Sunday, August 16, 2026
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Landmark Judgement: पारित विधेयक को लंबित नहीं रखेंगे महामहिम…शीर्ष कोर्ट ने तय कर दी समय-सीमा

Landmark Judgement: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा, देश के सभी राज्यपाल राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को लंबित नहीं रख सकते। संविधान के तहत कार्रवाई के लिए एक से तीन महीने की समय-सीमा तय है।

विधेयकों पर बैठे रहने या पॉकेट वीटो का अधिकार नहीं…

न्यायमूर्ति जे बी पारडीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा, अनुच्छेद 200 में प्रयुक्त शब्द यथाशीघ्र एक तत्कालता की भावना को दर्शाता है और राज्यपाल को विधेयकों पर बैठे रहने या पॉकेट वीटो (चुपचाप रोकना) का अधिकार नहीं देता। इसी प्रकार, पहले प्रावधान के अनुसार, राज्यपाल केवल अनुमोदन रोकना नहीं कह सकते, यानी कि पूर्ण वीटो (absolute veto) भी अनुच्छेद 200 के तहत अनुचित और अस्वीकार्य है।

अनुच्छेद 200 की संवैधानिक महत्ता पर चर्चा

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के कार्यों के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि राज्यपाल विधेयकों पर कार्रवाई ही न करें और राज्य की कानून निर्माण प्रक्रिया को बाधित करें। कोर्ट ने राज्यपालों के लिए विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए 1 से 3 महीने की समयसीमा तय की है, ताकि अनुच्छेद 200 की संवैधानिक महत्ता और हमारे संघीय ढांचे में उसकी भूमिका को बरकरार रखा जा सके। पीठ ने चेतावनी दी अगर राज्यपाल तय समयसीमा के भीतर निर्णय नहीं लेते, तो उनकी निष्क्रियता न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकती है।

AG पेरारिवलन मामले का हवाला दिया गया

पीठ ने कहा कि यथाशीघ्र का प्रयोग यह स्पष्ट करता है कि संविधान राज्यपाल से तत्काल कार्रवाई की अपेक्षा करता है। जब किसी शक्ति के प्रयोग के लिए समयसीमा निर्धारित नहीं होती, तो उसे उचित समय में उपयोग किया जाना चाहिए। AG पेरारिवलन मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि न्यायालयों को यह अधिकार है कि वे ऐसी शक्तियों के उपयोग के लिए समयसीमा तय कर सकें, जहां शीघ्रता की आवश्यकता हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया, यह समय-सीमा संविधान में संशोधन नहीं है, बल्कि यह एक न्यायिक मानक तय करने की कोशिश है ताकि मनमानी को रोका जा सके।

शीर्ष कोर्ट का फैसला कई मुद्दों पर खास

राज्यपालों को सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करना चाहिए, और यदि वे अनुच्छेद 200 के तहत विवेकाधिकार का प्रयोग करते हैं, तो वह भी न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा। यह फैसला खास महत्व रखता है क्योंकि केरल, पंजाब, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे विपक्ष-शासित राज्य पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं, जहां राज्यपालों द्वारा विधेयकों को मंजूरी देने में देरी का मुद्दा उठाया गया है।

इन राज्यों से राज्यपाल के खिलाफ याचिकाएं

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान पर महत्वपूर्ण विधेयकों को रोकने के आरोप लगे। राज्य की लेफ्ट सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। वहीं, पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित द्वारा सात विधेयकों को रोके जाने पर सरकार कोर्ट गई। कोर्ट ने तब कहा था, “राज्यपाल आग से खेल रहे हैं। पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ और मौजूदा राज्यपाल सीवी आनंद बोस के साथ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कई टकराव सामने आए। तेलंगाना के राज्यपाल तमिलिसाई सौंदरराजन ने एमएलसी नामांकन और बजट पर सहमति देने से इनकार किया। मामला हाई कोर्ट में पहुंचा, बाद में समझौता हुआ। तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने 2023 में राज्य सरकार का अभिभाषण पढ़ने से इनकार कर दिया। 2022 में डीएमके ने राष्ट्रपति से उन्हें हटाने की मांग की थी।

संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी कि राज्यपाल एक बुद्धिमान संवैधानिक प्रमुख होगा…

शीर्ष कोर्ट ने 10 विधेयक रोककर रखने पर राज्यपाल आरएन रवि को कड़ी फटकार लगाई। साथ ही अनुच्छेद 142 के तहत असाधारण शक्ति का प्रयोग करके राज्यपाल द्वारा रोके गए इन विधेयकों को उसी तिथि पारित मानने का आदेश दिया, जब उन्हें पुनः राज्यपाल के पास भेजा गया था। इनमें से अधिकांश विधेयक जनवरी 2020 से अप्रैल 2023 के बीच विधानसभा से पारित हुए थे। अधिकतर विधेयक राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति से संबंधित थे। कोर्ट ने कहा, हमारे पास इन्हें स्वीकृ​ित देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। राज्यपाल ने सद्भावनापूर्ण तरीके से काम नहीं किया। जस्टिस पारदीवाला ने कहा, संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी कि राज्यपाल एक बुद्धिमान संवैधानिक प्रमुख होगा। मगर इस मामले में जो सामने आया वह उनकी कल्पना के विपरीत है।

शीर्ष कोर्ट ने मुख्य समयसीमा इस प्रकार तय की है

  • राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार यदि राज्यपाल विधेयक को रोके या राष्ट्रपति के पास भेजें, तो उन्हें एक महीने के भीतर निर्णय लेना होगा।
  • यदि राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह के खिलाफ अनुमोदन रोकते हैं, तो उन्हें तीन महीने के भीतर विधेयक को एक संदेश के साथ वापस करना होगा।
  • अगर राज्यपाल राष्ट्रपति के पास आरक्षण के लिए भेजते हैं, तो यह भी अधिकतम तीन महीने के भीतर करना होगा।
  • यदि पहले प्रावधान के अनुसार पुनर्विचार के बाद विधेयक पेश किया गया हो, तो राज्यपाल को अधिकतम एक महीने के भीतर अनुमोदन देना होगा।
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