Sunday, November 8, 2026
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Somnath Mandir: त्योहार का आनंद मिठाइयों के साथ लें, वेज-नॉनवेज एक तरफ रखें’: गुजरात के सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे में मांसाहारी भोजनालयों पर प्रतिबंध लगे रहेंगे

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मामले की पृष्ठभूमि और संवैधानिक तर्क

  1. हाईकोर्ट का घटनाक्रम (Single Judge vs Division Bench):जिला प्रशासन ने त्यौहारों के मौसम में मंदिर परिसर और श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं की रक्षा का हवाला देते हुए सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे में नॉन-वेज की बिक्री पर रोक लगाई थी। 30 अक्टूबर 2026 को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने रेस्टोरेंट मालिकों की याचिका स्वीकार करते हुए बैन हटा दिया था। हालांकि, उसी दिन गुजरात सरकार की अपील पर खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश पर स्टे लगाकर बैन दोबारा बहाल कर दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
  2. रेस्टोरेंट मालिकों के तर्क (Article 19(1)(g) & Article 21):वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने दलील दी कि देश की 80% आबादी मांसाहारी है और नागरिकों पर कोई विशिष्ट आहार थोपा नहीं जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि 40 वर्षों से चल रहे कारोबारों पर इस प्रकार का स्थायी प्रतिबंध अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता व आहार की पसंद) का उल्लंघन करता है।
  3. राज्य सरकार का रुख (Article 25 & Public Order):सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखते हुए कहा कि 2018 से मंदिर के 500 मीटर परिधि में ऐसा नियम लागू है और सरकार ने कॉरिडोर के बाहर व्यावसायिक गतिविधियां चलाने की अनुमति दी है। मंदिर के पास मांसाहार की बिक्री से श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हो सकती हैं और कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है।

मुख्य विधिक व संवैधानिक निष्कर्ष

1. धार्मिक स्वतंत्रता बनाम व्यापारिक अधिकार:

यह मामला अनुच्छेद 25 (धार्मिक आचरण व आस्था की रक्षा) और अनुच्छेद 19(1)(g) (आजीविका व व्यापार का अधिकार) के बीच के टकराव को दर्शाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थलों और धार्मिक केंद्रों के आसपास प्रतिबंधों का मूल्यांकन दोनों पक्षों के संतुलन के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

2. अंतरिम चरण पर हस्ताक्षेप न करने का सिद्धांत:

शीर्ष अदालत ने दोहराया कि जब उच्च न्यायालय में अपील पहले से लंबित हो (25 नवंबर 2026 को सुनवाई हेतु सूचीबद्ध), तब सर्वोच्च न्यायालय अंतरिम आदेशों में हस्तक्षेप करने के बजाय संवैधानिक अदालतों को तेजी से अंतिम निर्णय लेने का निर्देश देना अधिक उचित समझता है।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 (धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक स्थलों की पवित्रता व मर्यादा का अधिकार) बनाम अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार, व्यवसाय व आजीविका की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत पसंद व आहार की स्वायत्तता / Right to Dietary Choice), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 163 (पूर्ववर्ती CrPC धारा 144—सार्वजनिक शांति व धार्मिक भावनाओं को आहत होने से बचाने हेतु जिला मजिस्ट्रेट के निषेधाज्ञा आदेश), तथा गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा एकल पीठ के फैसले पर तुरंत रोक लगाकर प्रतिबंध बहाल किए जाने के विधिक मानकों के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश (Justice MM Sundresh) और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले (Justice PB Varale) की खंडपीठ ने गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे तथा निर्धारित सात मार्गों पर मांसाहारी भोजन के भंडारण, तैयारी और बिक्री पर लगे प्रतिबंध को अंतरिम स्तर पर हटाने से साफ इनकार (Refused to interfere) कर दिया। शीर्ष अदालत ने गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ के उस अंतरिम स्थगनादेश में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया, जिसने प्रतिबंध को बहाल रखा था।

पीठ ने रेस्टोरेंट मालिकों की उस दलील पर—कि देश में 80% लोग मांसाहार करते हैं और ऐसे प्रतिबंध से व्यवसाय पूरी तरह खत्म हो जाएगा—टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में “संतुलन बनाए रखना आवश्यक है (We need to maintain a balance)”। शीर्ष अदालत ने मामले को अंतिम रूप से तय करने के बजाय गुजरात उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि वह लंबित अपील पर दो महीने की अवधि के भीतर त्वरित और अंतिम निर्णय (Decide appeal expeditiously within 2 months) पारित करे।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘संतुलन आवश्यक; अंतरिम स्तर पर हम कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे’:

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने आजीविका के अधिकार और धार्मिक स्थल के आसपास की व्यवस्था के बीच संतुलन साधते हुए कहा: “हमें एक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है (We need to maintain a balance)। हम इस अंतरिम चरण पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं कर रहे हैं। चूंकि मामला अभी उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष लंबित है, अतः हम हाईकोर्ट से अनुरोध करेंगे कि वह सुनवाई में तेजी लाए और मामले का समयबद्ध निस्तारण करे।”

पीठ ने हल्के-फुल्के अंदाज में त्योहार के माहौल को रेखांकित करते हुए कहा: “रोशनी के त्योहार (दीपावली) का आनंद मिठाइयां खाकर मनाएं। वेज या नॉन-वेज को अभी एक तरफ रख दें।”

2. अनुच्छेद 25 पर संविधान पीठ के भावी फैसले का संदर्भ:

  • पीठ ने संकेत दिया कि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के समक्ष धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 व 26) और अन्य मौलिक अधिकारों के बीच टकराव के वृहद संवैधानिक प्रश्नों पर फैसला आना बाकी है।
  • अदालत ने कहा:“उम्मीद है कि अनुच्छेद 25 पर हमारा फैसला जल्द ही आएगा। उस फैसले का इस प्रकार के सभी मामलों पर एक गहरा और तात्विक प्रभाव (Substantive bearing) पड़ेगा।”

3. गुजरात हाईकोर्ट को 2 महीने में फैसला करने का निर्देश:

  • शीर्ष अदालत ने याचिका को निस्तारित करते हुए गुजरात हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह 25 नवंबर 2026 को निर्धारित सुनवाई को आगे बढ़ाते हुए दो माह के भीतर अंतिम फैसला सुनाए।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अगस्त – नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 136)
पीठन्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश (Justice MM Sundresh) एवं न्यायमूर्ति पी.बी. वराले (Justice PB Varale)
आदेश की तिथि6 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
केस संदर्भताज रेस्टोरेंट के मालिक आकिब अमीनभाई खान बनाम गुजरात राज्य व अन्य [SLP (Civil) No. … / 2026]
याचिकाकर्ता पक्षसोमनाथ मंदिर क्षेत्र में होटल, ढाबा और रेस्टोरेंट चलाने वाले स्थानीय मांसाहारी भोजनालय स्वामी।
याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्तावरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी (Senior Advocate Huzefa Ahmedi)।
प्रतिवादी पक्ष1. गुजरात राज्य (गृह विभाग व जिला प्रशासन गिर सोमनाथ)
2. सोमनाथ ट्रस्ट व स्थानीय नगरपालिका।
प्रतिवादी राज्य के विधि अधिकारीभारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta)।
विवादित प्रशासनिक आदेशजिला मजिस्ट्रेट, गिर सोमनाथ द्वारा जारी 10 अगस्त 2026 की अधिसूचना — जिसके तहत सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे और चयनित 7 मुख्य मार्गों पर दुकानों, होटलों, रेस्टोरेंट्स और ठेलों पर मांसाहारी भोजन बनाने, बेचने और रखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया।
एकल पीठ (Single Judge) का आदेश (30 अक्टूबर)गुजरात उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अधिसूचना के संचालन पर रोक लगा दी थी।
डिवीजन बेंच की तुरंत कार्रवाई (30 अक्टूबर)गुजरात सरकार ने उसी दिन अपील दायर की, जिस पर खंडपीठ ने आदेश की लिखित प्रति आने से पहले ही एकल पीठ के फैसले पर रोक लगा दी और प्रतिबंध को फिर से बहाल कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के मुख्य आधार1. आहार की स्वतंत्रता: नागरिक क्या खाते हैं, यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) का हिस्सा है; राज्य स्थायी रूप से खान-पान की आदतें तय नहीं कर सकता।
2. आजीविका पर आघात: पिछले 40 वर्षों से चल रहे भोजनालयों पर अचानक पूर्ण प्रतिबंध अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन है।
3. बिना आदेश प्रति के स्टे: एकल पीठ के आदेश की प्रति अपलोड होने से पूर्व ही खंडपीठ द्वारा हड़बड़ी में स्थगनादेश देना प्रक्रियात्मक रूप से अनुचित था।
राज्य सरकार (SG तुषार मेहता) का बचाव2018 से ही 500 मीटर का नियम लागू है; श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं, स्वच्छता और मंदिर परिसर की पवित्रता की रक्षा हेतु यह आवश्यक है; भोजनालयों को बंद नहीं किया गया है, उन्हें शाकाहारी भोजन परोसने की पूरी अनुमति है; हाईकोर्ट 25 नवंबर को सुनवाई कर रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम आदेशहाईकोर्ट के स्थगनादेश में हस्तक्षेप से इनकार; याचिका निस्तारित; हाईकोर्ट को 2 माह के भीतर अपील पर अंतिम फैसला देने का निर्देश।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘धार्मिक शुचिता बनाम आहार और व्यवसाय की स्वतंत्रता’

  • ‘ओम प्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ [(2004) 3 SCC 402] का ऐतिहासिक विधिक सिद्धांत:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने ऋषिकेश और मुनि-की-रेती नगरपालिकाओं में अंडों और मांसाहार की बिक्री पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को वैध ठहराते हुए व्यवस्था दी थी कि भारत के प्रमुख और प्राचीन तीर्थ स्थलों की एक विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक गरिमा होती है।
    • अदालत ने माना था कि तीर्थस्थलों के आसपास मांसाहार पर प्रतिबंध अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार के अधिकार का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि यह प्रतिबंध अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत एक ‘युक्तियुक्त निर्बंधन’ (Reasonable Restriction) है और दुकानदारों के पास शाकाहारी भोजन बेचने या मंदिर परिधि के बाहर व्यापार करने का विकल्प खुला रहता है।
  • अनुच्छेद 21 के तहत आहार की स्वायत्तता बनाम सार्वजनिक व्यवस्था:
    • वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने के.एस. पुट्टास्वामी और बिजो इमैनुएल निर्णयों का हवाला देते हुए सही तर्क रखा कि नागरिक क्या खाएं, यह उनकी निजता का हिस्सा है।
    • किंतु प्रशासनिक कानून में राज्य की निषेधाज्ञा शक्तियों का उपयोग किसी व्यक्ति की निजी थाली पर नियंत्रण के लिए नहीं, बल्कि मंदिर के 500 मीटर के सार्वजनिक गलियारे (Public Corridor) में सार्वजनिक प्रदर्शन, गंध, कचरा और श्रद्धालुओं की संवेदनशीलता के नियमन के लिए किया गया है।
  • न्यायिक संयम और अंतरिम अपीलीय सिद्धांत:
    • सर्वोच्च न्यायालय की सुस्थापित परिपाटी है कि जब उच्च न्यायालय की खंडपीठ किसी अंतरिम आदेश पर विचार कर रही हो और मुख्य मामले की अंतिम सुनवाई की तारीख (25 नवंबर) पहले से तय हो, तो शीर्ष अदालत सीधे हस्तक्षेप करने से बचती है।
    • सुप्रीम कोर्ट ने संतुलित रास्ता अपनाते हुए न तो प्रतिबंध को अवैध ठहराया और न ही व्यापारियों के अधिकारों को नकारा; बल्कि हाईकोर्ट को 60 दिनों में इस संवैधानिक प्रश्न को सुलझाने का स्पष्ट न्यायिक अधिदेश दिया।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 136)
  • केस संदर्भ: ताज रेस्टोरेंट के मालिक आकिब अमीनभाई खान बनाम गुजरात राज्य व अन्य [SLP (Civil) No. … / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश (Justice MM Sundresh) एवं न्यायमूर्ति पी.बी. वराले (Justice PB Varale)
  • आदेश की तिथि: 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
  • कार्यवाही का परिणाम: विशेष अनुमति याचिका पर अंतरिम राहत देने से इनकार; याचिका निस्तारित; गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ को 2 माह के भीतर अपील का अंतिम निस्तारण करने का निर्देश।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं (रेस्टोरेंट मालिकों) की ओर से:
    • वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी (Senior Advocate Huzefa Ahmedi) एवं सहयोगी विधिक टीम।
  • प्रतिवादी (गुजरात राज्य व सोमनाथ ट्रस्ट) की ओर से:
    • भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 25 व 26 — अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म को अबाध रूप से मानने और धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार
      • अनुच्छेद 19(1)(g) सहपठित 19(6) — व्यापार और कारोबार की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन
      • अनुच्छेद 21 — व्यक्तिगत जीवन, गरिमा और भोजन की स्वायत्तता का अधिकार
      • अनुच्छेद 136 — विशेष अनुमति याचिका क्षेत्राधिकार
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 163 (पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 — उपद्रव या आशंकित खतरे के निवारण हेतु निषेधाज्ञा)
    • गुजरात पुलिस अधिनियम एवं संबंधित स्थानीय निकाय स्वच्छता नियम
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • धार्मिक तीर्थस्थलों की परिधि, मांसाहार प्रतिबंध और आजीविका के संतुलन का विधिक मानक: ‘प्रमुख ऐतिहासिक एवं पौराणिक धार्मिक तीर्थस्थलों के आसपास की सार्वजनिक परिधि (500 मीटर का दायरा) में मांसाहारी भोजन की तैयारी, खुले प्रदर्शन और बिक्री पर रोक लगाना श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं, स्वच्छता और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा हेतु एक वैध प्रशासनिक कदम माना जा सकता है; यह प्रतिबंध व्यापारियों को पूरी तरह आजीविका से वंचित नहीं करता क्योंकि वे उस क्षेत्र में शाकाहारी भोजन का व्यवसाय करने या अधिसूचित सीमा से बाहर मांसाहारी प्रतिष्ठान चलाने हेतु स्वतंत्र रहते हैं; आहार का अधिकार व्यक्तिगत निजता का अंग है, किंतु सार्वजनिक तीर्थ गलियारों में इसका प्रयोग करते समय धार्मिक मर्यादा और जनभावनाओं के साथ एक संवेदनशील संतुलन (Maintaining a balance) साधना आवश्यक है; तथा जहाँ उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष अपील अंतिम चरण में हो, वहाँ शीर्ष अदालत अंतरिम स्थगनादेश में हस्तक्षेप करने के बजाय उच्च न्यायालय को त्वरित अंतिम निर्णय हेतु निर्देशित करना उचित समझती है।’
  • वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद गुजरात के सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे और संबंधित 7 मार्गों पर मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री, भंडारण और निर्माण पर लगा प्रतिबंध फिलहाल पूरी तरह प्रभावी बना रहेगा; अब सारा दारोमदार गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ पर है, जो 25 नवंबर 2026 से इस मामले की दैनिक/त्वरित सुनवाई शुरू कर आगामी 2 महीनों के भीतर 10 अगस्त की विवादित अधिसूचना की संवैधानिक वैधता पर अपना अंतिम निर्णय सुनाएगी।

Somnath Mandir:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति पी. बी. वराले
केस / याचिकाकर्ताताज रेस्टोरेंट के मालिक आकिब अमीनभाई खान बनाम गुजरात राज्य व अन्य (Taj Restaurant Owner Aakib Aminbhai Khan v. State of Gujarat & Ors.)
प्रतिनिधित्वरेस्टोरेंट मालिक: वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी (Senior Advocate Huzefa Ahmedi) | गुजरात सरकार: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta)
विवादास्पद अधिसूचनाजिला मजिस्ट्रेट द्वारा 10 अगस्त 2026 को जारी अधिसूचना, जिसने सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे सहित 7 प्रमुख इलाकों में नॉन-वेज की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया।
अदालत का आदेशअपील निस्तारित: हाईकोर्ट के अंतरिम स्टे पर रोक लगाने से इनकार; गुजरात हाईकोर्ट को 2 महीने (नवंबर 25 की अगली सुनवाई के बाद) के भीतर अंतिम फैसला सुनाने का निर्देश।
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