Saturday, November 7, 2026
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Judge Suspend: सिक्किम हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने मंगन के जिला जज को किया निलंबित; सुप्रीम कोर्ट में HC जज पर प्रताड़ना के आरोप लगाने के कुछ हफ्तों बाद कार्रवाई

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मामले की पृष्ठभूमि और विधिक घटनाक्रम

  1. फुल कोर्ट के निलंबन के मुख्य आधार:
    • वित्तीय व प्रशासनिक विसंगतियां: आरोप है कि रजिस्ट्रार जनरल के कार्यकाल के दौरान प्रज्वल खटीवड़ा ने पर्याप्त कानूनी या प्रशासनिक आधार के बिना पदोन्नतियां और अपग्रेडेशन दिए, जिससे राज्य को लगभग ₹1.64 करोड़ का नुकसान हुआ।
    • उच्चाधिकारियों की मंजूरी का तर्क खारिज: फुल कोर्ट ने अधिकारी का यह तर्क खारिज कर दिया कि ये फैसले मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी से लिए गए थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल उच्च स्वीकृति मिलना किसी अधिकारी की व्यक्तिगत प्रशासनिक जिम्मेदारी को समाप्त नहीं करता।
    • अभद्र भाषा व अनुशासनहीनता: अधिकारी द्वारा दो कारण बताओ नोटिस के जवाबों में अपनाए गए तीखे और आक्रामक रुख तथा बार-बार निर्देश देने के बावजूद अपनी ACR रिपोर्ट प्रस्तुत न करने को न्यायिक अनुशासन के विपरीत माना गया।
  2. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका (Article 32):न्यायाधीश प्रज्वल खटीवड़ा ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 12 अगस्त के कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी थी। उन्होंने दावा किया था कि 12 दिसंबर 2025 को एक तत्कालीन हाईकोर्ट जज (जो बाद में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने) के खिलाफ दुर्व्यवहार की शिकायत करने के बाद से उन्हें प्रशासनिक स्तर पर प्रताड़ित किया जा रहा है। 9 सितंबर 2026 को CJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना उन्हें सिक्किम हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी थी।
  3. न्यायिक अधिकारी का बचाव:33 आरोपों वाले चार्जशीट के जवाब में खटीवड़ा ने दलील दी कि अनुच्छेद 229 के तहत नियुक्तियां और पदोन्नतियां मुख्य न्यायाधीश के अधिकार क्षेत्र में आती हैं और उनकी भूमिका केवल नोटिंग और फाइल रखने तक सीमित थी। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के 18 मई 2026 के आदेश का हवाला दिया कि रजिस्ट्रार जनरल केवल मुख्य न्यायाधीश की ओर से काम करता है। इसके अतिरिक्त, पदोन्नतियां विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) द्वारा स्वीकृत थीं, जिसमें वे केवल एक सदस्य थे।

मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष

1. रजिस्ट्रार जनरल की स्वतंत्र प्रशासनिक जवाबदेही:

यह निर्णय स्थापित करता है कि उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल (RG) जैसे शीर्ष प्रशासनिक पद पर आसीन अधिकारी केवल मुख्य न्यायाधीश या समिति के आदेशों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। वित्तीय और नियमों के विपरीत किए गए प्रशासनिक फैसलों के लिए व्यक्तिगत जांच और कार्यवाही वैध है।

2. न्यायिक अधिकारियों से अपेक्षित आचरण व भाषा:

हाईकोर्ट के फुल कोर्ट का आदेश यह स्पष्ट करता है कि कारण बताओ नोटिस का जवाब देते समय किसी भी न्यायिक अधिकारी से उच्च स्तरीय प्रशासनिक मर्यादा, संयम और विधिक भाषा की अपेक्षा की जाती है। अभद्र या आक्रामक रुख स्वयं में अनुशासनात्मक कार्यवाही का आधार बन सकता है।

गंगटोक: भारत का संविधान के अनुच्छेद 235 (अधीनस्थ न्यायालयों और न्यायिक अधिकारियों पर उच्च न्यायालय का पूर्ण प्रशासनिक व अनुशासनात्मक नियंत्रण), अनुच्छेद 229 (उच्च न्यायालय के अधिकारियों व सेवकों की नियुक्ति व सेवा शर्तें), सिक्किम न्यायिक सेवा नियमावली (Sikkim Judicial Service Rules), तथा न्यायिक सेवा में ‘अनुशासनात्मक जांच लंबित रहने के दौरान निलंबन’ (Suspension Pending Disciplinary Proceedings) के स्थापित सिद्धांतों के तहत सिक्किम उच्च न्यायालय की फुल कोर्ट (Full Court) ने राज्य न्यायपालिका से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील और अभूतपूर्व मामले में कठोर अनुशासनात्मक निर्णय लिया है।

सिक्किम उच्च न्यायालय की फुल कोर्ट द्वारा 4 नवंबर 2026 को पारित एक औपचारिक आदेश के तहत मंगन (Mangan) के जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रज्वल खतिवड़ा (Prajwal Khatiwada) को तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspended with immediate effect) कर दिया गया है।

यह निलंबन उस घटनाक्रम के कुछ ही सप्ताह बाद सामने आया है जब जिला जज खतिवड़ा ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर कर यह गंभीर आरोप लगाया था कि उच्च न्यायालय के एक तत्कालीन आसीन न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत करने के कारण उन्हें सुनियोजित प्रशासनिक प्रतिशोध (Targeted Victimisation) का शिकार बनाया जा रहा है। हालांकि, फुल कोर्ट के 4 नवंबर के निलंबन आदेश में उनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका या हाईकोर्ट जज के विरुद्ध दी गई शिकायत का कोई उल्लेख नहीं किया गया है; बल्कि निलंबन का आधार उनके पूर्व रजिस्ट्रार जनरल कार्यकाल के दौरान की गई वित्तीय व सेवा अनियमितताओं, सतर्कता जांच में बाधा डालने और कारण बताओ नोटिसों के आक्रामक व असम्मानजनक उत्तरों को बनाया गया है।

फुल कोर्ट के निलंबन आदेश के मुख्य विधिक आधार

फुल कोर्ट ने दर्ज किया कि जिला जज द्वारा दो कारण बताओ नोटिसों पर दिए गए स्पष्टीकरण प्रथम दृष्टया संतोषजनक नहीं थे और विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित रहने तक उनका न्यायिक पद पर बने रहना “उचित न्याय प्रशासन के अनुकूल नहीं (Not conducive to the proper administration of justice)” है। आदेश में निम्नलिखित प्रमुख आधार गिनाए गए:

1. रजिस्ट्रार जनरल के कार्यकाल में अनियमित नियुक्तियां व ₹1.64 करोड़ का वित्तीय नुकसान:

  • प्राथमिक आरोप उनके सिक्किम हाईकोर्ट के महानिबंधक (Registrar General) पद पर रहने के दौरान का है। आरोप है कि उन्होंने पर्याप्त कानूनी या प्रशासनिक आधार के बिना कर्मचारियों की पदोन्नतियां और वेतन अपग्रेडेशन किए तथा सेवा नियमों के विपरीत नियुक्तियां कीं।
  • फुल कोर्ट के आदेश के अनुसार, इन अनियमित प्रशासनिक निर्णयों के कारण राजकोष को लगभग ₹1.64 करोड़ की वित्तीय क्षति (Financial loss of about ₹1.64 crore) हुई।
  • फुल कोर्ट ने खतिवड़ा के इस बचाव को सिरे से खारिज कर दिया कि ये सभी कदम मुख्य न्यायाधीश के अनुमोदन से उठाए गए थे। अदालत ने व्यवस्था दी:“उच्च स्तर से प्राप्त प्रशासनिक अनुमोदन (Higher Approval), अपने आप में, किसी न्यायिक अधिकारी को उसकी स्वतंत्र विधिक जिम्मेदारी (Independent Responsibility) से पूरी तरह मुक्त या दोषमुक्त नहीं कर सकता।”

2. सतर्कता जांच में हस्तक्षेप और एसीआर (ACR) जमा न करना:

  • 6 अगस्त 2026 का संचार: खतिवड़ा पर आरोप है कि उन्होंने आधिकारिक पत्र लिखकर यह सवाल उठाया कि उनके खिलाफ चल रही सतर्कता जांच (Vigilance Enquiry) में गवाहों के बयान किस प्रकार और किस प्रक्रिया से दर्ज किए गए, जो जांच में अनुचित हस्तक्षेप माना गया।
  • वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR): बार-बार प्रशासनिक निर्देश दिए जाने के बावजूद उन्होंने अपनी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की।

3. न्यायिक अधिकारी के अशोभनीय आचरण और जवाबों का आक्रामक लहजा:

  • आदेश में उनके विरुद्ध “एक न्यायिक अधिकारी के पद के प्रतिकूल आचरण (Conduct unbecoming of a judicial officer)” के आरोपों को दर्ज किया गया है (यद्यपि इन पर अंतिम निर्णय अनुशासनात्मक जांच पूरी होने पर होगा)।
  • इसके अतिरिक्त, फुल कोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि जिला जज द्वारा कारण बताओ नोटिसों पर दिए गए जवाबों का लहजा अत्यंत उग्र, असंयमित और आरोप लगाने वाला (Intemperate and accusatory approach) था, जो न्यायिक अनुशासन के सर्वथा विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट में जिला जज द्वारा दायर याचिका (अनुच्छेद 32) का विधिक संदर्भ

निलंबन से पूर्व जिला जज प्रज्वल खतिवड़ा ने सीधे भारत के सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था, जिससे न्यायपालिका के आंतरिक विवाद सार्वजनिक पटल पर आ गए थे:

  • 12 दिसंबर 2025 की मूल शिकायत:
    • खतिवड़ा की याचिका के अनुसार, सारा विवाद तब शुरू हुआ जब उन्होंने 12 दिसंबर 2025 को सिक्किम हाईकोर्ट के एक तत्कालीन आसीन न्यायाधीश के विरुद्ध औपचारिक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनके साथ दुर्व्यवहार और उन्हें अपमानित किया गया था।
    • याचिका में दावा किया गया कि उक्त शिकायत के कुछ ही दिनों बाद उन न्यायाधीश महोदय को उच्च न्यायालय का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting Chief Justice) नियुक्त कर दिया गया।
  • लगातार प्रशासनिक कार्रवाइयों का आरोप:
    • खतिवड़ा का आरोप था कि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का पदभार संभालते ही उनके खिलाफ प्रतिशोध की भावना से एक के बाद एक प्रशासनिक कार्यवाहियां, कारण बताओ नोटिस और अनुशासनात्मक जांचें शुरू कर दी गईं।
  • सर्वोच्च न्यायालय का आदेश (9 सितंबर 2026):
    • जब खतिवड़ा ने 12 अगस्त 2026 के कारण बताओ नोटिस के खिलाफ अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दाखिल की, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने 9 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई की।
    • शीर्ष अदालत ने याचिका के गुण-दोष (Merits) पर कोई भी टिप्पणी किए बिना खतिवड़ा को यह स्वतंत्रता (Liberty) दी कि वे अपने विधिक उपचारों हेतु सीधे उच्च न्यायालय के समक्ष जाएं, और इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका निस्तारित कर दी थी।

जिला जज प्रज्वल खतिवड़ा का विधिक बचाव (Statement of Defence)

अपने खिलाफ जारी 33 आरोपों के आरोप पत्र (33 Articles of Charge) के लिखित जवाब में जिला जज खतिवड़ा ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए जांच की वैधानिकता पर सवाल उठाए हैं:

  • अनुच्छेद 229 के तहत मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार:
    • खतिवड़ा ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के कर्मचारियों की नियुक्तियां, पदोन्नतियां और वेतन अपग्रेडेशन संविधान के अनुच्छेद 229 के तहत केवल और केवल उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश के अनन्य और संप्रभु निर्णय होते हैं।
    • बतौर महानिबंधक (RG), उनकी भूमिका केवल मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों के अनुसार प्रशासनिक फाइलें, प्रस्ताव और नोट्स तैयार कर अनुमोदन हेतु प्रस्तुत करने तक सीमित थी।
  • सुप्रीम कोर्ट के 18 मई 2026 के आदेश का हवाला:
    • उन्होंने शीर्ष अदालत के 18 मई 2026 के निर्णय पर भरोसा जताया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि एक रजिस्ट्रार जनरल स्वतंत्र संप्रभु शक्ति नहीं रखता, बल्कि वह केवल मुख्य न्यायाधीश और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की ओर से और उनके निर्देशों पर ही प्रशासनिक कार्य निष्पादित करता है।
  • विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) का सामूहिक निर्णय:
    • खतिवड़ा ने दलील दी कि संबंधित कर्मचारियों की पदोन्नतियां विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) द्वारा सर्वसम्मति से अनुशंसित (Unanimously recommended) की गई थीं। वे उस समिति के केवल एक सदस्य थे; ऐसे में पूरी समिति को छोड़कर केवल उन्हें अकेले निशाना बनाना प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।
  • प्राकृतिक न्याय और प्रक्रियात्मक खामियों के आरोप:
    • उन्होंने शिकायत की कि उन्हें अपना बचाव तैयार करने हेतु अनिवार्य और महत्वपूर्ण दस्तावेज—विशेषकर फुल कोर्ट की कार्यवाहियों के कार्यवृत्त (Full Court Minutes)—उपलब्ध नहीं कराए गए।
    • 33 गंभीर आरोपों का जवाब देने के लिए अदालती छुट्टियों सहित केवल 30 दिनों का अत्यंत संक्षिप्त समय दिया गया।
    • इसके अतिरिक्त, कई नए आरोप प्रारंभिक कारण बताओ नोटिस में शामिल नहीं थे और उन्हें सीधे अंतिम चार्ज मेमोरेंडम में पहली बार जोड़ा गया।

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मामले की तथ्यात्मक रूपरेखा एवं प्रक्रियात्मक विवरण

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / प्राधिकारीसिक्किम उच्च न्यायालय, गंगटोक (फुल कोर्ट — संपूर्ण उच्च न्यायालय पीठ)
निलंबन आदेश की तिथि4 नवंबर 2026
निलंबित न्यायिक अधिकारीप्रज्वल खतिवड़ा (Prajwal Khatiwada) — जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मंगन, सिक्किम (पूर्व रजिस्ट्रार जनरल, सिक्किम हाईकोर्ट)।
निलंबन का विधिक स्वरूपअनुशासनात्मक विभागीय कार्यवाही लंबित रहने के दौरान तत्काल प्रभाव से सेवा से निलंबन (Suspension pending disciplinary proceedings until further orders)।
आरोपों की कुल संख्या33 आरोप (33 Articles of Charge) — वित्तीय अनियमितता, अवैध पदोन्नति, सतर्कता जांच में हस्तक्षेप, एसीआर जमा न करना और असंयमित भाषा का उपयोग।
कथित वित्तीय क्षतिपूर्व रजिस्ट्रार जनरल कार्यकाल के दौरान नियमों के विरुद्ध किए गए कैडर अपग्रेडेशन और नियुक्तियों के चलते सरकारी खजाने को लगभग ₹1.64 करोड़ का नुकसान।
अधिकारी का मुख्य विधिक आक्षेपअधिकारी का दावा है कि 12 दिसंबर 2025 को एक आसीन हाईकोर्ट जज के खिलाफ दुर्व्यवहार की शिकायत करने के बाद, जब वही जज कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने, तो उन्हें प्रशासनिक रूप से प्रताड़ित करने हेतु यह दुर्भावनापूर्ण कार्यवाही शुरू की गई।
सर्वोच्च न्यायालय का पूर्व रुख (9 सितंबर 2026)CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने अनुच्छेद 32 याचिका में दखल देने से इनकार करते हुए अधिकारी को हाईकोर्ट में जाने की छूट दी थी।
फुल कोर्ट का अंतिम निष्कर्षकारण बताओ नोटिस के जवाब असंतोषजनक हैं; उच्च स्तर के मौखिक या लिखित अनुमोदन से अधिकारी की स्वतंत्र वैधानिक जिम्मेदारी खत्म नहीं होती; न्याय प्रशासन के हित में अधिकारी का निलंबन अपरिहार्य है।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 235 का दायरा, रजिस्ट्रार जनरल की स्थिति और संस्थागत अनुशासन’

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 235 और उच्च न्यायालय का प्रशासनिक आधिपत्य:
    • संविधान का अनुच्छेद 235 यह स्पष्ट करता है कि राज्य के अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों (जिला जजों और मजिस्ट्रेटों) पर नियंत्रण—जिसमें उनकी पोस्टिंग, पदोन्नति, अवकाश की मंजूरी और उनके विरुद्ध जांच व निलंबन शामिल है—पूरी तरह से संबंधित उच्च न्यायालय में निहित है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य [(1974) 2 SCC 831] और हाईकोर्ट ऑफ ज्यूडिकेचर एट बॉम्बे बनाम शशिकांत एस. पाटिल [(2000) 1 SCC 416] में स्पष्ट किया है कि उच्च न्यायालय की फुल कोर्ट को यह तय करने का संपूर्ण प्रशासनिक क्षेत्राधिकार है कि किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप इतने गंभीर हैं कि उसे जांच पूरी होने तक न्यायिक कार्यों से दूर (निलंबित) रखा जाना चाहिए।
  • रजिस्ट्रार जनरल की प्रशासनिक एवं विधिक हैसियत:
    • यद्यपि अनुच्छेद 229 के तहत उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा नियमों के संबंध में व्यापक अधिकार प्राप्त हैं, किंतु उच्च न्यायालय का रजिस्ट्रार जनरल कोई मूक दर्शक या केवल एक ‘डाकघर’ (Post Office) नहीं होता।
    • प्रशासनिक कानून का यह बुनियादी सिद्धांत है कि यदि कोई प्रस्ताव वित्तीय नियमों या सेवा संवर्ग के प्रतिकूल है, तो वित्त विभाग और सांविधिक नियमों की सीमाओं को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष लिखित रूप में प्रस्तुत करना रजिस्ट्रार जनरल का प्राथमिक कर्तव्य होता है। फुल कोर्ट का यह निष्कर्ष कि “उच्च स्तर की मंजूरी मातहत अधिकारी को उसकी स्वतंत्र जिम्मेदारी से दोषमुक्त नहीं करती”, इसी प्रशासनिक जवाबदेही के सिद्धांत पर आधारित है।
  • न्यायिक मर्यादा और असंतोष व्यक्त करने की सीमाएं:
    • न्यायपालिका में अनुशासन और पदानुक्रम (Hierarchy and Discipline) का विशेष महत्व होता है। यदि कोई जिला जज उच्च न्यायालय के नोटिसों का उत्तर देते समय आक्रामक, अमर्यादित या आरोप लगाने वाली भाषा का प्रयोग करता है, तो भले ही उसकी व्यक्तिगत शिकायतें वास्तविक क्यों न हों, उसका आचरण सिक्किम न्यायिक सेवा आचार नियमावली के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई को आकर्षित करता है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय / प्रशासनिक प्राधिकारी: सिक्किम उच्च न्यायालय, गंगटोक (फुल कोर्ट — प्रशासनिक क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: अनुशासनात्मक कार्यवाही संचिका — जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रज्वल खतिवड़ा [Full Court Resolution / Disciplinary Order Dated 04.11.2026]
  • संबंधित पूर्ववर्ती न्यायिक कार्यवाही: प्रज्वल खतिवड़ा बनाम सिक्किम उच्च न्यायालय व अन्य [Supreme Court of India, Writ Petition (Civil) No. … / 2026 — निस्तारित: 09.09.2026]
  • निलंबन आदेश की तिथि: 4 नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रज्वल खतिवड़ा तत्काल प्रभाव से निलंबित; 33 आरोपों पर नियमित विभागीय अनुशासनात्मक जांच की प्रक्रिया जारी रहेगी।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 235 — अधीनस्थ न्यायालयों और न्यायिक अधिकारियों पर उच्च न्यायालय का पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण
      • अनुच्छेद 229 — उच्च न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्यय (मुख्य न्यायाधीश की शक्तियां)
      • अनुच्छेद 32 — मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता (पूर्ववर्ती चुनौती)
    • सिक्किम न्यायिक सेवा नियमावली (Sikkim Judicial Service Rules) — अनुशासन, नियंत्रण और अपील संबंधी नियम
    • प्रशासनिक एवं सेवा विधि के सुस्थापित सिद्धांत — अनुशासनात्मक जांच के दौरान निलंबन और वरिष्ठता नियमों का उल्लंघन
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • न्यायिक अधिकारियों पर अनुशासनात्मक नियंत्रण, प्रशासनिक जवाबदेही और निलंबन के विधिक मानक: ‘संविधान के अनुच्छेद 235 के अंतर्गत अधीनस्थ न्यायपालिका की शुचिता, अनुशासन और निष्पक्षता बनाए रखने हेतु उच्च न्यायालय की फुल कोर्ट के पास किसी न्यायिक अधिकारी को उसके विरुद्ध लंबित विभागीय जांच के दौरान निलंबित करने का पूर्ण और अनन्य संवैधानिक अधिकार है; किसी प्रशासनिक पद (जैसे रजिस्ट्रार जनरल) पर रहते हुए वित्तीय नियमों और पदोन्नति संवर्गों के विपरीत निर्णय लेने के आरोपों में यह विधिक बचाव स्वीकार्य नहीं हो सकता कि ऐसे निर्णयों पर मुख्य न्यायाधीश का अनुमोदन प्राप्त था, क्योंकि प्रशासनिक प्रमुख के रूप में अधिकारी का स्वतंत्र विधिक दायित्व समाप्त नहीं होता; कारण बताओ नोटिसों का उत्तर देते समय न्यायिक अधिकारी से अत्यधिक संयम, मर्यादा और शालीनता की अपेक्षा की जाती है और आक्रामक या अपमानजनक भाषा का प्रयोग स्वयं कदाचार की श्रेणी में आता है; तथा यद्यपि किसी अधिकारी को उच्च स्तर पर की गई शिकायतों के आधार पर दुर्भावनापूर्ण तरीके से प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए, किंतु जब पत्रावली पर वित्तीय क्षति और सेवा नियमों के उल्लंघन के ठोस आरोप दर्ज हों, तो न्याय प्रशासन के व्यापक हित में निलंबन की अंतरिम कार्रवाई विधिसम्मत मानी जाती है।’
  • वर्तमान स्थिति व भावी प्रक्रिया: 4 नवंबर 2026 के इस निलंबन आदेश के बाद जिला जज प्रज्वल खतिवड़ा से मंगन जिला अदालत का न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्यभार वापस ले लिया गया है; अब उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त जांच अधिकारी (Inquiry Officer) उनके विरुद्ध जारी 33 आरोपों के मेमोरेंडम और उनके द्वारा दाखिल लिखित बचाव के आधार पर औपचारिक गवाहियों और दस्तावेजी साक्ष्यों की जांच करेंगे, जिसके उपरांत जांच रिपोर्ट अंतिम निर्णय हेतु पुनः उच्च न्यायालय की फुल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।

Judge Suspend: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसिक्किम उच्च न्यायालय (Sikkim High Court – Full Court)
निलंबित न्यायिक अधिकारीप्रज्वल खटीवड़ा (जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मंगन; पूर्व रजिस्ट्रार जनरल)
निलंबन का आधार1. रजिस्ट्रार जनरल पद पर रहते हुए ₹1.64 करोड़ के कथित वित्तीय घाटे व अनधिकृत पदोन्नतियों के आरोप।
2. कारण बताओ नोटिस का अभद्र व आक्रामक जवाब देना।
3. समय पर Annual Confidential Report (ACR) जमा न करना।
अधिकारी की दलील12 दिसंबर 2025 को तत्कालीन HC जज के खिलाफ दुर्व्यवहार की शिकायत दर्ज कराने के कारण द्वेषपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश (9 सितंबर 2026)CJI सूर्या कांत की पीठ ने अधिकारी को हाईकोर्ट का रुख करने की छूट देते हुए याचिका का निस्तारण किया था।
अदालत की कार्रवाईतत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspended): अनुशासनात्मक जांच पूरी होने तक पद से निलंबित।
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