूरी तरह रद्द।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (अभियुक्त डॉक्टर) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मोहित माथुर (Senior Advocate Mohit Mathur) एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विधा दत्ता मखीजा (Senior Advocate Vidha Datta Makhija)।
- प्रतिवादी (शिकायतकर्ता/पीड़िता) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता वारिशा फरासत (Senior Advocate Warisha Farasat)।
- राज्य सरकार (NCT ऑफ दिल्ली) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 63 (स्पष्टीकरण 2) — बलात्कार की परिभाषा एवं वैध सहमति के मानदंड
- धारा 64(1) — बलात्कार हेतु दंडात्मक प्रावधान
- धारा 64(2)(m) — एक ही महिला के साथ बार-बार बलात्कार करना
- धारा 69 — विवाह के झूठे वादे या कपटपूर्ण साधनों द्वारा संभोग
- धारा 351(2) — आपराधिक धमकी
- धारा 115(2) — स्वेच्छा से चोट पहुंचाना
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- धारा 183 — मजिस्ट्रेट द्वारा बयानों की रिकॉर्डिंग (पूर्व CrPC धारा 164)
- धारा 482 — अग्रिम जमानत के विशेष प्रावधान (पूर्व CrPC धारा 438)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सहमति और अग्रिम जमानत का विधिक मानक: ‘किसी रिश्ते में रहने की सामान्य सहमति उस रिश्ते के दौरान होने वाले प्रत्येक शारीरिक कृत्य के लिए सहमति नहीं मानी जा सकती; यदि किसी महिला ने विशिष्ट तिथियों पर जबरन शारीरिक संबंध बनाने के ठोस आरोप लगाए हैं, तो मामला केवल शादी के वादे (धारा 69 BNS) का नहीं रहता बल्कि धारा 64 BNS के तहत बलात्कार बनता है; जहाँ आरोपी ने डिजिटल चैट नष्ट की हों और फोन चोरी होने का संदेहास्पद बहाना बनाया हो, वहाँ अग्रिम जमानत देकर जांच एजेंसी के हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।’
- वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा अंतरिम सुरक्षा हटाए जाने के बाद दिल्ली पुलिस अब अभियुक्त डॉक्टर को गिरफ्तार कर रिमांड पर लेने और डिलीट की गई इंस्टाग्राम चैट तथा इलेक्ट्रॉनिक डेटा को फॉरेंसिक लैब (FSL) के जरिए रिकवर करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
Instagram chats: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court), नई दिल्ली |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सचिन दत्ता (Justice Sachin Datta) |
| याचिकाकर्ता (आरोपी) | पीजी मेडिकल छात्र (डॉक्टर) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता मोहित माथुर एवं विधा दत्ता मखीजा |
| शिकायतकर्ता/राज्य पक्ष | वयस्क पीड़िता एवं राज्य (NCT of Delhi) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता वारिशा फरासत |
| दर्ज मामला/कानूनी धाराएं | BNS धाराएं: 64(1) [बलात्कार], 64(2)(m), 69 [छल से शारीरिक संबंध], 351(2) [आपराधिक धमकी] और 115(2) [स्वेच्छा से चोट पहुंचाना]। FIR दिनांक 29 जुलाई 2026। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | अग्रिम जमानत निरस्त: 17 अगस्त 2026 की अंतरिम सुरक्षा वापस ली गई; आरोपी से हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) की आवश्यकता को उचित ठहराया गया। |

