Wednesday, November 4, 2026
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Advocate Safety: वकीलों की हत्याएं बर्दाश्त नहीं; कानून में 10 वर्ष की न्यूनतम सजा, गैर-जमानती धाराएं और पुलिस थानों हेतु SOP लागू हो

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प्रमुख पक्षकारों के रुख और मांगें

  1. एडवोकेट्स एसोसिएशन बेंगलुरु (AAB) की मांगें (10 साल की सजा):AAB ने गृह मंत्री को सौंपे ज्ञापन में मांग की है कि एडवोकेट्स प्रोटेक्शन एक्ट 2023 को और मजबूत किया जाए। इसके तहत वकीलों पर हमला करने वाले आरोपियों के खिलाफ सख्त गैर-जमानती (Non-bailable) धाराएं जोड़ी जाएं और न्यूनतम 10 साल की जेल की सजा तय की जाए। इसके अलावा, चार्जशीट दाखिल होने तक किसी भी आरोपी को जमानत न दी जाए।
  2. कर्नाटक राज्य बार काउंसिल (KSBC) का दृष्टिकोण:KSBC के अध्यक्ष आर. राजन्ना ने स्पष्ट किया कि एक वैधानिक संस्था होने के नाते बार काउंसिल बंद का आह्वान नहीं कर सकती, लेकिन वकीलों की न्यायसंगत मांगों का पूरा समर्थन करती है। KSBC ने कम से कम 7 साल के कारावास, मजिस्ट्रेट स्तर पर जांच की निगरानी और किसी भी वकील पर हमले की स्थिति में तुरंत बार काउंसिल को सूचित करने की वैधानिक व्यवस्था की मांग की।
  3. बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) सदस्य की प्रतिक्रिया:BCI सदस्य धनंजय सी.एम. (Dhananjaya CM) ने कहा कि अदालती बहिष्कार अंतिम विकल्प होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि वकील विरोध स्वरूप काली पट्टी बांधकर काम कर सकते थे और अपनी एक दिन की आधी कमाई पीड़ित वकील के परिवार को दान कर सकते थे। उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार से संवाद कर सजा बढ़ाने और जमानत रोकने संबंधी मांगों को जल्द लागू कराने का प्रयास किया जाएगा।

मुख्य विधिक व प्रशासनिक बिंदु

1. पुलिस थानों में मनमानी पर अंकुश:

AAB ने आरोप लगाया कि शीर्ष अदालत के स्पष्ट दिशानिर्देशों और डीजीपी (DGP) के आदेशों के बावजूद पुलिस इंस्पेक्टर और एसीपी सिविल मामलों में अवैध रूप से हस्तक्षेप कर रहे हैं और वकीलों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं।

2. अगली कार्रवाई की चेतावनी:

AAB ने चेतावनी दी है कि यदि गृह मंत्रालय द्वारा उनकी मांगों को तुरंत लागू नहीं किया गया तो पूरा कानूनी समुदाय राज्यव्यापी बड़े आंदोलन और हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) शुरू करने के लिए बाध्य होगा।

बेंगलुरु: कर्नाटक अधिवक्ता (हिंसा निषेध) अधिनियम, 2023 (Karnataka Prohibition of Violence Against Advocates Act, 2023), भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) व अनुच्छेद 21 (वकीलों के निर्भीक व्यवसाय, आजीविका और जीवन की सुरक्षा का अधिकार), अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961), पुलिस थानों में समानांतर दीवानी पंचायत चलाने पर रोक, तथा विधि प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा न्यायालय के अधिकारियों (Officers of the Court) के सम्मानजनक व्यवहार हेतु मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के वैधानिक ढांचे पर कर्नाटक के विधिक जगत में एक अभूतपूर्व राज्यव्यापी आंदोलन छिड़ गया है।

बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड में अधिवक्ता मंजूनाथ और अन्नपूर्णेश्वरी नगर में अधिवक्ता श्रीराम की कथित रूप से निर्मम हत्या (Cold-blooded murders), तथा कोलार के गौरीबिदानूर में अधिवक्ता वेंकटरमण सन्नक्की पर हुए जानलेवा हमले (Attempt to murder) के विरोध में मंगलवार को पूरे कर्नाटक के वकीलों ने अदालती कार्यवाहियों का पूर्ण बहिष्कार किया।

कर्नाटक राज्य विधिज्ञ परिषद (Karnataka State Bar Council – KSBC) के अध्यक्ष आर. राजन्ना और एडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ बेंगलुरु (AAB) के अध्यक्ष विवेक सुब्बारेड्डी के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे से मुलाकात कर चार सूत्रीय मांगों का ज्ञापन सौंपा। वकीलों ने 2023 के अधिवक्ता संरक्षण कानून में संशोधन कर अपराधों को गैर-जमानती बनाने और न्यूनतम 10 वर्ष के कठोर कारावास का प्रावधान जोड़ने की पुरजोर मांग की है।

वकीलों के प्रमुख कानूनी तर्क एवं संगठनात्मक रुख

1. ‘पुलिस स्टेशन समानांतर सिविल कोर्ट बन चुके हैं; इंस्पेक्टर खुद सीजे और जज बन रहे हैं’:

AAB अध्यक्ष विवेक सुब्बारेड्डी ने पुलिस तंत्र के अनधिकृत रवैये और वकीलों के साथ दुर्व्यवहार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा: “हमने वकीलों के लिए सुरक्षा, अदालत की निगरानी में निष्पक्ष जांच और एक ऐसी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) की मांग की है जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जब वकील पुलिस थानों में जाएं तो उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। आज पुलिस स्टेशन समानांतर दीवानी अदालतों (Parallel Civil Courts) की तरह काम कर रहे हैं और उन्हें ऐसे दीवानी मामलों से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। स्थिति यह हो गई है कि एक इंस्पेक्टर ही चीफ जस्टिस और जज बनने की कोशिश कर रहा है। इस प्रशासनिक अराजकता पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।”

2. KSBC का रुख: 7 वर्ष की सजा, फास्ट-ट्रैक कोर्ट और गैर-जमानती प्रावधान:

  • KSBC चेयरमैन आर. राजन्ना ने वैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि एक सांविधिक निकाय होने के नाते बार काउंसिल आधिकारिक बंद या बॉयकॉट का आह्वान नहीं कर सकती, किंतु वे इस उद्देश्य का पूर्ण समर्थन करते हैं:“आरोपियों को चार्जशीट दाखिल होने तक किसी भी सूरत में जमानत न मिले। 2023 के कानून में संशोधन कर अपराधों को गैर-जमानती बनाया जाए, मजिस्ट्रेट स्तर पर निगरानी तंत्र स्थापित हो, 7 वर्ष के कारावास का कड़ा दंड तय हो, और वकीलों से जुड़े अपराधों के त्वरित निस्तारण हेतु विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें (Fast-track Courts) गठित की जाएं।”

3. बीसीआई (BCI) सदस्य धनंजय सी.एम. का भिन्न मत:

  • बार काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य धनंजय सी.एम. ने कार्य बहिष्कार पर संयम बरतने की सलाह देते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शन अंतिम उपाय (Last Resort) होना चाहिए। हर बात पर हड़ताल करने के बजाय वकीलों को काली पट्टी बांधकर काम करना चाहिए था और अपने एक दिन की आधी कमाई पीड़ित वकील के परिजनों को दान करनी चाहिए थी। उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार के समक्ष मांगों को रखकर त्वरित समाधान निकाला जा सकता है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (3 नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / आयोजनपूरे कर्नाटक के जिला न्यायालय, अधीनस्थ अदालतें एवं कर्नाटक उच्च न्यायालय (बेंगलुरु, धारवाड़, कलबुर्गी)।
आंदोलन की तिथि3 नवंबर 2026 (मंगलवार)
आयोजक संस्थाएंएडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ बेंगलुरु (AAB) एवं कर्नाटक राज्य विधिज्ञ परिषद (KSBC)।
प्रमुख नेतृत्वकर्ता• विवेक सुब्बारेड्डी (Vivek Subbareddy) — अध्यक्ष, AAB
• आर. राजन्ना (R Rajanna) — अध्यक्ष, KSBC
• धनंजय सी.एम. (Dhananjaya CM) — सदस्य, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI)।
घटना का मूल कारण (आपराधिक घटनाएं)1. अधिवक्ता मंजूनाथ की हत्या: व्हाइटफील्ड, बेंगलुरु में अज्ञात अपराधियों द्वारा कथित सुनियोजित हत्या।
2. अधिवक्ता श्रीराम की हत्या: अन्नपूर्णेश्वरी नगर, बेंगलुरु में नृशंस हत्या।
3. अधिवक्ता वेंकटरमण सन्नक्की पर हमला: गौरीबिदानूर, कोलार में जानलेवा हमला।
हाईकोर्ट परिसर में गतिविधियांAAB के पदाधिकारियों ने सुबह विभिन्न कोर्ट हॉलों में जाकर न्यायाधीशों से अनुरोध किया कि वकीलों की अनुपस्थिति के चलते मामलों में कोई प्रतिकूल आदेश पारित न करें। इसके पश्चात कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य गोल्डन गेट (Golden Gate) पर वकीलों ने विशाल धरना दिया और जस्टिस डी.के. सिंह व जस्टिस एच. शांति भूषण से इस विषय पर स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL) दर्ज करने की अपील की।
चेतावनीवकीलों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि सरकार ने तत्काल मांगों को लागू नहीं किया, तो विधिक समुदाय बड़े पैमाने पर व्यापक आंदोलन शुरू करेगा और उच्च न्यायालय में औपचारिक जनहित याचिका दायर करेगा।

गृह मंत्री के समक्ष रखी गई 4 प्रमुख विधिक मांगें

AAB ने 3 नवंबर के आधिकारिक ज्ञापन के जरिए राज्य के गृह मंत्री प्रियांक खरगे के समक्ष निम्नलिखित चार प्रमुख मांगें रखी हैं:

  1. आरोपियों की त्वरित गिरफ्तारी एवं त्वरित अभियोजन:
    • अधिवक्ता मंजूनाथ और श्रीराम के हत्यारों तथा अधिवक्ता सन्नक्की पर जानलेवा हमला करने वाले अभियुक्तों को अविलंब गिरफ्तार किया जाए और चार्जशीट दाखिल होने तक उनकी जमानत पर पूर्ण विधिक रोक लगाई जाए।
  2. अधिवक्ता संरक्षण अधिनियम को मजबूत करना (10 वर्ष का कठोर कारावास):
    • कर्नाटक अधिवक्ता (हिंसा निषेध) अधिनियम, 2023 में संशोधन कर इसके अंतर्गत आने वाले सभी अपराधों को कड़ाई से गैर-जमानती (Non-bailable) बनाया जाए और दंड की सीमा को बढ़ाकर न्यूनतम 10 वर्ष का कठोर कारावास निर्धारित किया जाए।
  3. पुलिस थानों हेतु व्यापक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP):
    • गृह मंत्रालय एक अनिवार्य SOP तैयार कर लागू करे, जिसमें यह तय हो कि जब कोई अधिवक्ता या आम नागरिक शिकायत दर्ज कराने या मुवक्किल की पैरवी हेतु थाने पहुंचे, तो उसके साथ गरिमापूर्ण व सम्मानजनक व्यवहार किया जाए (उन्हें बुनियादी बैठक व्यवस्था से वंचित न किया जाए)।
  4. दीवानी विवादों में पुलिसिया हस्तक्षेप पर पूर्ण प्रतिबंध:
    • डीजीपी और पुलिस आयुक्त के पूर्व परिपत्रों के बावजूद पुलिस अधिकारी (ACP, इंस्पेक्टर, सब-इंस्पेक्टर) संपत्ति व दीवानी विवादों में अवैध रूप से हस्तक्षेप कर “कंगारू कोर्ट” चला रहे हैं। इसे पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए और उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ निलंबन व गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘अधिवक्ता संरक्षण कानून की सीमाएं और पुलिस जवाबदेही’

  • कर्नाटक अधिवक्ता (हिंसा निषेध) अधिनियम, 2023 की समीक्षा:
    • राजस्थान के बाद कर्नाटक देश का दूसरा राज्य बना था जिसने अधिवक्ताओं के संरक्षण हेतु विशेष कानून पारित किया था।
    • तथापि, मौजूदा कानून में वकीलों पर हमले या धमकी को रोकने के लिए पर्याप्त निवारक दंड (Deterrent Punishment) का अभाव है। अधिकांश मामलों में अभियुक्तों को कुछ ही दिनों में नियमित जमानत मिल जाती है। AAB और KSBC द्वारा इसे गैर-जमानती बनाने और 7 से 10 वर्ष की सजा की मांग इसी दंडात्मक शून्यता को भरने के उद्देश्य से उठाई गई है।
  • पुलिस थानों में ‘समानांतर दीवानी अदालतें’ और भ्रष्टाचार:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि पुलिस बल का काम केवल संज्ञेय अपराधों की जांच करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। संपत्ति के विवाद, किराएदारी के झगड़े या संविदात्मक लेन-देन का निपटारा करना केवल सक्षम दीवानी अदालतों (Civil Courts) का क्षेत्राधिकार है।
    • जब पुलिस अधिकारी पैसे या राजनीतिक रसूख के बल पर थानों में समझौते कराने लगते हैं, तो मुवक्किलों की कानूनी पैरवी करने वाले वकीलों को सीधे तौर पर निशाना बनाया जाता है। वकीलों की यह मांग विधिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है कि थानों के इस अनधिकृत हस्तक्षेप पर पूर्ण विराम लगे।
  • अधिवक्ताओं के मौलिक अधिकारों का संरक्षण (Articles 19(1)(g) & 21):
    • संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का व्यापार या पेशा करने की स्वतंत्रता देता है, और अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन और शारीरिक सुरक्षा की गारंटी देता है।
    • अधिवक्ता किसी अपराधी या पीड़ित का पक्ष रखकर केवल न्याय प्रशासन के संचालन में अदालत की सहायता करते हैं। उन्हें उनके पेशेवर कार्यों के लिए शारीरिक हिंसा या हत्या का शिकार बनाया जाना भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और कानून के शासन पर सीधा प्रहार है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • क्षेत्राधिकार: कर्नाटक राज्य (राज्यव्यापी विधिक कार्य बहिष्कार)
  • प्रतिवेदन की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • संबद्ध प्राधिकारी: गृह मंत्री, कर्नाटक सरकार (Priyank Kharge)
  • प्रतिनिधित्वकर्ता संगठन: Advocates’ Association Bengaluru (AAB) एवं Karnataka State Bar Council (KSBC)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • कर्नाटक अधिवक्ता (हिंसा निषेध) अधिनियम, 2023 (Karnataka Act 18 of 2023) — प्रस्तावित संशोधन (10 वर्ष कारावास व गैर-जमानती धाराएं)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(g) (स्वतंत्र विधिक व्यवसाय), अनुच्छेद 21 (जीवन व शारीरिक सुरक्षा) एवं अनुच्छेद 226/32 (न्यायिक रिट संरक्षण)
    • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) — बार काउंसिल के कर्तव्य व वकीलों के विशेषाधिकार
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) / BNS — हत्या (BNS धारा 103), हत्या का प्रयास (BNS धारा 109) एवं पुलिस प्रक्रियात्मक नियम
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • अधिवक्ता सुरक्षा और निष्पक्ष न्याय प्रशासन का विधिक मानक: ‘अधिवक्ता न्यायालय के अभिन्न अधिकारी (Officers of the Court) हैं और उन्हें बिना किसी शारीरिक भय, धमकी या पुलिसिया उत्पीड़न के अपने पेशेवर दायित्वों का निर्वहन करने का पूर्ण संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होना चाहिए; वकीलों पर होने वाले जानलेवा हमलों और हत्याओं के मामलों में कानून को कठोर और गैर-जमानती बनाया जाना अपरिहार्य है; पुलिस स्टेशनों को दीवानी विवादों के गैर-कानूनी निपटारे का मंच बनने से रोकना और अधिवक्ताओं के सम्मान हेतु अनिवार्य मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करना कानून के शासन की रक्षा हेतु अनिवार्य है।’
  • वर्तमान स्थिति व भावी प्रक्रिया: गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने वकीलों के प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया है कि हत्यारोपियों की गिरफ्तारी हेतु विशेष जांच टीमों का गठन किया जाएगा और 2023 के अधिनियम में आवश्यक संशोधनों के प्रारूप का परीक्षण विधि विभाग के साथ मिलकर किया जाएगा; वहीं AAB ने स्पष्ट किया है कि यदि ठोस परिणाम सामने नहीं आए तो वे उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर न्यायिक निगरानी में जांच की मांग करेंगे।

Advocate Safety: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित राज्य/स्थानकर्नाटक (कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु व अधीनस्थ अदालतें)
आयोजक संस्थाएंएडवोकेट्स एसोसिएशन बेंगलुरु (AAB) एवं कर्नाटक राज्य बार काउंसिल (KSBC)
मुख्य पदाधिकारीAAB अध्यक्ष: विवेक सुब्बारेड्डी | KSBC अध्यक्ष: आर. राजन्ना | BCI सदस्य: धनंजय सी.एम.
विरोध का कारणबेंगलुरु में वकील मंजूनाथ व श्रीराम की हत्या तथा वकील वेंकटरमण पर जानलेवा हमला।
AAB की मुख्य मांगें1. आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी और फास्ट-ट्रैक ट्रायल।
2. अधिवक्ता संरक्षण कानून में संशोधन कर न्यूनतम 10 वर्ष के कारावास का प्रावधान व गैर-जमानती अपराध बनाना।
3. पुलिस थानों में वकीलों व नागरिकों के गरिमापूर्ण व्यवहार हेतु SOP लागू करना।
4. दीवानी विवादों (Civil Disputes) में पुलिस हस्तक्षेप पर पूर्ण रोक।
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