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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- घटनाक्रम और आरोपों की शुरुआत:12 दिसंबर 2024 को आरटीआई कार्यकर्ता स्नेहमयी कृष्णा ने मैसूरु स्थित श्री चामुंडेश्वरी मंदिर से साड़ियों की कथित चोरी और बिक्री में शामिल होने के आरोप में श्री चामुंडेश्वरी विकास प्राधिकरण की सचिव रूपा एम.जे. के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया। पुलिस अधिकारियों ने तुरंत FIR दर्ज करने के बजाय अधिकारी के कक्ष में जाकर पूछताछ की। अधिकारी ने आरोप लगाया कि कृष्णा पुलिस के साथ उनके चैंबर में आए, चिल्लाए और धमकी दी कि “जब उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, तो अधिकारी को परेशान करना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है।”
- BNS की धाराओं का अनुप्रयोग:पुलिस ने कृष्णा के खिलाफ BNS की धारा 132 (लोक सेवक को रोकने हेतु हमला) और धारा 351 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया। हाईकोर्ट ने जांच करते हुए पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा किसी भी प्रकार का बल प्रयोग, हमला या कोई भी गंभीर धमकी नहीं दी गई थी। केवल यह कहना कि “मुख्यमंत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है तो यह कोई बड़ी बात नहीं है”, BNS के तहत अपराध नहीं बनता।
- दो दिनों की देरी और काउंटरब्लास्ट (Counterblast):अदालत ने रेखांकित किया कि घटना 12 दिसंबर को हुई थी, जबकि अधिकारी द्वारा 14 दिसंबर को बिना किसी स्पष्टीकरण के 2 दिन बाद शिकायत दर्ज कराई गई। यदि मौके पर पुलिस अधिकारी मौजूद थे और कोई अपराध हुआ था, तो पुलिस को तुरंत शिकायत दर्ज करनी चाहिए थी। इस अकारण देरी से स्पष्ट होता है कि यह शिकायत केवल प्रतिशोध लेने और खुद पर लगे चोरी के आरोपों से ध्यान भटकाने के लिए की गई थी।
बेंगलुरु: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (आपराधिक कार्यवाहियों व प्राथमिकी को रद्द करने की उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति—पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 132 (लोक सेवक को उसके कर्तव्य निर्वहन से रोकने हेतु हमला या आपराधिक बल का प्रयोग—पूर्ववर्ती IPC धारा 353) एवं धारा 351 (आपराधिक अभित्रास / Criminal Intimidation—पूर्ववर्ती IPC धारा 506), दुर्भावनापूर्ण अभियोजन में ‘जवाबी बदले की कार्रवाई का सिद्धांत’ (Doctrine of Malicious Counterblast Complaint), तथा आपराधिक न्यायशास्त्र में ‘प्राथमिकी दर्ज कराने में अस्पष्टीकृत विलंब’ (Unexplained Delay in Lodging FIR) के विधिक मानकों के तहत कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आरटीआई कार्यकर्ता के पक्ष में एक महत्वपूर्ण और निर्णायक निर्णय दिया है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजेश राय के. (Justice Rajesh Rai K) की एकल पीठ ने प्रमुख आरटीआई कार्यकर्ता स्नेहमयी कृष्णा (Snehamayi Krishna) द्वारा दायर याचिका को पूर्णतः स्वीकार करते हुए मैसूरु में उनके विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी (FIR) और संपूर्ण आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द (Quashed) कर दिया।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निष्कर्ष दिया कि यह आपराधिक मामला पूरी तरह से एक “जवाबी बदले की कार्रवाई” (Counterblast) था, जिसे तब दर्ज कराया गया जब कार्यकर्ता ने संबंधित महिला अधिकारी के विरुद्ध प्रसिद्ध मंदिर से साड़ियों की चोरी और अवैध बिक्री में संलिप्त होने के गंभीर आरोप लगाए थे। अदालत ने माना कि प्राथमिकी और आरोप पत्र के कथनों को यदि उनके अंकित मूल्य (Face Value) पर भी सत्य मान लिया जाए, तब भी कानूनन न तो किसी आपराधिक बल का प्रयोग सिद्ध होता है और न ही आपराधिक धमकी का, जिसके चलते ऐसी दुर्भावनापूर्ण कार्यवाही को जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग (Abuse of the Process of Court) होगा।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘अंकित मूल्य पर भी कोई अपराध नहीं बनता; कार्यवाही जारी रखना प्रक्रिया का दुरुपयोग’:
न्यायमूर्ति राजेश राय के. ने चार्जशीट और एफआईआर के आरोपों का सूक्ष्म विधिक परीक्षण करने के उपरांत अपने निर्णय में व्यवस्था दी: “मेरा यह सुविचारित मत है कि संपूर्ण आरोप पत्र, लगाए गए आरोप, संपूर्ण प्राथमिकी और मूल शिकायत को यदि उनके अंकित मूल्य (Face Value) पर भी स्वीकार कर लिया जाए, तब भी याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई अपराध गठित नहीं होता है। अतः ऐसी स्थिति में, याचिकाकर्ता के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज किया जाना और आगे की आपराधिक कार्यवाहियों को जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग (Abuse of the process of Court) होगा। तदनुसार, याचिका स्वीकार की जाती है और आपराधिक कार्यवाही निरस्त की जाती है।”
2. ‘न कोई आपराधिक बल, न गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी; BNS की धारा 132 व 351 आकर्षित नहीं होती’:
- पीठ ने BNS की धाराओं के आवश्यक तत्वों का विश्लेषण करते हुए पाया:“याचिकाकर्ता द्वारा किसी भी आपराधिक बल (Criminal Force) या हमले का प्रयोग नहीं किया गया था। अतः धारा 132 का अपराध आकर्षित नहीं होता।शिकायत में ऐसे किसी गाली-गलौज वाले शब्द का उपयोग नहीं दर्शाया गया है। स्वीकार्य रूप से, याचिकाकर्ता ने लोक सेवक को किसी गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी (Threatened with dire consequences) नहीं दी थी। शिकायत में प्रयुक्त शब्द केवल यह थे कि ‘याचिकाकर्ता के लिए लोक सेवक को परेशान करना कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि उसने पूर्व में मुख्यमंत्री के खिलाफ भी शिकायत दर्ज कराई है’। ये शब्द भी भारतीय न्याय संहिता (BNS) के किसी भी आपराधिक प्रावधान को आकर्षित नहीं करते हैं।”
3. ‘घटना स्थल पर पुलिस मौजूद थी, फिर 2 दिन का विलंब क्यों? शिकायत प्रतिशोध और बदले की भावना से प्रेरित’:
- अदालत ने प्राथमिकी दर्ज कराने में हुए दो दिनों के असामान्य और अस्पष्टीकृत विलंब पर तीखा सवाल उठाते हुए दर्ज किया:“यदि ऐसी कोई घटना वास्तव में घटी थी, तो प्रतिवादी संख्या 2 (शिकायतकर्ता), जो कि स्वयं एक उच्च पदस्थ लोक सेवक हैं, के लिए उसी दिन तत्काल शिकायत दर्ज कराने में कोई बाधा नहीं थी; अथवा जो पुलिस अधिकारी कथित तौर पर घटना के समय मौके पर मौजूद थे, उनके लिए याचिकाकर्ता के विरुद्ध स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामला दर्ज करने में कोई रुकावट नहीं थी।ऐसी परिस्थितियों में, यह स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह शिकायत प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा याचिकाकर्ता से प्रतिशोध लेने (For taking vengeance) के लिए और उसके द्वारा दर्ज कराई गई पूर्व शिकायत की प्रतिक्रिया में एक जवाबी बदले की कार्रवाई (As a counterblast) के रूप में दर्ज कराई गई थी।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (दिसंबर 2024 – नवंबर 2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| फोरम / न्यायालय | कर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार — धारा 528 BNSS / 482 CrPC) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति राजेश राय के. (Justice Rajesh Rai K) (एकल पीठ) |
| निर्णय की तिथि | नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | स्नेहमयी कृष्णा बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [Criminal Petition No. … / 2026] |
| याचिकाकर्ता पक्ष | स्नेहमयी कृष्णा (Snehamayi Krishna) — मैसूरु के प्रसिद्ध सामाजिक एवं आरटीआई कार्यकर्ता (जिन्होंने मुडा / MUDA भूमि आवंटन विवाद में भी कानूनी शिकायतें दर्ज कराई थीं)। |
| याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता अरुणा एम. श्याम (Senior Advocate Aruna M Shyam)। |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. कर्नाटक राज्य (गृह विभाग व स्थानीय पुलिस) 2. रूपा एम.जे. (Roopa MJ) — सचिव, श्री चामुंडेश्वरी क्षेत्र विकास प्राधिकरण, मैसूरु (शिकायतकर्ता लोक सेवक)। |
| घटना का घटनाक्रम (12 दिसंबर 2024) | स्नेहमयी कृष्णा 12 दिसंबर 2024 को पुलिस थाने पहुंचे और श्री चामुंडेश्वरी क्षेत्र विकास प्राधिकरण की सचिव रूपा एम.जे. के विरुद्ध शिकायत दी कि वे ऐतिहासिक श्री चामुंडेश्वरी मंदिर से भक्तों द्वारा चढ़ाई गई कीमती साड़ियों की चोरी और अवैध बिक्री में लिप्त हैं। पुलिस ने तत्काल मुकदमा दर्ज करने के बजाय मामले की जानकारी लेने हेतु कृष्णा के साथ अधिकारी के कार्यालय कक्ष (चेंबर) का रुख किया। |
| लोक सेवक के आरोप | अधिकारी रूपा एम.जे. ने आरोप लगाया कि कृष्णा पुलिस के साथ उनके कार्यालय में आए, उन पर चिल्लाए और उन्हें “सबक सिखाने” की धमकी दी। उन्होंने आरोप लगाया कि कृष्णा ने यह डींग हांकी कि जब वे तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के विरुद्ध शिकायत दर्ज करा सकते हैं, तो एक महिला अधिकारी को परेशान करना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। |
| दर्ज कराई गई एफआईआर की धाराएं | भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS): • धारा 132 — लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने हेतु हमला या आपराधिक बल का प्रयोग (पूर्ववर्ती IPC धारा 353) • धारा 351 — आपराधिक धमकी (पूर्ववर्ती IPC धारा 506)। |
| प्राथमिकता में 2 दिन का विलंब | कथित घटना 12 दिसंबर 2024 को पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में घटी, किंतु अधिकारी द्वारा प्राथमिकी 14 दिसंबर 2024 को (48 घंटे के विलंब से) दर्ज कराई गई, जिसका कोई तार्किक कारण रिकॉर्ड पर नहीं दिया गया। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | आपराधिक याचिका स्वीकृत (Allowed); स्नेहमयी कृष्णा के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी और आरोप पत्र पूरी तरह निरस्त/रद्द (Quashed)। |
विधिक एवं आपराधिक न्यायशास्त्र: ‘भजन लाल सिद्धांत, धारा 132/351 BNS और जवाबी एफआईआर’
- ‘हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल’ [1992 Supp (1) SCC 335] की कसौटी (पैरा 102, श्रेणी 7):
- सर्वोच्च न्यायालय ने भजन लाल मामले में उन सात परिस्थितियों को निर्धारित किया था जिनमें उच्च न्यायालय को आपराधिक कार्यवाही रद्द कर देनी चाहिए।
- इसकी सातवीं श्रेणी स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि: “जहाँ कोई आपराधिक कार्यवाही स्पष्ट रूप से दुर्भावना से प्रेरित (Manifestly attended with mala fide) हो और जहाँ कार्यवाही किसी अभियुक्त से प्रतिशोध लेने और व्यक्तिगत द्वेष की पूर्ति के उद्देश्य से दुर्भावनापूर्ण रूप से संस्थित की गई हो, वहाँ अदालत को उसे तत्काल रद्द कर देना चाहिए।”
- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पाया कि स्नेहमयी कृष्णा का मामला सीधे तौर पर इस श्रेणी में आता है, क्योंकि जब उन्होंने अधिकारी की कथित अनियमितता (साड़ी चोरी) पर शिकायत दी, तभी अधिकारी ने अपने बचाव में दो दिन बाद यह जवाबी मुकदमा दर्ज कराया।
- BNS की धारा 132 (पूर्ववर्ती IPC 353) का विधिक विश्लेषण:
- किसी लोक सेवक को डराने या रोकने के अपराध हेतु यह अनिवार्य है कि अभियुक्त ने ‘हमला’ (Assault under Section 130 BNS) किया हो या ‘आपराधिक बल’ (Criminal Force under Section 129 BNS) का प्रयोग किया हो।
- केवल किसी अधिकारी के कार्यालय में जाकर तीखे सवाल पूछना, भ्रष्टाचार के आरोपों पर बहस करना या आवाज ऊंची करना ‘आपराधिक बल’ नहीं माना जा सकता। चेंबर में पुलिसकर्मियों की प्रत्यक्ष मौजूदगी यह दर्शाती है कि शारीरिक हमले या बल प्रयोग की कोई संभावना ही नहीं थी।
- BNS की धारा 351 (पूर्ववर्ती IPC 506) और अभिव्यक्ति:
- सर्वोच्च न्यायालय ने माणिक तनेजा बनाम कर्नाटक राज्य [(2015) 7 SCC 423] में व्यवस्था दी थी कि किसी व्यक्ति द्वारा यह कहना कि “मैं तुम्हारे खिलाफ कानूनी कार्रवाई करूंगा” या अपने द्वारा पूर्व में की गई कानूनी शिकायतों का उल्लेख करना ‘आपराधिक धमकी’ नहीं है।
- कृष्णा का यह कथन कि “मैंने मुख्यमंत्री के खिलाफ भी शिकायत की है”, उनके द्वारा कानून के दायरे में रहकर विधिक संघर्ष करने के पूर्व आचरण को दर्शाता है, न कि किसी शारीरिक हिंसा या जान-माल को क्षति पहुंचाने की धमकी को।
- अस्पष्टीकृत विलंब और पुलिस की उपस्थिति:
- आपराधिक न्याय का बुनियादी नियम है कि यदि कोई घटना पुलिस अधिकारियों की आंखों के सामने घटती है, तो पुलिस तुरंत संज्ञेय अपराध की एफआईआर दर्ज करती है।
- पुलिस का शांत रहना और स्वयं अधिकारी द्वारा दो दिन सोच-विचार कर शिकायत का मसौदा तैयार करना यह सिद्ध करता है कि यह एक सोची-समझी योजना के तहत आरटीआई कार्यकर्ता की आवाज दबाने का प्रयास था।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: कर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ बेंगलुरु (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: स्नेहमयी कृष्णा बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [Criminal Petition No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति राजेश राय के. (Justice Rajesh Rai K) (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: आपराधिक याचिका स्वीकृत; स्नेहमयी कृष्णा के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी, चार्जशीट और विचारण न्यायालय की संपूर्ण कार्यवाहियां पूरी तरह निरस्त/रद्द (Quashed)।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (आरटीआई कार्यकर्ता स्नेहमयी कृष्णा) की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता अरुणा एम. श्याम (Senior Advocate Aruna M Shyam) एवं सहयोगी विधिक टीम।
- प्रतिवादी राज्य एवं लोक सेवक की ओर से:
- अतिरिक्त राज्य लोक अभियोजक एवं संबंधित शासकीय अधिवक्तागण।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 528 (उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां — पूर्ववर्ती CrPC धारा 482)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 132 — लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने हेतु हमला या आपराधिक बल का प्रयोग (पूर्ववर्ती IPC धारा 353)
- धारा 351 — आपराधिक अभित्रास / धमकी (पूर्ववर्ती IPC धारा 506)
- धारा 129 व 130 — आपराधिक बल एवं हमले की विधिक परिभाषाएं
- आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांत:
- दुर्भावनापूर्ण प्रतिशोध और जवाबी एफआईआर पर रोक (Rule against Malicious Counterblast Prosecution)
- एफआईआर दर्ज करने में अकारण विलंब का प्रभाव (Effect of Unexplained Delay in Lodging FIR)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- आरटीआई कार्यकर्ता, लोक सेवक की जवाबदेही और दुर्भावनापूर्ण जवाबी अभियोजन का विधिक मानक: ‘जब कोई सामाजिक या आरटीआई कार्यकर्ता किसी लोक सेवक के विरुद्ध पद के दुरुपयोग या भ्रष्टाचार/चोरी के आरोपों पर शिकायत दर्ज कराने का प्रयास करता है, और उसके तुरंत बाद संबंधित लोक सेवक द्वारा कार्यकर्ता के खिलाफ सरकारी कार्य में बाधा और धमकी की जवाबी प्राथमिकी दर्ज कराई जाती है, तो अदालत को ऐसी कार्यवाही की सत्यता का सूक्ष्म परीक्षण करना अनिवार्य है; जहाँ घटना के समय पुलिस अधिकारी मौके पर मौजूद रहे हों और फिर भी दो दिनों तक कोई प्राथमिकी दर्ज न की गई हो, वहाँ यह अस्पष्टीकृत विलंब यह प्रमाणित करता है कि शिकायत केवल प्रतिशोध लेने और जवाबी हमला (Counterblast) करने के उद्देश्य से बाद में गढ़ी गई थी; किसी अधिकारी के कक्ष में जाकर भ्रष्टाचार के आरोपों पर तीखे प्रश्न पूछना या यह कहना कि शिकायतकर्ता पूर्व में उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी शिकायतें दर्ज करा चुका है, BNS की धारा 132 के तहत आपराधिक बल या धारा 351 के तहत आपराधिक धमकी का गठन नहीं करता; तथा आपराधिक न्याय प्रणाली का उपयोग नागरिकों और कार्यकर्ताओं को डराने या अपने प्रशासनिक कदाचार को छिपाने के लिए एक ढाल के रूप में करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, और ऐसी कार्यवाहियां अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होने के कारण निरस्त किए जाने योग्य हैं।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: कर्नाटक उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद आरटीआई कार्यकर्ता स्नेहमयी कृष्णा के विरुद्ध मैसूरु में दर्ज आपराधिक मामला और उसके आधार पर शुरू की गई अदालती कार्यवाही हमेशा के लिए समाप्त हो गई है; इस फैसले से उन विधिक व सामाजिक कार्यकर्ताओं को बड़ा न्यायिक संरक्षण मिला है जो सार्वजनिक विभागों में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा दर्ज कराए जाने वाले झूठे प्रतिशोधात्मक मुकदमों का सामना करते हैं।
Bona Fide Probe:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति राजेश राय के. (Justice Rajesh Rai K.) |
| केस / पक्षकार | स्नेहमयी कृष्णा बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य (Snehamayi Krishna v. State of Karnataka & Anr.) |
| प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ता पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता अरुणा एम. श्याम (Senior Advocate Aruna M. Shyam) |
| संबंधित कानून/प्रावधान | भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 132 (लोक सेवक को रोकने हेतु हमला/आपराधिक बल) एवं धारा 351 (आपराधिक धमकी) |
| मूल विवाद | 12 दिसंबर 2024 को मैसूरु के श्री चामुंडेश्वरी विकास प्राधिकरण की सचिव रूपा एम.जे. पर मंदिर की साड़ियों की चोरी का आरोप लगाने के बाद अधिकारी द्वारा कृष्णा के खिलाफ FIR दर्ज कराना। |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका स्वीकार (Petition Allowed): BNS की धारा 132 और 351 के तत्व अनुपस्थित; FIR और पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द। |

