Sunday, November 1, 2026
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Manipulation of consent: रिश्ते में खटास आने मात्र से पूर्व की शारीरिक निकटता को बलात्कार नहीं कहा जा सकता; आपराधिक कानून व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने का हथियार नहीं

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मामले के मुख्य तथ्य और सर्वोच्च न्यायालय के निष्कर्ष

  1. पहले से शादीशुदा होने की जानकारी:अदालत ने पाया कि महिला को साथ रहने के कुछ ही महीनों के भीतर आरोपी के भाई के माध्यम से उसकी पहली शादी और दो बच्चों के बारे में पता चल गया था। इसके बावजूद वह वर्षों तक साथ रही। कोर्ट ने माना कि यह मानना अविश्वसनीय है कि वह केवल आरोपी के मौखिक आश्वासनों के आधार पर खुद को उसकी कानूनी पत्नी मानती रही।
  2. सहमति का पूर्वव्यापी अपराधीकरण (Retrospective Combing):शीर्ष अदालत ने हाल के वर्षों में बढ़ रहे एक चिंताजनक रुझान को रेखांकित किया, जहाँ समाप्त हो चुके सहमति वाले संबंधों को बाद में छानबीन करके यौन हिंसा का रूप दे दिया जाता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना पुरुषों की एजेंसी और स्वायत्तता को पूरी तरह छीन लेता है, क्योंकि एक बार सहमति से संबंध बनाने के बाद व्यक्ति बाद में बलात्कार के आरोप के डर से रिश्ते में बंधने को मजबूर हो जाएगा।
  3. बलात्कार जैसे गंभीर अपराध की गरिमा:पीठ ने कहा कि बलात्कार एक अत्यंत जघन्य अपराध है और इसे केवल उन्हीं मामलों तक सीमित रखा जाना चाहिए जहाँ वास्तविक यौन हिंसा, ज़बरदस्ती या सहमति का छल-कपट (Manipulation of consent) हुआ हो। जब हर टूटे हुए सहमति के रिश्ते को बलात्कार में बदला जाता है, तो यह न केवल अपराध की गंभीरता को कम करता है, बल्कि आरोपी को अपूरणीय कलंक और अन्याय की ओर धकेलता है।

नई दिल्ली: भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376 (बलात्कार), धारा 420 (धोखाधड़ी), धारा 493 (विधिपूर्वक विवाहित होने का प्रवंचनापूर्ण विश्वास दिलाकर सहवास), धारा 494 व 495 (द्विविवाह / Bigamy), संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘वयस्क स्वायत्तता एवं चयन की स्वतंत्रता’ (Adult Autonomy, Agency & Free Choice), तथा लंबे समय तक चले सहमति-आधारित संबंधों (Consensual Live-in Relationships) के कटुतापूर्ण अंत पर आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण, दूरगामी और नज़ीरी फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना (Justice B.V. Nagarathna) और न्यायमूर्ति आर. महादेवन (Justice R. Mahadevan) की खंडपीठ ने केरल उच्च न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसने अभियुक्त के विरुद्ध लंबित बलात्कार व धोखाधड़ी के आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया था। शीर्ष अदालत ने मामले में दर्ज प्राथमिकी (FIR) और आरोप-पत्र (Charge-sheet) को खारिज करते हुए अभियुक्त को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

पीठ ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि अदालतों को देश के नागरिकों द्वारा अपनी स्वतंत्र इच्छा, स्वायत्तता और निर्णय क्षमता के विभिन्न प्रयोगों पर कोई ‘नैतिक निर्णय’ (Moral Judgement) देने का दायित्व नहीं सौंपा गया है। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि हाल के वर्षों में सहमति से बने रिश्तों के टूटने के बाद पिछली शारीरिक अंतरंगता को पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospectively) से ‘बलात्कार’ के रूप में ब्रांड करने की चिंताजनक प्रवृत्ति बढ़ी है, जो आपराधिक न्याय प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग है।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘आपराधिक कानून का उपयोग व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने या बदला लेने के लिए नहीं हो सकता’

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना द्वारा लिखे गए ऐतिहासिक निर्णय में खंडपीठ ने आपराधिक न्यायशास्त्र की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए दर्ज किया: “वयस्क पुरुष और महिलाएं स्वतंत्र रूप से ऐसे निर्णय ले सकते हैं जो बुद्धिमानी भरे हों या नासमझी भरे, विवेकपूर्ण हों या लापरवाह, और विचारशील हों या संवेदनहीन। इन निर्णयों के स्वाभाविक परिणाम होंगे, शायद अवांछनीय परिणामों या अप्रत्याशित संभावनाओं के रूप में, जिनमें से कुछ गहरे आहत करने वाले भी हो सकते हैं। किंतु इनमें से कोई भी बात उन निर्णयों और उनके परिणामस्वरूप बनी परिस्थितियों को स्वतः ऐसे आपराधिक अपराधों में तब्दील नहीं कर देगी जिसके लिए राज्य की आपराधिक मशीनरी के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। आपराधिक कानून का उपयोग व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने, बदला लेने या किसी व्यक्ति को किसी विशेष तरीके से कार्य करने के लिए विवश करने के लिए गोला-बारूद (Munitions) के रूप में नहीं किया जा सकता।”

2. ‘सहमति के बाद संबंध खराब होने पर बलात्कार का आरोप लगाना घोड़े के आगे गाड़ी बांधने जैसा’:

  • पीठ ने संबंधों के कटुतापूर्ण अंत पर बलात्कार के आरोपों के विधिक खोखलेपन को रेखांकित किया:“मात्र यह तथ्य कि रिश्ता कड़वाहट और कटुता में बदल गया, अपने आप में यौन कृत्यों के लिए पहले दी गई सहमति को बलात्कार के अपराध में परिवर्तित नहीं कर सकता। ऐसा निष्कर्ष निकालना वस्तुतः ‘घोड़े के आगे गाड़ी बांधना’ (Putting the cart before the horse) होगा—अर्थात रिश्ते के परिणाम के आधार पर पूर्व सहमति के कृत्य को अपराध का रूप दे देना।”

3. ‘ब्रेकअप के बाद रिश्तों को बारीकी से खंगालना चिंताजनक प्रवृत्ति; पुरुष की स्वायत्तता का हनन’:

  • सुप्रीम कोर्ट ने हालिया कानूनी प्रवृत्तियों पर गंभीर चिंता जताई:“हाल के वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति देखी जा रही है, जहां समाप्त हो चुके सहमति-आधारित रिश्तों को बाद में अत्यंत बारीकी से खंगाला जाता है ताकि यह तलाशा जा सके कि घटना के बाद (Post-facto) किसे हिंसा या यौन उत्पीड़न का रूप दिया जा सकता है।ऐसे रिश्तों को गैर-सहमति वाला मानना पुरुष की स्वायत्तता और एजेंसी को पूरी तरह छीन लेता है, क्योंकि एक समय सहमति के रिश्ते में रहने मात्र का तथ्य ही उसे भविष्य में बलात्कार के आरोप के भय के तहत हमेशा के लिए उस रिश्ते से बंधे रहने को मजबूर कर देगा।”

4. ‘बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को वास्तविक यौन हिंसा के लिए आरक्षित रखा जाना चाहिए’:

  • अदालत ने अपराध की गंभीरता और झूठे मुकदमों के सामाजिक प्रभाव पर कहा:“बलात्कार एक अत्यंत जघन्य अपराध है और इसे उन वास्तविक परिस्थितियों के लिए आरक्षित रखा जाना चाहिए जहाँ वास्तविक यौन हिंसा, जबरदस्ती या सहमति में छल-कपट हुआ हो। जब प्रत्येक सहमति-आधारित संबंध जो बाद में खराब हो जाता है, बलात्कार के आरोप में बदल दिया जाता है, तो यह न केवल अपराध की गंभीरता को कम करता है बल्कि स्वयं अपराध के आरोप को ही नकार देता है। यह अभियुक्त को अपूरणीय कलंक, उत्पीड़न और घोर अन्याय के गर्त में धकेल देता है। अदालतों को पूरे रिश्ते को उसके अंत के चश्मे से देखने के बजाय समग्रता (Holistically) में देखना चाहिए।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (1996–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
अभियुक्त / अपीलकर्ताएक विवाहित पुरुष, जिसके अपनी पहली पत्नी से दो बच्चे थे।
शिकायतकर्ता महिलाएक वयस्क तलाकशुदा महिला, जिसने मैसूर के एक मंदिर में कथित विवाह के बाद अभियुक्त के साथ 1996 से 2003 तक लगातार सहवास किया।
महिला का मूल आरोपमहिला ने आरोप लगाया कि अभियुक्त ने स्वयं को कुंवारा (अविवाहित) बताकर उसे धोखे में रखा और शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए, जो कानूनन बलात्कार और धोखाधड़ी है।
रिकॉर्ड पर महत्वपूर्ण तथ्यमहिला ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि सहवास शुरू करने के कुछ ही महीनों के भीतर अभियुक्त के सगे भाई ने उसे बता दिया था कि वह पहले से विवाहित है।
सुप्रीम कोर्ट का मूल्यांकनअदालत ने पाया कि यह जानने के बावजूद कि पुरुष पहले से विवाहित है, महिला का केवल मौखिक आश्वासनों के आधार पर स्वयं को उसकी कानूनी पत्नी मानते रहना अविश्वसनीय और विधिक रूप से अस्वीकार्य (Untenable and Incredulous) है। यह स्पष्ट रूप से एक सहमति-आधारित संबंध था जिसे सामाजिक बदनामी या जांच से बचने के लिए ‘विवाह’ का रूप दिया गया था, जो अंततः 2003 में समाप्त हो गया।
लागू धाराएंभारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार), 420 (धोखाधड़ी), 493 (कपटपूर्वक विवाह का विश्वास दिलाकर संभोग), 494 व 495 (द्विविवाह)।
शीर्ष अदालत का अंतिम आदेशअपील स्वीकार (Allowed); दर्ज प्राथमिकी और आरोप-पत्र के तहत लगाए गए अपराधों के बुनियादी तत्व पूरी तरह नदारद पाए गए; आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करते हुए अभियुक्त को बरी किया गया।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘तथ्य की भूल (धारा 90 IPC) बनाम वयस्क सहमति’

  • धारा 90 IPC और सहमति का विधिक स्वरूप:
    • धारा 90 के अनुसार, किसी भय या ‘तथ्य की भूल’ (Misconception of Fact) के तहत दी गई सहमति कानून की नजर में वैध सहमति नहीं होती।
    • किंतु प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य [(2019) 9 SCC 608] में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि तथ्य की भूल स्थापित करने के लिए यह साबित होना चाहिए कि अभियुक्त ने शुरू से ही दुर्भावनापूर्ण इरादे से झूठा वादा किया था और वादे का झूठा होना ही महिला द्वारा सहमति देने का एकमात्र प्रत्यक्ष कारण था।
  • सच्चाई का ज्ञान हो जाने के बाद सहमति का प्रभाव:
    • प्रस्तुत मामले में, भले ही 1996 में शुरुआत में पुरुष ने अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाई हो, किंतु कुछ ही महीनों में महिला को उसके पूर्व विवाह की पूरी जानकारी हो चुकी थी।
    • इस तथ्य का ज्ञान हो जाने के बावजूद महिला ने वर्ष 2003 तक (लगभग 7 वर्षों तक) उसी पुरुष के साथ अपनी मर्जी से वैवाहिक आवरण में सहवास जारी रखा। कानूनन, यह आचरण साबित करता है कि बाद के वर्षों में शारीरिक संबंध किसी धोखे या तथ्य की भूल के अधीन नहीं थे, बल्कि यह दो वयस्कों का स्वतंत्र, सचेत और सहमति-आधारित निर्णय था।
  • आपराधिक न्याय प्रणाली की शुचिता:
    • शीर्ष अदालत ने न्यायिक बिरादरी को आगाह किया कि अदालतों को व्यक्तियों के नैतिक आचरण या सामाजिक मानदंडों पर टिप्पणी करने के बजाय आपराधिक संविधियों के कड़े तकनीकी तत्वों की जांच करनी चाहिए।
    • जब कोई वयस्क महिला पूर्ण ज्ञान के साथ किसी विवाहित पुरुष के साथ वर्षों तक लिव-इन में रहती है, तो संबंध टूट जाने पर पुरुष पर बलात्कार का आरोप लगाना आपराधिक न्याय प्रणाली का दुरुपयोग है, जिसे न्यायालयों द्वारा हतोत्साहित किया जाना चाहिए।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • पीठ: न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन
  • निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: अपील स्वीकार; केरल उच्च न्यायालय का आदेश निरस्त; अभियुक्त के विरुद्ध IPC की धारा 376, 420, 493, 494 और 495 के तहत दर्ज प्राथमिकी और आरोप-पत्र पूर्णतः रद्द।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वायत्तता एवं निजता का अधिकार)
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC):
      • धारा 375 व 376 — बलात्कार की परिभाषा एवं दंड (BNS 2023 की धारा 63 व 64)
      • धारा 90 — तथ्य की भूल या भय के तहत दी गई सहमति (BNS 2023 की धारा 29)
      • धारा 420 — धोखाधड़ी (Cheating)
      • धारा 493 — विधिपूर्वक विवाहित होने का प्रवंचनापूर्ण विश्वास दिलाकर संभोग
      • धारा 494 व 495 — पूर्व पति या पत्नी के जीवित रहते हुए विवाह करना (द्विविवाह)
    • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 482 (कार्यवाही रद्द करने की उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति / BNSS धारा 528)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • दीर्घकालिक सहमति संबंध और बलात्कार के आरोप का विधिक मानक: ‘वयस्क व्यक्तियों के बीच लंबे समय तक चला शारीरिक संबंध, जो बाद में आपसी कड़वाहट या मतभेदों के कारण टूट जाता है, केवल संबंध समाप्त होने के आधार पर पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospectively) से बलात्कार के अपराध में परिवर्तित नहीं किया जा सकता; जहाँ महिला को साथी के पूर्व विवाह की वास्तविक जानकारी होने के बावजूद वर्षों तक सहवास जारी रहा हो, वहाँ ‘तथ्य की भूल’ के आधार पर सहमति के अभाव का दावा विधिक रूप से टिकाऊ नहीं है; आपराधिक कानून का उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध या सामाजिक हिसाब चुकता करने के हथियार के रूप में करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम आदेश के बाद अभियुक्त के विरुद्ध चल रहा बहु-वर्षीय आपराधिक विचारण (ट्रायल) औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है; यह निर्णय देश भर की अदालतों के लिए लिव-इन और सहमति-आधारित रिश्तों के टूटने पर दर्ज होने वाले बलात्कार के मामलों में एक अत्यंत मार्गदर्शक और बाध्यकारी न्यायिक नज़ीर के रूप में कार्य करेगा।

Manipulation of consent: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन
मूल अपराध/कानूनी धाराएंIPC की धारा 376 (बलात्कार), 420 (धोखाधड़ी), 493, 494 और 495 (द्विविवाहित/द्वितीय विवाह)।
मामले की पृष्ठभूमिआरोपी (विवाहित पुरुष) और पीड़िता (तलाकशुदा महिला) 1996 से 2003 तक मैसूर के एक मंदिर में कथित विवाह के बाद साथ रहे। महिला का आरोप था कि पुरुष ने कुंवारा बताकर संबंध बनाए।
हाईकोर्ट का रुखकेरल हाईकोर्ट (Kerala High Court) ने आरोपी को राहत देने से इंकार कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
अदालत का अंतिम निर्णयप्राथमिकी और अवमानना/आपराधिक कार्यवाही रद्द: अपराध के आवश्यक घटक (Ingredients) अनुपस्थित; संबंध पूरी तरह सहमति से बना था।
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