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मामले की पृष्ठभूमि और अदालती कार्यवाही
- जुलाई 2023 का वायरल वीडियो और SC का हस्तक्षेप:4 मई 2023 की इस भयावह घटना का वीडियो जुलाई 2023 में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिससे पूरे देश में आक्रोश फैल गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपी थी और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए केस को मणिपुर से गुवाहाटी (असम) की विशेष सीबीआई अदालत में स्थानांतरित कर दिया था।
- आरोपी पर आरोप:युमलेमबम जीबन सिंह पर महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने का वीडियो अपने मोबाइल से रिकॉर्ड करने और अन्य आरोपियों के साथ साझा कर उसे फैलाने का आरोप है। उसे 20 जुलाई 2023 को गिरफ्तार किया गया था। जनवरी 2026 में गुवाहाटी की विशेष सीबीआई अदालत ने सिंह सहित छह आरोपियों के खिलाफ हत्या, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोप तय (Charge Frame) किए थे।
- ट्रायल की वर्तमान गति और देरी के कारण:सर्वोच्च न्यायालय ने 5 अक्टूबर को निर्देश दिया था कि तीनों पीड़ित महिलाओं के बयान व गवाही जल्द से जल्द पूरी की जाए। सुनवाई के दौरान प्रॉसीक्यूशन ने बताया कि अक्टूबर की निर्धारित तारीखों पर तीसरी पीड़िता का मुख्य परीक्षण (Examination-in-chief) पूरा हो चुका है, लेकिन बचाव पक्ष का कहना था कि दुभाषिए (Interpreter) को डेंगू होने जैसी प्रशासनिक बाधाओं के कारण जिरह (Cross-examination) रुकी रही।
मुख्य विधिक व प्रक्रियात्मक पहलू
1. पीड़ित गवाहों की सुरक्षा व समयबद्ध साक्ष्य:
शीर्ष अदालत ने माना कि यह एक बेहद संवेदनशील मामला है। कोर्ट ने आरोपी की जमानत पर तुरंत फैसला सुनाने के बजाय पहले तीनों पीड़ित महिलाओं के बयानों और गवाही की प्रक्रिया को निर्बाध रूप से पूरा कराने को प्राथमिकता दी है।
2. अगली सुनवाई:
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह गुवाहाटी की विशेष अदालत के समक्ष निर्धारित तिथियों में तीसरी पीड़िता की उपस्थिति सुनिश्चित करे ताकि उसकी गवाही और जिरह पूरी हो सके। इसके बाद ही जीबन सिंह की जमानत अर्जी पर विचार किया जाएगा।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (त्वरित विचारण का अधिकार / Right to Speedy Trial बनाम जघन्य अपराधों में जमानत के विधिक मानक), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 439 (जमानत की शक्तियां), अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act), तथा यौन हिंसा व सामाजिक जातीय हिंसा के मुकदमों में विशेष अदालतों के अंतर-राज्यीय विचारण (Inter-State Trial) के संचालन पर सर्वोच्च न्यायालय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुनवाई हुई है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) और न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ के समक्ष मणिपुर जातीय हिंसा (2023) के दौरान थौबल जिले में कुकी-जो (Kuki-Zo) समुदाय की महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने और उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य घटना के मुख्य आरोपी युमलेम्बम जीबन सिंह (Yumlembam Jiban Singh) की नियमित जमानत याचिका सुनवाई हेतु प्रस्तुत हुई।
आरोपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार दिए गए निर्देशों के बावजूद गुवाहाटी स्थित विशेष सीबीआई अदालत में मुकदमे की अत्यधिक धीमी गति का हवाला देते हुए जमानत पर रिहा करने का आग्रह किया। खंडपीठ ने यह दर्ज करते हुए कि तीन में से अब तक केवल एक पीड़िता की ही जिरह पूरी हो सकी है और तीसरी पीड़िता का मुख्य परीक्षण (Examination-in-chief) समाप्त हो चुका है, अभियोजन पक्ष (CBI) को निर्देश दिया कि वह निर्धारित तिथियों में तीसरी पीड़िता को अदालत में पेश कर उसकी गवाही और प्रति-परीक्षा (Cross-examination) तत्काल पूरी कराए। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता की गवाही पूरी होने के पश्चात ही आरोपी की जमानत अर्जी पर मेरिट के आधार पर विचार किया जाएगा।
शीर्ष अदालत के समक्ष विधिक दलीलें एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. बचाव पक्ष की दलील: ‘लगातार निर्देशों के बावजूद ट्रायल आगे नहीं बढ़ रहा’:
आरोपी युमलेम्बम जीबन सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने विचारण की जमीनी स्थिति पर प्रकाश डालते हुए दलील दी: “शीर्ष अदालत के जुलाई माह से दो-तीन बार लगातार त्वरित सुनवाई के स्पष्ट निर्देश देने के बावजूद, आज तक केवल डेढ़ गवाह (साढ़े तीन महीने में एक पूरी पीड़िता और एक की आंशिक गवाही) की ही जांच हो पाई है। यही जमीनी हकीकत है। अदालत ने 5 अक्टूबर को तीनों पीड़ित महिलाओं के बयान पूरे करने का निर्देश दिया था, किंतु कभी दुभाषिए (Interpreter) को डेंगू होने तो कभी अन्य प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण सुनवाई टलती रही है। ट्रायल आगे नहीं बढ़ रहा है, यही हमारी सबसे बड़ी कानूनी चुनौती है। आरोपी 20 जुलाई 2023 से (तीन वर्षों से अधिक समय से) लगातार जेल में बंद है, अतः उसे जमानत पर रिहा किया जाए।”
2. अभियोजन (CBI/केंद्र सरकार) का प्रतिवाद: ‘लगातार तिथियां तय की गई हैं’:
- अभियोजन पक्ष की ओर से पेश अपर सॉलिसिटर जनरल (ASG) रहा ठाकरे (ASG Raha Thakre) एवं अधिवक्ता डी.पी. सिंह (Advocate DP Singh) ने अदालत को आश्वस्त किया:“विशेष सीबीआई अदालत ने गवाहियों को बिना किसी व्यवधान के पूरा करने के लिए लगातार तारीखें नियत की हैं। तीसरी पीड़िता का मुख्य परीक्षण (Examination-in-Chief) पूरा हो चुका है। शेष जिरह (Cross-examination) को निर्धारित तारीखों में पूरा कर लिया जाएगा। अभियोजन गवाहों की सुरक्षा और पेशी सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”
3. सर्वोच्च न्यायालय का प्रक्रियात्मक रुख:
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने रिकॉर्ड पर दर्ज किया कि तीनों में से केवल एक पीड़िता की ही गवाही पूर्ण हो सकी है, जबकि दूसरी की जिरह प्रक्रियाधीन है।
- अदालत ने निर्देश दिया कि अभियोजन पक्ष तय तिथियों पर तीसरी पीड़िता को विशेष अदालत के समक्ष उपस्थित करे ताकि उसका बयान पूरा हो सके। इसके बाद ही जमानत अर्जी को आगे की सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया जाएगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2023–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता / अभियुक्त | युमलेम्बम जीबन सिंह (Yumlembam Jiban Singh) — गिरफ्तार आरोपी (20 जुलाई 2023 से हिरासत में)। |
| प्रतिवादी पक्ष | केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) / भारत संघ। |
| अभियुक्त पर विशिष्ट आरोप | याचिकाकर्ता पर आरोप है कि उसने 4 मई 2023 को महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाए जाने का वीडियो अपने मोबाइल कैमरे से रिकॉर्ड किया था और उसे अन्य आरोपियों के साथ साझा कर सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित कराने में सक्रिय आपराधिक भूमिका निभाई थी। |
| घटना का विवरण (4 मई 2023) | मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा के दौरान थौबल जिले के बी. फीनोम गांव में एक सशस्त्र भीड़ ने कुकी-जो समुदाय की तीन महिलाओं को बंधक बनाकर निर्वस्त्र कर खेतों में घुमाया था। इस दौरान दो महिलाओं के साथ कथित रूप से सामूहिक बलात्कार किया गया और पीड़िता के पिता व भाई की नृशंस हत्या कर दी गई थी। |
| सीबीआई जांच व अंतर-राज्यीय स्थानांतरण | जुलाई 2023 में वीडियो वायरल होने के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया था। स्थानीय स्तर पर निष्पक्ष विचारण की संभावना न होने के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने जांच सीबीआई को सौंपी और मुकदमे का विचारण मणिपुर से बाहर गुवाहाटी (असम) की विशेष सीबीआई अदालत में स्थानांतरित कर दिया था। |
| आरोप निर्धारण (जनवरी 2026) | गुवाहाटी की विशेष अदालत ने जनवरी 2026 में जीबन सिंह सहित छह मुख्य आरोपियों के खिलाफ हत्या, सामूहिक बलात्कार, शीलभंग, दंगा और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत औपचारिक आरोप तय किए थे। |
| वर्तमान विधिक विवाद | अभियुक्त ने इस आधार पर जमानत मांगी कि घटना के 3 वर्ष से अधिक बीत जाने और 10 महीने पहले आरोप तय होने के बावजूद अब तक अभियोजन पक्ष तीनों प्रमुख पीड़ित गवाहों के बयान दर्ज नहीं करा सका है, जो अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित विचारण के अधिकार का उल्लंघन है। |
| सुप्रीम कोर्ट का निर्देश | गवाह (पीड़िता) को लगातार निर्धारित तारीखों पर पेश कर उसकी जिरह समाप्त की जाए; उसके पश्चात जमानत अर्जी को सूचीबद्ध किया जाए। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 21 (त्वरित विचारण) बनाम गवाहों के साक्ष्य की शुचिता’
- जघन्य मामलों में गवाही से पूर्व जमानत पर न्यायिक आत्मसंयम:
- सर्वोच्च न्यायालय ने कल्याण चंद्रा सरकार बनाम राजेश रंजन [(2004) 7 SCC 528] और प्रमोद कुमार सक्सेना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में यह सुस्थापित किया है कि भले ही त्वरित सुनवाई अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है, किंतु सामूहिक बलात्कार और नरसंहार जैसे जघन्य अपराधों में जब तक मुख्य पीड़ित गवाहों के बयान सुरक्षित रूप से दर्ज नहीं हो जाते, तब तक अभियुक्त को जमानत पर रिहा नहीं किया जाना चाहिए।
- यदि मुख्य पीड़िता की प्रति-परीक्षा से पूर्व आरोपी को रिहा किया जाता है, तो गवाहों को डराने, धमकाने या मुकरने (Hostile) के लिए विवश किए जाने की प्रबल आशंका रहती है।
- अंतर-राज्यीय विचारण की जटिलताएं और देरी का औचित्य:
- चूंकि यह मुकदमा गुवाहाटी में चल रहा है और पीड़िताएं तथा गवाह मणिपुर के विस्थापित राहत शिविरों या दूरदराज के पर्वतीय इलाकों में रह रहे हैं, इसलिए उन्हें भाषा अनुवादकों (Interpreters), सुरक्षा प्रोटोकॉल और कानूनी सहायता के साथ असम ले जाना एक चुनौतीपूर्ण प्रशासनिक कार्य है।
- शीर्ष अदालत ने पाया कि यह देरी जानबूझकर की गई शिथिलता नहीं है, बल्कि दुभाषिए की बीमारी जैसी वास्तविक व्यावहारिक बाधाओं के कारण हुई है।
- संतुलित विधिक दृष्टिकोण:
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने आरोपी के जमानत के अधिकार को पूरी तरह खारिज नहीं किया, बल्कि उसे ‘गवाहों के साक्ष्य समाप्त होने’ की शर्त के साथ जोड़ दिया।
- अदालत ने अभियोजन पक्ष को लगातार तारीखों में जिरह समाप्त करने का अल्टीमेटम देकर यह स्पष्ट कर दिया कि यदि अभियोजन ने अब भी लापरवाही दिखाई, तो अभियुक्त का जमानत का दावा विधिक रूप से अत्यंत मजबूत हो जाएगा।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: युमलेम्बम जीबन सिंह बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) [Special Leave to Appeal (Crl.) … / 2026]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- सुनवाई की तिथि: 3 नवंबर 2026
- कार्यवाही का स्वरूप: नियमित जमानत अर्जी पर अंतरिम आदेश; विशेष अदालत में गवाही पूरी कराने का निर्देश।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (आरोपी युमलेम्बम जीबन सिंह) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत (Senior Advocate Shadan Farasat)।
- अभियोजन (सीबीआई / भारत संघ) की ओर से: अपर सॉलिसिटर जनरल (ASG) रहा ठाकरे (ASG Raha Thakre) एवं अधिवक्ता डी.पी. सिंह (Advocate DP Singh)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं त्वरित विचारण का अधिकार)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 439 (उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय की जमानत के संबंध में विशेष शक्तियां) एवं धारा 309 (दिन-प्रतिदिन विचारण की अनिवार्यता)
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC):
- धारा 302 — हत्या
- धारा 376D — सामूहिक बलात्कार (Gang Rape)
- धारा 354B — महिला को निर्वस्त्र करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग
- धारा 149 / 120B — विधि-विरुद्ध जमाव व आपराधिक षड्यंत्र
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) — धारा 3(2)(v)
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) — धारा 67/67A (यौन स्पष्ट डिजिटल सामग्री का प्रसारण)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- जघन्य अपराधों में त्वरित विचारण बनाम गवाह सुरक्षा का विधिक मानक: ‘त्वरित विचारण का अधिकार (Right to Speedy Trial) संविधान के अनुच्छेद 21 का आवश्यक घटक है, किंतु गंभीर जातीय व यौन अपराधों में जहाँ विचारण सुरक्षा कारणों से अन्य राज्य में स्थानांतरित किया गया हो, विचारण की गति के साथ-साथ गवाहों के साक्ष्य की शुचिता और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए; जब तक प्रमुख पीड़ित गवाहों का मुख्य परीक्षण और जिरह पूरी नहीं हो जाती, तब तक अभियुक्त को जमानत पर रिहा करने से गवाहों पर अनुचित दबाव का गंभीर जोखिम रहता है; अभियोजन का वैधानिक दायित्व है कि वह दिन-प्रतिदिन सुनवाई सुनिश्चित कर पीड़ितों के बयान शीघ्र दर्ज कराए ताकि अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पीड़ितों के न्याय के अधिकार के बीच संतुलन बना रहे।’
- वर्तमान स्थिति व आगामी प्रक्रिया: गुवाहाटी स्थित विशेष सीबीआई अदालत में तीसरी पीड़िता का साक्ष्य और जिरह पूरी करने की प्रक्रिया तय की गई है; अभियोजन पक्ष द्वारा जिरह पूर्ण होने का औपचारिक प्रतिवेदन सर्वोच्च न्यायालय में पेश किए जाने के बाद ही अभियुक्त युमलेम्बम जीबन सिंह की नियमित जमानत याचिका पर अंतिम आदेश हेतु पुनः सुनवाई होगी।
Manipur Video Case: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | CJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता/आरोपी | युमलेमबम जीबन सिंह (Yumlembam Jiban Singh – वीडियो रिकॉर्ड कर वायरल करने का आरोपी) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता शदान फरासत |
| प्रॉसीक्यूशन/CBI | अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) राहा ठाकरे एवं अधिवक्ता डी.पी. सिंह |
| मूल घटना | 4 मई 2023 को मणिपुर के थोउबल (Thoubal) जिले में 3 कुकी-ज़ो महिलाओं को भीड़ द्वारा निर्वस्त्र घुमाने, गैंगरेप और उनके परिजनों की हत्या की घटना। |
| ट्रायल की स्थिति | सीबीआई (CBI) द्वारा जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मुकदमा गुवाहाटी की विशेष अदालत में स्थानांतरित। केवल 1 पीड़िता की गवाही पूरी हुई है, बाकी प्रक्रिया जारी। |
| अदालत का अंतरिम निर्देश | जमानत पर सुनवाई स्थगित: सीबीआई को तय तारीखों में तीसरी पीड़िता का साक्ष्य दर्ज कराने का निर्देश; साक्ष्य पूरा होने के बाद जमानत याचिका पर अगली सुनवाई होगी। |

