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मामले की पृष्ठभूमि और पुलिस जांच
- घटना और विवाद का कारण:31 जनवरी 2021 की शाम उत्तम नगर के विजय नगर में मनोज कुमार झा नामक व्यक्ति की छाती में चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना से एक दिन पहले मृतक और उसके रिश्तेदार ने आरोपी अभिषेक शर्मा और एक विधि का उल्लंघन करने वाले किशोर (CCL) को प्लॉट में नशा करने से मना किया था।
- पारिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence):घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी (Eyewitness) नहीं था। पुलिस ने सीसीटीवी (CCTV) फुटेज और भागते हुए देखे जाने के साक्ष्यों के आधार पर अभिषेक शर्मा को गिरफ्तार किया। किशोर (CCL) के पास से बटनदार चाकू और दोनों के खुलासे के आधार पर जले हुए कपड़ों के अवशेष बरामद हुए थे।
उच्च न्यायालय के मुख्य विधिक निष्कर्ष
1. धारा 34 (सामान्य इरादा) का सीमित दायरा:
अदालत ने Constable 907 Surendra Singh v. State of Uttarakhand मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि केवल किसी ऐसे व्यक्ति के साथ चलना जिसके हाथ में हथियार हो, स्वचालित रूप से हत्या की साजिश या इरादे का प्रमाण नहीं बन जाता।
2. धारा 326/34 IPC का दायरा:
कोर्ट ने माना कि आरोपी का किशोर (CCL) के साथ जाना, जिसके पास चाकू था, यह तो सिद्ध करता है कि उसका इरादा खतरनाक हथियार से गंभीर चोट (Grievous Hurt) पहुँचाने का था। अतः उसे केवल धारा 326/34 IPC के तहत ही उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, न कि धारा 302/34 IPC के तहत।
3. सबूत मिटाने (धारा 201/34 IPC) की सजा बरकरार:
हाईकोर्ट ने धारा 201/34 (साक्ष्य नष्ट करने) के तहत 3 साल की सजा को बरकरार रखा, क्योंकि आरोपी इस अवधि को पहले ही पूरा कर चुका था।
नई दिल्ली: भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 34 (सामान्य आशय / Common Intention—प्रतिनिधिक दायित्व का विधिक मानक), धारा 302 (हत्या के लिए दंड) बनाम धारा 326 (खतरनाक हथियारों या साधनों से स्वेच्छा से गंभीर उपहति कारित करना), धारा 201 (अपराध के साक्ष्य को विलोपित करना), आपराधिक न्यायशास्त्र में ‘मस्तिष्क का पूर्व-मिलन’ (Prior Meeting of Minds) एवं ‘प्रत्यक्ष कृत्य’ (Overt Act) की अनिवार्यता, तथा परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) के मूल्यांकन पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नज़ीरी फैसला सुनाया है।
दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह (Justice Prathiba M. Singh) और न्यायमूर्ति विकास महाजन (Justice Vikas Mahajan) की खंडपीठ ने निचली अदालत (द्वारका कोर्ट) द्वारा हत्या के आरोप में सुनाई गई उम्रकैद की सजा के खिलाफ अपीलकर्ता अभिषेक शर्मा (Abhishek Sharma) की आपराधिक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।
खंडपीठ ने व्यवस्था दी कि किसी सह-आरोपी (विधि से संघर्षरत बालक / CCL) के साथ केवल घटनास्थल पर उपस्थित रहने या उसके साथ भागने मात्र से, जिसने अपने हाथ में चाकू ले रखा था, हत्या करने का सामान्य आशय (Common intention to murder) सिद्ध नहीं माना जा सकता, जब तक कि अपीलकर्ता की ओर से कोई प्रत्यक्ष कृत्य (Overt Act) या जान से मारने के साझा पूर्व-नियोजन का ठोस प्रमाण न हो। अदालत ने अपीलकर्ता के आचरण को अधिकतम खतरनाक हथियार से गंभीर चोट पहुंचाने का साझा आशय मानते हुए उसकी दोषसिद्धि को धारा 302/34 IPC से संशोधित कर धारा 326 सहपठित धारा 34 IPC में बदल दिया। चूंकि अपीलकर्ता लगभग 5 वर्ष और 8 महीने की वास्तविक जेल हिरासत काट चुका था, इसलिए अदालत ने उसे पहले से भुगती गई सजा (Period already undergone) पर सीमित करते हुए किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘हमले में शारीरिक भागीदारी भी हत्या के सामान्य आशय को स्वतः सिद्ध नहीं करती’:
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की खंडपीठ ने सामान्य आशय के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट किया:
“यहाँ तक कि हमले में शारीरिक भागीदारी (Physical participation in the assault) भी अपने आप में हत्या करने के सामान्य आशय को स्थापित नहीं करती, जहाँ किसी हथियार से प्राणघातक वार किसी अन्य सह-आरोपी द्वारा किया गया हो। सामान्य आशय का निर्धारण करने से पूर्व अदालत को प्रयुक्त हथियार, आरोपी को आरोपित प्रत्यक्ष कृत्य (Overt Acts) और घटना की अन्य संपूर्ण परिस्थितियों का समग्र परीक्षण करना चाहिए। जिन मामलों में आरोपियों ने मृतक को कम से कम पकड़ा था या ललकारा था, वहां भी उन्हें धारा 302 IPC के तहत प्रतिनिधिक रूप से दायी नहीं ठहराया गया, बल्कि धारा 326 सहपठित धारा 34 IPC के तहत दोषी पाया गया। प्रस्तुत मामले में तो अपीलकर्ता को किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष कृत्य सौंपने के लिए साक्ष्यों का पूर्ण अभाव है। अतः हत्या के सामान्य आशय का आरोप तो यहाँ और भी अधिक कमजोर हो जाता है।”
2. चाकू के ज्ञान के आधार पर धारा 326/34 IPC का प्रतिनिधिक दायित्व:
- खंडपीठ ने पाया कि भले ही हत्या का इरादा सिद्ध न हो, किंतु अपीलकर्ता विधि से संघर्षरत बालक (CCL) के साथ गया था, जिसके हाथ में खुला बटनदार चाकू था:“तथ्य यह बना रहता है कि अपीलकर्ता उस CCL के साथ था जो अपने हाथ में चाकू लिए हुए प्रतीत होता था। यह निश्चित रूप से स्थापित करता है कि अपीलकर्ता मृतक मनोज कुमार झा को खतरनाक हथियार से गंभीर चोट (Grievous Hurt) पहुंचाने का एक सामान्य आशय साझा करता था।अतः अपीलकर्ता को केवल धारा 326 सहपठित धारा 34 IPC के तहत अपराध के लिए प्रतिनिधिक रूप से दायी (Vicariously Liable) ठहराया जा सकता है, न कि धारा 302 सहपठित धारा 34 IPC के तहत।”
3. चश्मदीद गवाहों के बयानों में सुधार (Improvement in Deposition):
- अदालत ने नोट किया कि किसी भी गवाह ने वास्तव में चाकू घोंपते नहीं देखा था और पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था।
- एक गवाह जिसने कोर्ट में चाकू मारते देखने का दावा किया था, वह पुलिस को दिए गए उसके धारा 161 CrPC के बयान में एक बाद का सुधार (Improvement) था, जिसकी पुष्टि सीसीटीवी या अन्य साक्ष्यों से नहीं होती।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2021–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| अपीलकर्ता | अभिषेक शर्मा (Abhishek Sharma) — घटना के समय लगभग 19-20 वर्ष का युवक। |
| सह-आरोपी | विधि से संघर्षरत बालक (CCL) — जिसकी पत्रावली किशोर न्याय बोर्ड (JJB) को भेजी गई। |
| घटना का विवरण | 31 जनवरी 2021 (रात 8:00 बजे) — विजय नगर, उत्तम नगर (नई दिल्ली) स्थित एक खाली प्लॉट में मनोज कुमार झा को सीने पर चाकू मार दिया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार सीने में चाकू का गहरा घाव सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त था, जिससे कार्डियोजेनिक शॉक के कारण मृत्यु हुई। |
| विवाद की पृष्ठभूमि | घटना से एक दिन पूर्व मृतक और उसके रिश्तेदार ने उक्त प्लॉट में अभिषेक और CCL को नशा करने से मना किया था, जिससे दोनों में कहासुनी हुई थी। |
| अभियोजन के साक्ष्य | 1. दो चश्मदीदों द्वारा अभियुक्तों को घटनास्थल से भागते देखना। 2. सीसीटीवी फुटेज जिसमें दोनों को प्लॉट में जाते और भागते देखा गया। 3. CCL से बटनदार चाकू की बरामदगी और दोनों के खुलासे पर उनके जले हुए ऊपरी कपड़ों के अवशेषों की जब्ती। |
| ट्रायल कोर्ट का फैसला (15.07.2025) | अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ), द्वारका कोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर भरोसा करते हुए अपीलकर्ता को धारा 302/34 IPC में उम्रकैद और धारा 201/34 IPC में 3 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | अपील आंशिक रूप से स्वीकार (Partly Allowed); दोषसिद्धि धारा 302/34 से घटाकर धारा 326/34 IPC में तब्दील; सजा 5 वर्ष 8 माह की भुगती गई अवधि पर सीमित; धारा 201/34 की सजा बहाल (जो पहले ही पूरी हो चुकी थी); जेल से तत्काल रिहाई के निर्देश। |
विधिक एवं दंडात्मक विश्लेषण: ‘धारा 34 IPC की सीमाएं और कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह नज़ीर’
- ‘कांस्टेबल 907 सुरेंद्र सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य व अन्य’ की नज़ीर:
- सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक फैसले में यह तय किया था कि जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी झगड़े में शामिल होते हैं और उनमें से कोई एक अचानक घटक हथियार (जैसे चाकू या पिस्तौल) से प्राणघातक वार कर देता है, तो दूसरे निहत्थे साथी पर धारा 302/34 के तहत हत्या का प्रतिनिधिक दायित्व तब तक नहीं थोपा जा सकता जब तक कि उसने मृतक को पकड़ा न हो, उकसाया न हो या भागने से रोका न हो।
- धारा 34 IPC का मूल तत्व—समान आशय बनाम एक जैसा आशय (Common Intention vs Similar Intention):
- धारा 34 के तहत प्रतिनिधिक दायित्व (Vicarious Liability) लागू करने के लिए केवल घटनास्थल पर उपस्थिति पर्याप्त नहीं है।
- अभियोजन को यह सिद्ध करना होता है कि दोनों आरोपियों के बीच अपराध करने से पूर्व ‘मस्तिष्क का पूर्व-मिलन’ (Prior meeting of minds) हुआ था। प्रस्तुत मामले में नशा करने से रोकने पर बदला लेने की मंशा हो सकती थी, किंतु अपीलकर्ता द्वारा मृतक पर हमला करने, पकड़ने या उकसाने का कोई साक्ष्य नहीं था। चाकू CCL के हाथ में था।
- धारा 326 IPC के तहत दोषसिद्धि का औचित्य:
- चूंकि अभिषेक शर्मा उस CCL के साथ गया था जो हाथ में नग्न चाकू लिए हुए था, अतः कानूनन उस पर यह ज्ञान और साझा आशय आरोपित किया गया कि वे मनोज झा को डराने या चाकू से गंभीर चोट (Grievous Hurt by Dangerous Weapon) पहुंचाने जा रहे थे। इसलिए, अदालत ने न्याय के सिद्धांतों का संतुलन बनाते हुए उसे धारा 326/34 का दोषी माना, जिसकी अधिकतम सजा 10 वर्ष या उम्रकैद हो सकती है, किंतु परिस्थितियों को देखते हुए 5 वर्ष 8 माह का कारावास न्यायोचित ठहराया गया।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: अभिषेक शर्मा बनाम राज्य (NCT ऑफ दिल्ली) [CRL.A. … / 2025]
- पीठ: न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह एवं न्यायमूर्ति विकास महाजन (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर–नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: अपील आंशिक रूप से स्वीकार; धारा 302/34 से घटाकर धारा 326/34 IPC में दोषसिद्धि; भुगती गई सजा (लगभग 5 वर्ष 8 माह) पर तत्काल रिहाई।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता (अभिषेक शर्मा) की ओर से: अधिवक्ता आर.एस. मिश्रा (Advocate R.S. Mishra)।
- प्रतिवादी (दिल्ली राज्य) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) रितेश कुमार बाहरी (Ritesh Kumar Bahri)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC):
- धारा 34 — सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कृत्य (BNS 2023 की धारा 3(5))
- धारा 302 — हत्या के लिए दंड (उम्रकैद से बरी)
- धारा 326 — खतरनाक आयुधों या साधनों द्वारा स्वेच्छा से घोर उपहति कारित करना (दोषसिद्धि संशोधित)
- धारा 201 — अपराध के साक्ष्य का विलोपन (दोषसिद्धि बरकरार)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता / CrPC — सजा का समायोजन (Set-off under Section 428 CrPC)
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- प्रतिनिधिक दायित्व और सामान्य आशय का विधिक मानक: ‘चाकू से प्राणघातक वार करने वाले सह-आरोपी के साथ केवल उपस्थित रहने या घटनास्थल से भागने मात्र से किसी व्यक्ति पर हत्या (धारा 302) का सामान्य आशय आरोपित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसका कोई प्रत्यक्ष सक्रिय कृत्य (Overt Act) या हत्या का पूर्व-नियोजित मस्तिष्क मिलन सिद्ध न हो; साथी के हाथ में खतरनाक हथियार होने की जानकारी के साथ जाने का आचरण अधिकतम धारा 326 सहपठित धारा 34 IPC के तहत खतरनाक हथियार से गंभीर चोट पहुंचाने का साझा आशय स्थापित करता है।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: दिल्ली उच्च न्यायालय ने संबंधित जेल अधीक्षक को आदेश की प्रति तुरंत भेजने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि अपीलकर्ता अभिषेक शर्मा को जेल से तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते वह किसी अन्य आपराधिक मामले में निरुद्ध न हो।
Common Intention:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court), नई दिल्ली |
| पीठ | न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह एवं न्यायमूर्ति विकास महाजन |
| मामला/साइटेशन | अभिषेक शर्मा बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) |
| याचिकाकर्ता (अपीलकर्ता) | अभिषेक शर्मा | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता आर.एस. मिश्रा |
| प्रतिवादी पक्ष | राज्य (NCT of Delhi) | प्रतिनिधित्व: आर.के. बाहरी (अतिरिक्त लोक अभियोजक) |
| मूल मामला | 31 जनवरी 2021 को उत्तम नगर (दिल्ली) के एक खाली प्लॉट में मनोज कुमार झा की चाकू मारकर हत्या से जुड़ा मामला। |
| ट्रायल कोर्ट का फैसला | 15 जुलाई 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (द्वारका) ने धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | सजा में संशोधन: धारा 302/34 IPC की दोषसिद्धि को निरस्त कर धारा 326/34 IPC (खतरनाक हथियार से गंभीर चोट) में बदला गया। काटी गई सजा (5 वर्ष 8 महीने) को पर्याप्त मानते हुए तुरंत रिहाई के निर्देश दिए गए। |

