Thursday, November 5, 2026
HomeLaw Firms & Assoc.Judicial Temperament: महिला न्यायिक अधिकारी की ACR से प्रतिकूल प्रविष्टि हटाने से...

Judicial Temperament: महिला न्यायिक अधिकारी की ACR से प्रतिकूल प्रविष्टि हटाने से इनकार; आदेश न मानना स्वभाव का मुद्दा है, सत्यनिष्ठा का नहीं

FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क

  1. ACR में प्रतिकूल प्रविष्टि और हाईकोर्ट का आदेश:न्यायिक अधिकारी मंजू कुमारी के खिलाफ 2019-20 की ACR में बार के सदस्यों के प्रति व्यवहार और वरिष्ठों के निर्देशों की अवहेलना की शिकायतों के बाद “संदेहास्पद निष्ठा” दर्ज की गई थी। 10 जुलाई 2026 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इस प्रविष्टि को यह कहते हुए हटा दिया था कि रिकॉर्ड में ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो अधिकारी की बेईमानी या ईमानदारी की कमी को साबित करती हो।
  2. सर्वोत्तम नियोक्ता (Model Employer) का दायित्व:उच्च न्यायालय प्रशासन की ओर से तर्क दिया गया कि इस चेतावनी के बाद अधिकारी के काम में सुधार हुआ है। इस पर पीठ ने कहा कि एक “मॉडल नियोक्ता” को सुधार को स्वीकार करना चाहिए और बिना किसी ठोस तथ्यात्मक आधार के किसी अधिकारी की निष्ठा पर सवाल उठाने वाली टिप्पणी का बचाव नहीं करना चाहिए।
  3. सेवा रिकॉर्ड का सुसंगत विश्लेषण:अदालत ने पाया कि 2013 से 2020 तक और उसके बाद भी अधिकारी का सेवा रिकॉर्ड पूरी तरह संतोषजनक रहा है। ऐसे में केवल एक वर्ष के अव्यवहारिक व्यवहार के आधार पर उस पर बेईमानी का ठप्पा लगाना अनुचित और गैर-कानूनी है।

मुख्य विधिक निष्कर्ष

1. ACR लेखन में शब्दावली का सटीक प्रयोग:

यह फैसला स्थापित करता है कि प्रशासनिक अधिकारियों और उच्च न्यायालय प्रशासन को वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) दर्ज करते समय शब्दावली का चयन सावधानीपूर्वक करना चाहिए। न्यायिक व्यवहार या रवैये की कमी को “संदेहास्पद निष्ठा” बताकर किसी अधिकारी के करियर को कलंकित नहीं किया जा सकता।

2. न्यायिक अधिकारियों का संरक्षण:

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारियों को केवल प्रशासनिक मतभेदों या बार की शिकायतों के आधार पर निष्ठाहीन ठहराए जाने के मनमानेपन से सुरक्षा प्रदान करता है।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 235 (अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय का प्रशासनिक नियंत्रण), वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (Annual Confidential Report – ACR) में ‘सत्यनिष्ठा’ (Integrity) बनाम ‘न्यायिक स्वभाव’ (Judicial Temperament) के विधिक भेद, एक ‘आदर्श नियोक्ता’ (Model Employer) के रूप में उच्च न्यायालय प्रशासन के संवैधानिक दायित्वों, तथा सेवा न्यायशास्त्र में बिना ठोस साक्ष्य के ‘संदेहास्पद सत्यनिष्ठा’ (Doubtful Integrity) दर्ज करने पर सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित विधिक मानकों के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के अधिकारों की रक्षा में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) और न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 10 जुलाई 2026 के उस निर्णय में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया, जिसके तहत उत्तर प्रदेश की एक महिला न्यायिक अधिकारी मंजू कुमारी (Manju Kumari) की एसीआर से “संदेहास्पद सत्यनिष्ठा” (Doubtful Integrity) की प्रतिकूल प्रविष्टि को हटा/खारिज (Expunged) कर दिया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय प्रशासन द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर गंभीर सवाल उठाते हुए रेखांकित किया कि आदेशों की अवहेलना करना (Insubordination), वकीलों के साथ रूखा व्यवहार करना या वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों से विवाद होना न्यायिक स्वभाव और आचरण का विषय हो सकता है, किंतु इसे बिना किसी वित्तीय भ्रष्टाचार या बेईमानी के प्रमाण के “संदेहास्पद सत्यनिष्ठा” नहीं कहा जा सकता। पीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘सत्यनिष्ठा’ जैसे गंभीर शब्द का प्रयोग इतनी लापरवाही से नहीं किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद उच्च न्यायालय प्रशासन ने याचिका पर आगे बल न देने की सहमति जताई, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका का निस्तारण कर दिया।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘आदेश न मानना सत्यनिष्ठा का विषय नहीं, यह स्वभाव का मुद्दा है’:

न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने आचरण और सत्यनिष्ठा के बीच विधिक अंतर स्पष्ट करते हुए टिप्पणी की: “आदेश न मानना (Insubordination) सत्यनिष्ठा का मुद्दा नहीं है। आदेश न मानना स्वभाव (Temperament) का मुद्दा है। सत्यनिष्ठा का सीधा संबंध बेईमानी (Dishonesty) और भ्रष्ट आचरण से होता है, जबकि आदेश न मानना या वरिष्ठों से विवाद न्यायिक स्वभाव से संबंधित है। यही वह मूल बिंदु है जहाँ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सटीक विधिक रेखा खींची है। क्या आपके पास कोई ऐसी शिकायत थी जो उनके द्वारा रिश्वत लेने या बेईमानी करने से संबंधित हो? जब ऐसी कोई सामग्री नहीं है, तो सत्यनिष्ठा पर लांछन लगाना पूरी तरह अनुचित है।”

2. ‘सत्यनिष्ठा शब्द का प्रयोग इतनी ढिलाई से नहीं होना चाहिए; गलत शब्द न चुनें’:

  • उच्च न्यायालय प्रशासन की दलील थी कि अधिकारी द्वारा मजिस्ट्रियल कार्य करने से मना करना और कार्य के प्रति अनिच्छा भी सत्यनिष्ठा के आकलन में प्रासंगिक है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने असहमति जताते हुए कहा:“सत्यनिष्ठा (Integrity) शब्द का प्रयोग इतनी ढिलाई और हल्केपन से नहीं किया जाना चाहिए। आपको एक गलत कानूनी अभिव्यक्ति का उपयोग करने से बचना चाहिए। यदि कोई समस्या थी, तो आपको यह कहना चाहिए था कि इस अधिकारी के साथ ‘स्वभाव संबंधी समस्या’ (Temperament issue) है।एसीआर में वकीलों के प्रति व्यवहार और प्रदर्शन के आकलन के लिए अलग कॉलम मौजूद होते हैं; सत्यनिष्ठा पर प्रश्न उठाए बिना भी उन कॉलमों में टिप्पणी दर्ज की जा सकती थी।”

3. ‘क्या कोई न्यायिक अधिकारी एक साल बेईमान और बाकी सभी साल ईमानदार हो सकता है?’:

पीठ ने अधिकारी के समग्र सेवा रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए पूछा:

  • 2013 से 2020 तक अधिकारी का सेवा रिकॉर्ड पूरी तरह संतोषजनक रहा और विवादित वर्ष के बाद की रिपोर्टों में भी सुधार दर्ज किया गया।
  • न्यायमूर्ति बागची ने सवाल किया: “क्या कोई अधिकारी केवल एक साल (2019-2020) के लिए बेईमान हो जाता है और बाकी सभी वर्षों में ईमानदार रहता है?”
  • जब उच्च न्यायालय के वकील ने दलील दी कि उस प्रतिकूल प्रविष्टि से ही अधिकारी के प्रदर्शन में सुधार आया, तो पीठ ने कहा:“जैसा कि आपने स्वयं स्वीकार किया कि आपकी चेतावनी का असर हुआ और उनके प्रदर्शन में सुधार आया; हमारा मानना है कि एक ‘आदर्श नियोक्ता’ (Model Employer) को इस बात को यहीं छोड़ देना चाहिए और सुधार को स्वीकार करना चाहिए, न कि सत्यनिष्ठा के बेबुनियाद आरोप का बचाव करते रहना चाहिए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि अधिकारी का उत्पीड़न न हो।”

Also Read; Court Staff: न्यायिक सेवा में प्रवेश हेतु अदालत कर्मचारियों को अनिवार्य विधि अभ्यास से एकमुश्त छूट देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार; अनिवार्य वकालत अनुभव आवश्यक

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2019–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 136)
पीठमुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
आदेश की तिथिनवंबर 2026 (मंगलवार)
केस संदर्भइलाहाबाद उच्च न्यायालय प्रशासन बनाम मंजू कुमारी [Special Leave to Appeal (C) No. … / 2026]
अपीलकर्ताइलाहाबाद उच्च न्यायालय प्रशासन (High Court of Judicature at Allahabad) — रजिस्ट्रार जनरल।
प्रतिवादी पक्षमंजू कुमारी (Manju Kumari) — उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा (UPJS) की महिला न्यायिक अधिकारी।
विवादित एसीआर वर्षवर्ष 2019–2020 (जब अधिकारी गाजियाबाद जनपद न्यायालय में न्यायिक दंडाधिकारी/सिविल जज के रूप में पदस्थापित थीं)।
प्रशासन के मूल आरोप1. अधिकारी बार-बार मजिस्ट्रियल कार्य करने से मना करती थीं और आदेशों की अवहेलना करती थीं।
2. अधिवक्ताओं के साथ उनका व्यवहार रूखा और अनुचित था, जिसके कारण स्थानीय बार एसोसिएशन से शिकायतें प्राप्त हुईं।
3. उन्होंने अपने वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतें दर्ज कराई थीं।
4. उच्च न्यायालय की तीन प्रशासनिक समितियों ने उनके प्रत्यावेदनों पर विचार करने के बाद ही ‘संदेहास्पद सत्यनिष्ठा’ की प्रविष्टि को बरकरार रखा था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय (10 जुलाई 2026)न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा (Justice Arindam Sinha) और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह (Justice Satya Veer Singh) की खंडपीठ ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिकूल प्रविष्टि को हटा दिया। खंडपीठ ने माना कि जिन सामग्रियों पर भरोसा किया गया, वे किसी भी प्रकार की वित्तीय बेईमानी, भ्रष्टाचार या शुचिता के अभाव को सिद्ध नहीं करतीं।
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोणसर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट खंडपीठ के विधिक अंतर को पूरी तरह सही पाया। उच्च न्यायालय प्रशासन के वकील ने अदालत का रुख भांपते हुए याचिका पर आगे बल न देने का निवेदन किया, जिसके उपरांत याचिका खारिज/निस्तारित कर दी गई।

विधिक एवं सेवा न्यायशास्त्र विश्लेषण: ‘सत्यनिष्ठा बनाम स्वभाव और अनुच्छेद 235’

  • ‘संदेहास्पद सत्यनिष्ठा’ (Doubtful Integrity) का कानूनी वजन:
    • न्यायिक सेवा में किसी अधिकारी की एसीआर में ‘संदेहास्पद सत्यनिष्ठा’ दर्ज होना उसके करियर के लिए घातक होता है। इसके कारण पदोन्नति, समयबद्ध वेतनमान और अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement under Rule 56) जैसी प्रतिकूल कार्रवाइयां स्वतः आकर्षित हो जाती हैं।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने ईश्वर चंद जैन बनाम पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय [(1988) 3 SCC 370] और रमेश चंदर सिंह बनाम पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय [(2003) 4 SCC 161] में यह सुस्थापित किया है कि जब तक किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार, अवैध रिश्वतखोरी या नैतिक अधमता (Moral Turpitude) का कोई ठोस और अकाट्य साक्ष्य न हो, तब तक केवल कड़े न्यायिक फैसलों या वकीलों की शिकायतों के आधार पर उसकी सत्यनिष्ठा पर लांछन नहीं लगाया जा सकता।
  • अनुच्छेद 235 और प्रशासनिक नियंत्रण की सीमाएं:
    • संविधान का अनुच्छेद 235 उच्च न्यायालय को अधीनस्थ अदालतों पर पूर्ण प्रशासनिक और अनुशासनात्मक नियंत्रण प्रदान करता है।
    • किंतु यह नियंत्रण ‘अभिभावकीय’ (Paternal) होना चाहिए, न कि दंडात्मक या प्रतिशोधात्मक। यदि किसी युवा या महिला न्यायिक अधिकारी को वकीलों के दबाव या प्रशासनिक असहजता के कारण काम करने में कठिनाई हो रही है, तो उच्च न्यायालय का कर्तव्य उसे मार्गदर्शन देना है, न कि उसके पूरे सेवा रिकॉर्ड पर बेईमानी का ठप्पा लगाना।
  • स्वतंत्र कॉलमों का महत्व:
    • एसीआर फॉर्म में विभिन्न पहलू दर्ज होते हैं: (क) न्यायिक ज्ञान, (ख) कार्य की मात्रा, (ग) बार के प्रति व्यवहार, और (घ) सत्यनिष्ठा।
    • जब बार के प्रति व्यवहार के लिए अलग कॉलम मौजूद है, तो उस व्यवहारगत कमी को ‘सत्यनिष्ठा’ के कॉलम में घसीटना प्रशासनिक विधि के तहत ‘अप्रासंगिक सामग्री पर विचार करना’ (Considering Irrelevant Material) माना जाता है, जो प्रशासनिक आदेश को विकृत करता है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 136)
  • केस संदर्भ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय प्रशासन बनाम मंजू कुमारी [Special Leave to Appeal (Civil) / 2026]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर विचार करने से इनकार; इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ का 10 जुलाई 2026 का आदेश पूर्णतः संपुष्ट।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • अपीलकर्ता (इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन) की ओर से: उच्च न्यायालय प्रशासन के वरिष्ठ स्थायी विधि अधिकारी।
  • प्रतिवादी (न्यायिक अधिकारी मंजू कुमारी) की ओर से: प्रतिवादी के अधिवक्तागण।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 235 (अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण), अनुच्छेद 14 व 16 (सार्वजनिक रोजगार में मनमानेपन के विरुद्ध संरक्षण), एवं अनुच्छेद 136
    • उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा नियमवली (UP Judicial Service Rules) — सेवा रिकॉर्ड, एसीआर प्रविष्टियां एवं पदोन्नति के नियम
    • प्रशासनिक विधि — ‘आदर्श नियोक्ता’ (Model Employer) का सिद्धांत
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • न्यायिक अधिकारियों की एसीआर में सत्यनिष्ठा और स्वभाव के विधिक मूल्यांकन का मानक: ‘वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में ‘सत्यनिष्ठा’ (Integrity) एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील विधिक अभिव्यक्ति है, जिसका प्रयोग केवल वित्तीय बेईमानी, भ्रष्टाचार या शुचिता के अभाव के ठोस साक्ष्य होने पर ही किया जाना चाहिए; आदेशों की अवहेलना (Insubordination), कार्य के प्रति अनिच्छा या बार के सदस्यों के साथ तल्ख संबंध ‘न्यायिक स्वभाव’ (Temperament) के मुद्दे हैं, न कि सत्यनिष्ठा के; बार और बेंच के बीच तनाव को बिना किसी रिश्वतखोरी के आरोप के ‘संदेहास्पद निष्ठा’ में परिवर्तित नहीं किया जा सकता; तथा यदि किसी न्यायिक अधिकारी का पूर्व और पश्चात्वर्ती सेवा रिकॉर्ड बेदाग रहा हो और चेतावनी के बाद उसके प्रदर्शन में सुधार आया हो, तो उच्च न्यायालय को एक आदर्श नियोक्ता (Model Employer) की भांति उस सुधार को स्वीकार करना चाहिए, न कि निराधार आक्षेपों को बनाए रखकर न्यायिक अधिकारी का उत्पीड़न करना चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद न्यायिक अधिकारी मंजू कुमारी की सेवा पंजिका (Service Book) से वर्ष 2019-2020 की “Doubtful Integrity” की प्रतिकूल प्रविष्टि विधिक रूप से हमेशा के लिए निष्कासित (Expunged) हो गई है; इसके फलस्वरूप उनकी वरिष्ठता, सेवा लाभ, एसीपी और भविष्य में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति का मार्ग पूरी तरह निष्कंटक हो गया है।

Judicial Temperament: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठCJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
केस / पक्षकारइलाहाबाद उच्च न्यायालय प्रशासन बनाम मंजू कुमारी (High Court of Judicature at Allahabad v. Manju Kumari)
मूल विवादगाजियाबाद में पदस्थापना के दौरान वर्ष 2019-20 की ACR में महिला न्यायिक अधिकारी पर दर्ज “संदेहास्पद निष्ठा” की टिप्पणी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय10 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट की खंडपीठ (न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा व न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह) ने प्रतिकूल टिप्पणी को यह कहते हुए निरस्त (Expunge) कर दिया था कि सामग्री से कोई बेईमानी साबित नहीं होती।
अदालत का अंतिम आदेशहाईकोर्ट प्रशासन की अपील खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा; हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा मामला आगे न बढ़ाने के बयान के बाद एसएलपी (SLP) निस्तारित।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
clear sky
29.7 ° C
29.7 °
29.7 °
40 %
2.6kmh
8 %
Thu
30 °
Fri
29 °
Sat
29 °
Sun
30 °
Mon
30 °

Recent Comments