Monday, August 17, 2026
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Dowry Death: जहर देने की थ्योरी फेल…मौत जहर से नहीं दिल की बीमारी से हुई, जानिए 20 साल बाद पति पर कैसे हटा क्रूरता का कलंक

Dowry Death: कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में एक व्यक्ति को शादी के 22 साल बाद और पत्नी की मौत के लगभग दो दशक (21 साल) बाद सभी आरोपों से बरी (Acquit) कर दिया है।

युवा महिला की मौत से जुड़ा मामला

हाईकोर्ट की न्यायाधीश चैताली चटर्जी दास की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि “निर्दोष लड़की की मौत जहर से नहीं बल्कि उसकी बीमारी के कारण हुई थी। इसके साथ ही कोर्ट ने लड़की के माता-पिता की देखरेख में इलाज में हुई दो घंटे से अधिक की देरी पर भी गंभीर सवाल उठाए। यह मामला अप्रैल 2005 में हुई एक युवा महिला की मौत से जुड़ा है, जिसने फरवरी 2004 में आरोपी से प्रेम विवाह (Love Marriage) किया था। शादी के महज 14 महीने बाद ही महिला की उसके मायके में मौत हो गई थी।

यह रही अभियोजन पक्ष (Prosecution) की कमी

  • शुरुआती आरोप: मृतका के पिता ने आरोप लगाया था कि उनकी बेटी को पति और सास द्वारा 1.5 लाख रुपये के दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था। उन्होंने दावा किया कि अप्रैल 2005 में जब उनकी बेटी मायके आई, तो अचानक बीमार पड़ गई और अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने बताया कि उसकी मौत जहर खाने से हुई है। इसी आधार पर 2007 में निचली अदालत ने पति को आईपीसी की धारा 498A (क्रूरता) के तहत दोषी ठहराया था।
  • मेडिकल रिपोर्ट ने खोली पोल: हाई कोर्ट में अपील के दौरान जब पोस्टमार्टम और मेडिकल रिपोर्ट की जांच की गई, तो जहर देने का दावा पूरी तरह झूठा साबित हुआ। विसरा रिपोर्ट में “कोई जहर नहीं” (No Poison) पाया गया। इसके विपरीत, डॉक्टरों की रिपोर्ट से साफ हुआ कि महिला का दिल बढ़ा हुआ था और वह ‘पेरिकार्डियल इफ्यूजन’ (दिल के आसपास तरल पदार्थ जमा होना) नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित थी।

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मायके वालों की लापरवाही और गवाहों के विरोधाभास पर कोर्ट की टिप्पणी

  • हाई कोर्ट ने जांच में पाया कि जब लड़की को मायके में तकलीफ हो रही थी, तब उसके माता-पिता के आचरण में कई गंभीर कमियां थीं।
  • इलाज में ढाई घंटे की देरी: जब लड़की दर्द से तड़प रही थी, तब उसके माता-पिता 2.5 घंटे से अधिक समय तक किसी डॉक्टर का इंतजाम नहीं कर सके।
  • सूचना न देना: इस आपातकालीन स्थिति के बारे में उन्होंने न तो लड़की के पति को सूचित किया और न ही स्थानीय पड़ोसियों से मदद मांगी। अंततः अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही उसकी मौत हो गई।
  • गवाहों का मुकरना: सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के कई गवाह अपनी बातों से पलट गए (Hostile)। साथ ही, मृतका के शरीर पर चोट का कोई बाहरी निशान भी नहीं मिला था।
  • माननीय न्यायाधीश का मुख्य आदेश: “डॉक्टर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट कोर्ट में विश्वास जगाती है कि उस गरीब लड़की की मौत दिल की बीमारी के कारण हुई थी। अभियोजन पक्ष इस मामले को संदेह के दायरे से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इसलिए निचली अदालत द्वारा 2007 में दी गई सजा के आदेश को निरस्त किया जाता है।”

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य कानूनी बिंदुकलकत्ता उच्च न्यायालय का निष्कर्ष
माननीय न्यायाधीशजस्टिस चैताली चटर्जी दास
विवादित धाराआईपीसी की धारा 498A (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता)
घटनाक्रमविवाह (फरवरी 2004) -मृत्यु (अप्रैल 2005)- निचली अदालत से सजा (जुलाई 2007)-हाई कोर्ट से बरी (मई 2026)
मौत का वास्तविक कारणबड़ा हुआ दिल (Enlarged Heart) और पेरिकार्डियल इफ्यूजन, न कि जहर।

बिना पुख्ता सबूतों के सजा नहीं

यह फैसला रेखांकित करता है कि किसी भी आपराधिक मामले, विशेषकर पारिवारिक और दहेज से जुड़े संवेदनशील मुकदमों में केवल आरोपों या धारणाओं के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। चिकित्सा साक्ष्य (Medical Evidence) और गवाहों के बयानों में निष्पक्षता होना अनिवार्य है। लगभग दो दशकों के लंबे इंतजार के बाद, हाई कोर्ट ने इस मामले में न्याय करते हुए पति पर लगे क्रूरता के कलंक को पूरी तरह से हटा दिया है।

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