FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
मामले की पृष्ठभूमि: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और दिल्ली सरकार की विफलता
- फरवरी 2026 का सुप्रीम कोर्ट का निर्देश:सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2026 में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जेल सुधारों के तहत ओपन जेलों (Open Prisons) की स्थापना और क्षमता विस्तार के विस्तृत निर्देश दिए थे। शीर्ष अदालत ने देश के सभी उच्च न्यायालयों को अपने-अपने राज्यों में इस अनुपालन की निगरानी के लिए स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL) दर्ज करने और हर तिमाही रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट भेजने का आदेश दिया था।
- निगरानी समिति (Monitoring Committee) में निम्न स्तर के अधिकारियों की मौजूदगी:सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि राज्यों की निगरानी समितियों की बैठकों में सचिव स्तर से नीचे का कोई अधिकारी भाग नहीं लेगा। इसके बावजूद, दिल्ली सरकार ने समिति की बैठक में एक डिप्टी सेक्रेटरी स्तर के अधिकारी को भेज दिया, जिसे हाईकोर्ट ने बेहद गैर-जिम्मेदाराना और अदालत के आदेशों की अवहेलना माना।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कड़े निर्देश
1. महानिदेशक (DG Prisons) के खिलाफ अवमानना नोटिस:
पीठ ने दिल्ली के जेल महानिदेशक (DG Prisons) को अवमानना का कारण बताओ नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी ने शीर्ष अदालत और हाईकोर्ट के आदेशों के प्रति भारी अनादर दिखाया है; स्वयं मामले की समीक्षा करने के बजाय उन्होंने अपने मातहत अधिकारी से अधूरा और भ्रामक हलफनामा दायर करवाया।
2. “सरकारी उदासीनता का पराकाष्ठा”:
न्यायालय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2026 के फैसले के बाद कई महीने बीत जाने पर भी कागजों पर कोई प्रगति नहीं हुई है। गृह विभाग और जेल अधिकारियों का रवैया बेहद उदासीन रहा है।
3. विशेष सचिव (गृह) का आश्वासन:
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के विशेष सचिव (गृह) व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। दिल्ली सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल संजय लाओ ने अदालत को आश्वासन दिया कि निगरानी समिति की आगामी बैठकों में राज्य सरकार और जेल विभाग के सर्वोच्च अधिकारी ही भाग लेंगे तथा सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक बिंदु का पैरा-वार (Para-wise Compliance) अनुपालन सुनिश्चित किया जाएगा।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (कैदियों के मानवाधिकार व सुधारात्मक न्याय का अधिकार / Rehabilitative Jurisprudence), अनुच्छेद 141 व 144 (सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की सर्वोपरिता एवं प्राधिकारियों का अनुपालन दायित्व), अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(b) (सिविल अवमानना—अदालती आदेशों की जानबूझकर अवज्ञा), तथा खुली सुधारात्मक संस्थाओं (Open Correctional Institutions – OCIs / Open Prisons) की स्थापना व विस्तार पर सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2026 के राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के अनुपालन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख रुख अपनाया है।
दिल्ली हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव साम्ब्रे (Acting Chief Justice Nitin Wasudeo Sambre) और न्यायमूर्ति संजय शर्मा (Justice Sanjay Sharma) की खंडपीठ ने दिल्ली में खुली जेलों की स्थापना और निगरानी समिति के कामकाज में घोर प्रशासनिक शिथिलता पर तीखा आक्रोश व्यक्त किया।
पीठ ने दिल्ली के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को सीधी चेतावनी दी कि यदि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के क्रियान्वयन पर संतोषजनक जवाब नहीं देते हैं, तो उन्हें अदालत में व्यक्तिगत रूप से तलब कर उनके विरुद्ध अवमानना के आरोप तय (Framing of Contempt Charges) किए जाएंगे। साथ ही, अदालत ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करते हुए अपने अधीनस्थ से अधूरा हलफनामा दिलवाने पर महानिदेशक (कारागार) / DG Prisons को अदालत की अवमानना का कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
उच्च न्यायालय की तीखी मौखिक टिप्पणियां: ‘कमेटी में जोकर भेजा गया’
सुनवाई के दौरान जब पीठ ने पाया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सचिव स्तर से नीचे के अधिकारी को न भेजने के स्पष्ट निर्देश के बावजूद सरकार ने एक उप-सचिव स्तर के अधिकारी को निगरानी समिति की बैठक में भेज दिया, तो कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी नाराजगी जताई:
1. ‘फरवरी 2026 से मामला एक इंच आगे नहीं बढ़ा; मुख्य सचिव पर आरोप तय करेंगे’:
खंडपीठ ने दिल्ली सरकार और कारागार प्रशासन के उदासीन रवैये पर कड़ा आक्षेप करते हुए कहा: “फरवरी 2026 में शीर्ष अदालत द्वारा विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाने और इस न्यायालय द्वारा बार-बार आदेश दिए जाने के बावजूद, सरकार और जेल अधिकारियों ने कोई कदम नहीं उठाया और मामला एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा है। अदालत के आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त सरकारी अधिकारियों ने पूरी तरह से संवेदनहीन और गैर-जिम्मेदाराना (Callous approach) रवैया दिखाया है। यदि दिल्ली के शीर्ष नौकरशाह (मुख्य सचिव) इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाते हैं, तो हम उन्हें उच्च न्यायालय में तलब करेंगे और उनके विरुद्ध अदालत की अवमानना के औपचारिक आरोप तय करेंगे।”
2. ‘आपने कमेटी की बैठक में अपना जोकर भेजा’:
- अदालत ने इस तथ्य पर गंभीर आपत्ति जताई कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अनिवार्य किया था कि राज्य निगरानी समिति की बैठकों में ‘सचिव स्तर’ (Secretary rank) से नीचे का कोई भी अधिकारी भाग नहीं लेगा।
- इसके बावजूद सरकार ने एक उप-सचिव (Deputy Secretary) को बैठक में भेज दिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक टिप्पणी की:“आपने कमेटी की बैठक में अपने जोकर को भेज दिया। क्या आप अब हमें उस बैठक का कार्यवृत्त (Minutes of the Meeting) दिखाना चाहते हैं? राज्य सरकार ने जो कुछ किया है, हम अपने आदेश में उन गंदे कपड़ों को धोना नहीं चाहते (We don’t want to wash dirty linen in our order about what the state has done)।”
3. डीजी (प्रिजन्स) को अवमानना नोटिस; अन्य अधिकारियों पर आदेश स्थगित:
- खंडपीठ ने कारागार महानिदेशक (DG Prisons) के आचरण को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के प्रति सीधा अनादर माना। अदालत ने कहा कि जब डीजी को स्वयं इस मामले को व्यक्तिगत रूप से देखने का निर्देश दिया गया था, तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए अपने अधीनस्थ अधिकारी से अधूरी जानकारी वाला हलफनामा शपथपूर्वक दाखिल करवा दिया।
- हालांकि, विशेष सचिव (गृह) द्वारा कार्यवाही में ऑनलाइन शामिल होकर यह आश्वासन दिए जाने के बाद कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का बिंदुवार (Para-wise) अनुपालन हलफनामा प्रस्तुत किया जाएगा, अदालत ने अन्य उच्च अधिकारियों के विरुद्ध तत्काल अवमानना कार्यवाही शुरू करने का आदेश फिलहाल टाल दिया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (फरवरी–अक्टूबर 2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक संदर्भ |
| मूल विधिक अधिदेश | सर्वोच्च न्यायालय का राष्ट्रीय निर्देश (फरवरी 2026) — जेलों में अत्यधिक भीड़भाड़ (Overcrowding) कम करने, कैदियों के पुनर्वास और मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में खुली सुधारात्मक संस्थाओं (OCIs) की स्थापना और विस्तार। |
| प्रक्रियात्मक निगरानी तंत्र | सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों को स्वतः संज्ञान (Suo Motu) जनहित याचिकाएं दर्ज करने, राज्य स्तर पर उच्च स्तरीय निगरानी समितियां गठित करने और प्रत्येक तिमाही में प्रगति रिपोर्ट शीर्ष अदालत को भेजने का आदेश दिया था। |
| समिति का अनिवार्य स्तर | सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश था कि राज्य निगरानी समिति की बैठकों में सचिव स्तर से नीचे का कोई अधिकारी शामिल नहीं होगा ताकि नीतिगत निर्णय तुरंत लागू हो सकें। |
| दिल्ली प्रशासन का उल्लंघन | 1. फरवरी 2026 से अक्टूबर 2026 तक जमीनी स्तर पर कोई प्रगति नहीं हुई। 2. निगरानी समिति की बैठक में सचिव के स्थान पर उप-सचिव रैंक के अधिकारी को भेजा गया। 3. महानिदेशक (कारागार) ने खुद हलफनामा देने के बजाय अधीनस्थ से आधी-अधूरी जानकारी का शपथपत्र प्रस्तुत कराया। |
| हाईकोर्ट का दंडात्मक कदम | डीजी प्रिजन्स को अवमानना नोटिस; मुख्य सचिव पर आरोप तय करने की मौखिक चेतावनी। |
| सरकार का औपचारिक वचन | दिल्ली सरकार के स्थायी वकील संजय लाओ ने आश्वस्त किया कि निगरानी समिति की अगली बैठक में जेल विभाग और राज्य सरकार के सर्वोच्च अधिकारी भाग लेंगे और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पैरा-वाइज अनुपालन पेश किया जाएगा। |
| आगामी निर्णायक सुनवाई | 20 नवंबर 2026। |
विधिक एवं सुधारात्मक न्यायशास्त्र: ‘खुली जेलें और अनुच्छेद 21’
- खुली सुधारात्मक संस्थाएं (Open Correctional Institutions – OCIs) क्यों आवश्यक हैं?
- तिहाड़, मंडोली और रोहिणी जैसी दिल्ली की जेलों में अपनी स्वीकृत क्षमता से 200% से 300% अधिक कैदी बंद हैं। इस दमघोंटू भीड़भाड़ के कारण मानवाधिकारों का घोर हनन होता है और जेलें सुधार गृह बनने के बजाय अपराध की नर्सरी बन जाती हैं।
- खुली जेलों में न्यूनतम सुरक्षा (Minimum Security) होती है, जहां अच्छे आचरण वाले सजायाफ्ता कैदियों को दिन में बाहर काम करने, मजदूरी कमाने और समाज की मुख्यधारा से जुड़े रहने की अनुमति दी जाती है। इससे उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है और सज़ा पूरी होने के बाद उनके पुनः अपराध करने (Recidivism) की संभावना न्यूनतम हो जाती है।
- कार्यपालिका की जवाबदेही और अदालती अवमानना:
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 144 के तहत देश के सभी सिविल और न्यायिक प्राधिकारियों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य करें।
- जब सुप्रीम कोर्ट नीतिगत सुधारों के लिए उच्च स्तरीय समितियों के गठन का निर्देश देता है, तो नौकरशाही द्वारा जूनियर अधिकारियों को भेजकर बैठकों की औपचारिकता पूरी करना न्यायिक प्राधिकार को कमजोर करने (Undermining the Judicial Authority) का स्पष्ट प्रयास माना जाता है। दिल्ली हाईकोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी इसी प्रशासनिक जड़ता पर प्रहार करती है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय (मूल जनहित रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: स्वतः संज्ञान निगरानी याचिका: खुली सुधारात्मक संस्थाओं (OCIs) का कार्यान्वयन [W.P.(C) Suo Motu / दिल्ली हाईकोर्ट]
- पीठ: कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव साम्ब्रे एवं न्यायमूर्ति संजय शर्मा (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
- आगामी निर्णायक सुनवाई: 20 नवंबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- दिल्ली राज्य (NCT of Delhi) व अभियोजन की ओर से: स्थायी वकील (आपराधिक) संजय लाओ (Standing Counsel Sanjay Lao)।
- विशेष प्रशासनिक उपस्थिति: विशेष सचिव (गृह), दिल्ली सरकार (वर्चुअल माध्यम से उपस्थित)।
- अवमानना नोटिस प्राप्तकर्ता: महानिदेशक (कारागार), दिल्ली (DG Prisons)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा व सुधारात्मक न्याय), अनुच्छेद 141 (सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों की बाध्यकारिता), अनुच्छेद 144 (सिविल प्राधिकारियों का सहायता कर्तव्य), एवं अनुच्छेद 226
- अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 — धारा 2(b) (सिविल अवमानना), धारा 12 (दंड) एवं धारा 14
- दिल्ली कारागार नियम, 2018 (Delhi Prison Rules, 2018) — खुली जेलों और अर्ध-खुली जेलों (Semi-open Prisons) के संचालन संबंधी नियम
- सुप्रीम कोर्ट दिशा-निर्देश (फरवरी 2026) — देश भर में खुली सुधारात्मक संस्थाओं के अनिवार्य विस्तार और त्रैमासिक निगरानी का ढांचा
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- जेल सुधार और न्यायिक अनुपालन का विधिक मानक: ‘जेलों में कैदियों की अमानवीय भीड़ को नियंत्रित करने और सुधारात्मक न्याय को लागू करने के लिए खुली जेलों (OCIs) का विस्तार करना राज्य का अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है; सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुपालन में किसी भी प्रकार की प्रशासनिक लापरवाही, जूनियर अधिकारियों को भेजना या अधूरी जानकारी देना अदालत की जानबूझकर की गई अवमानना है; राज्य के शीर्ष नौकरशाह (मुख्य सचिव व डीजी जेल) व्यक्तिगत रूप से अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी हैं।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: दिल्ली उच्च न्यायालय ने डीजी (कारागार) को औपचारिक अवमानना नोटिस जारी कर दिया है; राज्य सरकार के स्थायी वकील द्वारा शीर्ष अधिकारियों की बैठक कराने के औपचारिक वचन के बाद मुख्य सचिव के विरुद्ध आरोप तय करने का आदेश 20 नवंबर 2026 तक के लिए स्थगित रखा गया है; दिल्ली सरकार को अगली सुनवाई से पूर्व बिंदुवार पूर्ण अनुपालन रिपोर्ट अदालत में दाखिल करनी होगी।
Open Prisons:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांबरे एवं न्यायमूर्ति संजय शर्मा |
| मूल मामला | सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2026 के दिशानिर्देशों के तहत दिल्ली में ‘ओपन जेल’ (OCIs) की स्थापना और निगरानी का स्वतः संज्ञान मामला (Suo Motu Petition) |
| प्रतिवादी पक्ष | दिल्ली राज्य सरकार (गृह विभाग) एवं महानिदेशक (जेल) | प्रतिनिधित्व: स्टैंडिंग काउंसिल (क्रिमिनल) संजय लाओ |
| प्रमुख अनुशासनात्मक आदेश | 1. DG (Prisons) को अवमानना नोटिस: अधीनस्थों से अधूरा हलफनामा दिलवाने और कोर्ट के आदेशों की अनदेखी पर कारण बताओ नोटिस। 2. मुख्य सचिव को चेतावनी: अगले आदेश तक अवमानना कार्यवाही स्थगित, बशर्ते उच्च स्तरीय अनुपालन रिपोर्ट पेश की जाए। |
| अगली सुनवाई | 20 नवंबर 2026 |

