Wednesday, November 4, 2026
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Foreign Divorce: विदेशी नागरिकता और विदेशी तलाक की आड़ में दूसरी शादी करने वाले डॉक्टर की याचिका खारिज; पति द्विविवाह के मुकदमे से नहीं बच सकता

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मामले की पृष्ठभूमि और विधिक घटनाक्रम

  1. विवाह और विदेश प्रस्थान:आरोपी पति का विवाह 18 अप्रैल 2003 को आंध्र प्रदेश के सत्तेनापल्ली में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। 2005 में पति डॉक्टर के रूप में करियर बनाने यूके चला गया और बाद में उसकी पत्नी भी वहां चली गई। 2007 में डिलीवरी के लिए पहली पत्नी भारत वापस आई।
  2. भारत में तलाक याचिका खारिज व यूके में तलाक:पति ने आंध्र प्रदेश (नरसरावपेट) की अदालत में तलाक और कस्टडी का मुकदमा दायर किया जो खारिज हो गया। हाई कोर्ट में अपील भी वापस ले ली गई। इसके बाद 1 फरवरी 2013 को यूके की नागरिकता प्राप्त करने के बाद, पति ने इंग्लैंड के कैम्ब्रिज काउंटी कोर्ट में मुकदमा दायर किया और 2014 में ‘इररिट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज’ के आधार पर तलाक ले लिया। तत्पश्चात उसने नॉरफॉक (UK) में दूसरा विवाह कर लिया।
  3. पहली पत्नी द्वारा FIR व कानूनी बहस:पहली पत्नी ने Guntur के सत्तेनापल्ली थाने में IPC की धारा 494, 120B के तहत एफआईआर दर्ज कराई। पति का तर्क था कि दूसरे विवाह के समय वह ब्रिटिश नागरिक था और दूसरा विवाह भारत के बाहर हुआ था (IPC धारा 4 के तहत संरक्षण)।
  4. सुप्रीम कोर्ट का रुख:कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पहला विवाह भारत में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। इसलिए, पति द्वारा बाद में ली गई विदेशी नागरिकता या विदेशी क्षेत्राधिकार से पहला विवाह स्वतः समाप्त नहीं होता।

नई दिल्ली: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 13 (विदेशी निर्णयों की निश्चायकता एवं भारत में उनकी प्रवर्तनीयता की वैधानिक शर्तें), हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA, 1955) की धारा 13 (तलाक के सांविधिक आधार—’विवाह के असाध्य विखंडन’ के आधार का वैधानिक अभाव), भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 494 (प्रथम जीवनसाथी के जीवित रहते दूसरा विवाह / द्विविवाह) सहपठित धारा 4 (न्यायालय का राज्यक्षेत्रातीत क्षेत्राधिकार / Extraterritorial Jurisdiction), तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वाई. नरसिम्हा राव बनाम वाई. वेंकट लक्ष्मी [(1991) 3 SCC 451] व हालिया नज़ीर किशोरकुमार मोहन काले बनाम कश्मीरा काले में प्रतिपादित सिद्धांतों पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा (Justice Prashant Kumar Mishra) और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर (Justice Shree Chandrashekhar) की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली एक एनआरआई डॉक्टर की अपील को खारिज (Dismissed) कर दिया।

अपीलकर्ता पति ने हिंदू रीति-रिवाजों से भारत में हुए अपने पहले विवाह के जीवित रहते हुए ब्रिटेन (UK) की नागरिकता प्राप्त की और कैम्ब्रिज काउंटी कोर्ट (इंग्लैंड) से ‘विवाह के असाध्य विखंडन’ (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर एकतरफा तलाक लेकर यूके में दूसरी शादी कर ली थी।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में शीर्ष अदालत ने दो-टूक व्यवस्था दी कि विदेशी अदालत द्वारा पारित ऐसी डिक्री भारतीय वैवाहिक कानून के सीधे उल्लंघन में है और सीपीसी की धारा 13 के कानूनी मानकों को पूरा नहीं करती। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में विदेशी नागरिकता ले लेने या विदेश में दूसरा विवाह कर लेने मात्र से कोई व्यक्ति भारतीय कानून के तहत पहली पत्नी के प्रति अपने वैवाहिक दायित्व और आईपीसी की धारा 494 के तहत द्विविवाह के आपराधिक मुकदमे से बच नहीं सकता। हालांकि, अदालत ने राहत देते हुए पति के वृद्ध माता-पिता और उसकी दूसरी पत्नी के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘विदेशी डिक्री भारतीय कानून के विपरीत और गैर-मान्यता प्राप्त आधार पर पारित; CPC धारा 13 का उल्लंघन’:

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने विदेशी वैवाहिक निर्णयों की विधिक वैधता का परीक्षण करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट दर्ज किया: “हमारी दृष्टि में, विदेशी तलाक की डिक्री भारत के मौजूदा वैवाहिक कानून के सीधे उल्लंघन (Contravention of existing matrimonial law) में और एक ऐसे आधार पर पारित की गई थी जिसे भारत में सांविधिक रूप से मान्यता ही प्राप्त नहीं है (Ground not recognized statutorily)। यह न केवल सीपीसी की धारा 13 की कानूनी दहलीज का उल्लंघन करती है—जिससे होकर प्रत्येक विदेशी डिक्री को गुजरना अनिवार्य है—बल्कि भारत में किसी विदेशी डिक्री के प्रवर्तनीय होने के लिए इस न्यायालय द्वारा निर्धारित की गई आवश्यक शर्तों की भी अवहेलना करती है। यदि विदेशी डिक्री सीपीसी की धारा 13 की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती है, तो अभियुक्त संख्या 1/पति ऐसी डिक्री के आधार पर यह दावा नहीं कर सकता कि भारत के वैवाहिक कानूनों की नजर में उसका पहला विवाह समाप्त हो चुका था, और इस प्रकार वह आईपीसी की धारा 494 की कठोरता से नहीं बच सकता; इसकी अनुमति किसी भी सूरत में नहीं दी जा सकती।”

2. ‘विदेशी नागरिकता लेने और विदेश में शादी करने से द्विविवाह का अपराध समाप्त नहीं होता’:

  • पति की उस दलील को अदालत ने सिरे से ठुकरा दिया जिसमें उसने कहा था कि दूसरी शादी के समय वह ब्रिटिश नागरिक था और निकाह यूके में हुआ, अतः आईपीसी की धारा 4 के तहत भारत में मुकदमा नहीं चल सकता:“हम इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते। अभियुक्त संख्या 1/पति का विवाह प्रतिवादी संख्या 2/पहली पत्नी के साथ भारत में हिंदू रीति-रिवाजों और संस्कारों के तहत संपन्न हुआ था।अतः, भले ही दूसरा विवाह भारत के बाहर हुआ हो, आईपीसी की धारा 494 के तहत लगाए गए आरोपों को हल्का नहीं माना जा सकता। द्विविवाह के अपराध की जांच केवल दूसरे विवाह के स्थान तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि इसमें वर्तमान में अस्तित्व में मौजूद वैवाहिक संबंध (Subsisting matrimonial relationship) को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना होगा।जीवित विवाह से उत्पन्न होने वाले कानूनी परिणामों को अभियुक्त संख्या 1/पति द्वारा बाद में अपनी राष्ट्रीयता/नागरिकता बदल लेने (Subsequent change in nationality) के आधार पर निष्फल नहीं किया जा सकता।”

3. ‘सुविधाजनक मंच (Forum Shopping) के आगे वैवाहिक दर्जे की पवित्रता का समर्पण नहीं हो सकता’:

  • पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वैवाहिक दर्जे की पवित्रता और भारतीय क्षेत्राधिकार को ऐसे ‘असुविधाजनक मंच’ (Forum Non Conveniens) के आगे झुकने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जहाँ पति भारत में तलाक का केस हारने के बाद विदेश जाकर एकतरफा आदेश हासिल कर ले।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2003–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
पीठन्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा (Justice Prashant Kumar Mishra) एवं न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर (Justice Shree Chandrashekhar)
निर्णय की तिथि3 नवंबर 2026
केस संदर्भआपराधिक अपील (Criminal Appeal) — आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के FIR निरस्तीकरण आदेश के विरुद्ध
अपीलकर्ताअभियुक्त संख्या 1 (पति) — भारतीय मूल का डॉक्टर, जिसने 2013 में यूनाइटेड किंगडम (UK) की नागरिकता प्राप्त की।
प्रतिवादी पक्ष1. आंध्र प्रदेश राज्य
2. प्रतिवादी संख्या 2 (प्रथम पत्नी) — सत्तेनापल्ली, गुंटूर जिला (आंध्र प्रदेश) की निवासी।
वैवाहिक इतिहास• 18 अप्रैल 2003: सत्तेनापल्ली में हिंदू संस्कारों के अनुसार विवाह संपन्न हुआ।
• पति उस समय उस्मानिया मेडिकल कॉलेज (हैदराबाद) से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहा था।
• 4 फरवरी 2005: पति चिकित्सा करियर हेतु यूके चला गया; बाद में पत्नी भी यूके पहुंची।
• अगस्त 2007: पत्नी पहले बच्चे के प्रसव हेतु सत्तेनापल्ली स्थित अपने मायके लौटी और पति के अनुसार वापस यूके नहीं गई।
भारतीय अदालतों में विफलतापति ने नरसारावपेट (गुंटूर) की सक्षम पारिवारिक अदालत में तलाक और बच्चे की कस्टडी की याचिका दायर की, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। पति ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में अपील की, किंतु बाद में उस अपील को भी वापस ले लिया।
ब्रिटेन में विधिक चालबाजी• 1 फरवरी 2013: पति ने ब्रिटिश नागरिकता हासिल की।
• इसके तुरंत बाद उसने इंग्लैंड की कैम्ब्रिज काउंटी कोर्ट (Cambridge County Court) में पहली पत्नी के खिलाफ एकतरफा तलाक की अर्जी दाखिल की।
• वर्ष 2014: काउंटी कोर्ट ने ‘विवाह के असाध्य विखंडन’ (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर तलाक की डिक्री दे दी।
• इसके उपरांत पति ने नॉरफ़ॉक (UK) में दूसरी महिला से विधिवत विवाह रचा लिया।
आपराधिक शिकायत (IPC धारा 494)लगभग दो वर्ष बाद पहली पत्नी ने सत्तेनापल्ली टाउन पुलिस स्टेशन (गुंटूर) में पति, सास-ससुर और दूसरी पत्नी के खिलाफ आईपीसी की धारा 494 (द्विविवाह), 120B (आपराधिक षड्यंत्र) सहपठित धारा 34 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई।
उच्च न्यायालय का पूर्व रुखआंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पति द्वारा दायर धारा 482 CrPC की याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि विदेशी तलाक की डिक्री भारत में अमान्य है और पति पर द्विविवाह का मुकदमा चलेगा।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय• पति की अपील खारिज; पति के विरुद्ध आईपीसी की धारा 494 के तहत आपराधिक ट्रायल जारी रहेगा।
• पति के वृद्ध माता-पिता और दूसरी पत्नी के खिलाफ कार्यवाही रद्द (Quashed) की गई।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘सीपीसी की धारा 13, विदेशी तलाक और द्विविवाह का दायरा’

  • सीपीसी, 1908 की धारा 13 के तहत विदेशी डिक्री की अमान्यता:
    • सीपीसी की धारा 13 यह निर्धारित करती है कि कोई विदेशी निर्णय भारत में कब निश्चायक (Conclusive) नहीं होगा।
    • धारा 13(a): यदि वह सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय द्वारा न दिया गया हो। (पत्नी भारत में रह रही थी और उसने विदेशी अदालत के क्षेत्राधिकार को कभी स्वीकार नहीं किया था)।
    • धारा 13(c): जहाँ निर्णय इस बात पर आधारित हो कि उसने भारत में लागू अंतरराष्ट्रीय या भारतीय कानून को मान्यता देने से इनकार कर दिया है। चूंकि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत ‘विवाह का असाध्य विखंडन’ तलाक का कोई वैधानिक आधार नहीं है, इसलिए उस आधार पर दी गई डिक्री सीधे तौर पर धारा 13(c) से बाधित और भारत में पूर्णतः शून्य (Null and Void) है।
  • ‘वाई. नरसिम्हा राव बनाम वाई. वेंकट लक्ष्मी’ [(1991) 3 SCC 451] का लैंडमार्क सिद्धांत:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने तीन दशक पूर्व यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी थी कि:“भारत में हिंदू विधि के तहत संपन्न विवाह को किसी विदेशी अदालत द्वारा केवल उन्हीं आधारों पर विघटित किया जा सकता है जो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत उपलब्ध हैं। यदि विदेशी अदालत किसी ऐसे आधार पर तलाक देती है जो भारतीय कानून में नहीं है, या जहाँ प्रतिवादी पत्नी ने उस अदालत के क्षेत्राधिकार को स्वीकार नहीं किया है, तो ऐसी डिक्री भारत में निष्प्रभावी और अमान्य होगी।”
  • आईपीसी की धारा 494 (द्विविवाह) और धारा 4 (अतिरिक्त क्षेत्राधिकार):
    • पति का यह बचाव कि “अपराध ब्रिटेन में हुआ और वह ब्रिटिश नागरिक है” विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण है।
    • भारतीय दंड संहिता की धारा 4(2) और धारा 494 का मूल तत्व यह है कि जब पहला विवाह भारतीय कानून के तहत वैध रूप से जीवित है, तो उस विवाह के अस्तित्व में रहते हुए किया गया कोई भी दूसरा विवाह अमान्य और आपराधिक है।
    • विवाह का व्यक्तिगत दर्जा (Marital Status) पक्षकारों के साथ जुड़ा रहता है। नागरिकता बदल लेने से व्यक्ति भारत में पंजीकृत अपने पूर्ववर्ती वैवाहिक दायित्वों और आपराधिक उत्तरदायित्वों से मुक्त नहीं हो सकता।
  • ‘किशोरकुमार मोहन काले बनाम कश्मीरा काले’ [2026 LiveLaw (SC) 259]:
    • शीर्ष अदालत ने अपने हालिया 2026 के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि विदेशी अदालतों के ‘त्वरित तलाक’ (Quick Foreign Divorces) को भारतीय महिलाओं के संवैधानिक व वैवाहिक अधिकारों को कुचलने का हथियार नहीं बनने दिया जा सकता।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: पति (अपीलकर्ता) बनाम प्रथम पत्नी व अन्य [Criminal Appeal No. … / 2026 — Arising out of SLP (Crl.)]
  • पीठ: न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा (Justice Prashant Kumar Mishra) एवं न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर (Justice Shree Chandrashekhar)
  • निर्णय की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • निर्णय के लेखक: न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा (Judgment authored by Justice P.K. Mishra)
  • कार्यवाही का परिणाम: अपील आंशिक रूप से निस्तारित; पति की याचिका खारिज—आईपीसी की धारा 494 के तहत ट्रायल का सामना करने का आदेश; माता-पिता और दूसरी पत्नी के विरुद्ध कार्यवाही निरस्त।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
      • धारा 13 — विदेशी निर्णय कब निश्चायक नहीं होगा (खंड a, b, c एवं f)
      • धारा 14 — विदेशी निर्णयों के बारे में उपधारणा
    • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA, 1955) — धारा 13 (तलाक के वैधानिक आधार) एवं धारा 19 (क्षेत्राधिकार)
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) / भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
      • धारा 4 — संहिता का राज्यक्षेत्रातीत विस्तार
      • धारा 494 — पति या पत्नी के जीवनकाल में पुनः विवाह करना (द्विविवाह / Bigamy)
      • धारा 120B व धारा 34 — आपराधिक षड्यंत्र व सामान्य आशय
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • विदेशी तलाक डिक्री और द्विविवाह अभियोजन का विधिक मानक: ‘भारत में हिंदू विधि के तहत संपन्न हुआ विवाह केवल भारत के वैधानिक कानूनों या सीपीसी की धारा 13 के कड़े अनुपालन में पारित निर्णयों द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है; ‘विवाह का असाध्य विखंडन’ (Irretrievable Breakdown of Marriage) हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक का कोई सांविधिक आधार नहीं है; अतः विदेशी अदालत द्वारा इस आधार पर दी गई एकतरफा तलाक की डिक्री भारत में अमान्य और शून्य है; ऐसा पति जिसने भारत में तलाक की कार्यवाही में विफल होने के उपरांत विदेशी नागरिकता हासिल कर विदेश में एकतरफा डिक्री के आधार पर दूसरा विवाह रचाया हो, वह आईपीसी की धारा 494 के तहत द्विविवाह के आपराधिक अभियोजन से नहीं बच सकता; राष्ट्रीयता में परिवर्तन भारतीय कानून के तहत जीवित विवाह के कानूनी परिणामों और आपराधिक दायित्व को पराजित नहीं कर सकता।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: सर्वोच्च न्यायालय के इस स्पष्ट निर्णय के बाद सत्तेनापल्ली (आंध्र प्रदेश) की सक्षम मजिस्ट्रेट/सत्र अदालत में पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 494 के तहत नियमित आपराधिक ट्रायल तत्काल प्रभाव से शुरू होगा; यह निर्णय उन सभी प्रवासी भारतीयों (NRIs) के लिए एक कड़ा न्यायिक सबक है जो भारतीय अदालतों को दरकिनार कर विदेशी अदालतों से तलाक लेकर विदेश में दूसरी शादी कर लेते हैं।

Foreign Divorce: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा एवं न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर
मूल विषय/विवादविदेशी अदालत (UK Court) द्वारा Irretrievable Breakdown के आधार पर जारी तलाक डिक्री के आधार पर दूसरा विवाह करने वाले पति के खिलाफ द्विविवाह (Bigamy – Section 494 IPC) का मामला।
कानूनी प्रावधानहिंदू विवाह अधिनियम 1955 (HMA), सीपीसी की धारा 13 (Section 13 CPC) तथा आईपीसी की धारा 494 (Section 494 IPC).
अदालत का फैसला1. पति की याचिका खारिज: यूके की तलाक डिक्री अमान्य मानी गई; पति के खिलाफ द्विविवाह (Bigamy) का मुकदमा जारी रहेगा।
2. सास-ससुर व दूसरी पत्नी को राहत: पति के माता-पिता और दूसरी पत्नी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द।
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