Friday, October 2, 2026
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Couple Case: वीडियो कॉल निकाह की वैधता पर मत जाएं…बालिग बेटी के वैवाहिक जीवन में पिता का दखल नहीं, Chilling Effect से होता है असर, पढ़ें

Couple Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनके जीवनसाथी चुनने के अधिकार को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है।

बालिग जोड़े को शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप न करें

हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने एक प्रेमी जोड़े (Couple) की सुरक्षा याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। इस मामले में लड़की के पिता और राज्य सरकार (पुलिस) द्वारा उनके विवाह को ‘अवैध’ बताते हुए विरोध किया जा रहा था। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि लड़का-लड़की बालिग (Major) हैं, तो उनके निकाह/विवाह की तकनीकी वैधता चाहे जो भी हो, या फिर वे बिना शादी के लिव-इन-रिलेशनशिप (Live-in-relationship) में ही क्यों न रह रहे हों, लड़की के पिता या परिवार को उनके शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

आरोप: लड़का-लड़की के बीच वैध निकाह नहीं हुआ

यह मामला एक ऐसे बालिग जोड़े से जुड़ा है जिन्होंने अप्रैल 2025 में शादी की थी। लड़की के पिता और सरकारी वकील इस आधार पर उनकी सुरक्षा का विरोध कर रहे थे कि जिस समय निकाह हुआ, लड़की भारत में नहीं बल्कि दुबई में थी और यह निकाह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Video Call) के जरिए हुआ था, इसलिए यह ‘वैध निकाह’ नहीं है।

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वीडियो कॉल निकाह का अनोखा मामला (The Video Call Nikah)

  • पिता और राज्य का तर्क: सरकारी वकील अश्वनी कुमार त्रिपाठी और लड़की के पिता ने पासपोर्ट रिकॉर्ड पेश करते हुए कहा कि लड़की जनवरी से मई 2025 तक दुबई में थी। चूंकि वह निकाह के समय शारीरिक रूप से भारत में मौजूद नहीं थी, इसलिए काजी द्वारा कराया गया यह निकाह संदिग्ध और अमान्य है।
  • लड़की का बयान: लड़की ने खुली अदालत में स्वीकार किया कि निकाह के समय वह दुबई में थी और वीडियो कॉल के जरिए रस्म पूरी हुई थी। भारत लौटने के बाद उसने मूल ‘निकाहनामे’ पर अपने हस्ताक्षर किए थे। साथ ही उसने कोर्ट को बताया कि अदालत परिसर के बाहर ही उसके पिता और उनके दोस्तों ने उसे डराने-धमकाने और रोकने की कोशिश की है, जिससे उसकी जान को खतरा है।

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हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: “अनुच्छेद 21 का दर्जा सबसे ऊपर”

  • जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने निकाह की तकनीकी वैधता के विवाद को दरकिनार करते हुए, संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों को सर्वोपरि माना।
  • विवाह की वैधता बनाम जीवन का अधिकार: कोर्ट ने साफ कहा, “इस चरण पर अदालत निकाहनामे की वैधता या उसकी सत्यता की जांच नहीं कर रही है। हमारा मुख्य सरोकार याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21 – जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का स्थान किसी भी पर्सनल लॉ या विवाह की तकनीकी वैधता से बहुत ऊपर (Higher Pedestal) है।”
  • निजी क्षेत्र में राज्य और समाज का कोई दखल नहीं: कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई व्यक्ति किससे शादी करता है या किसके साथ रहता है, यह उसका नितांत व्यक्तिगत मामला है जो ‘गोपनीयता के मूल क्षेत्र’ (Core Zone of Privacy) में आता है। समाज की मंजूरी (Social Approval) इन व्यक्तिगत फैसलों को मान्यता देने का आधार नहीं हो सकती। हमारा संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ‘असहमत दर्शकों’ (Disapproving Audiences) से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • राज्य के हस्तक्षेप का ‘चिलिंग इफेक्ट’ (डर का माहौल): अदालत ने चेतावनी दी कि जब राज्य या पुलिस ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करती है, तो समाज में एक बेहद नकारात्मक प्रभाव (Chilling Effect) पड़ता है। डर के कारण लोग अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करने से कतराने लगते हैं, जो किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए विनाशकारी है।

अदालत का अंतिम निर्देश

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए जिला प्रशासन और पुलिस प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे जोड़े के शांतिपूर्ण जीवन में किसी भी प्रकार का व्यवधान न आने दें और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिग होने के नाते वे अपने फैसलों के लिए खुद जिम्मेदार हैं।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

कानूनी बिंदुइलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख
माननीय न्यायाधीशजस्टिस विवेक कुमार सिंह
मुख्य मुद्दाक्या अवैध/संदिग्ध निकाह होने पर बालिग जोड़े की सुरक्षा रोकी जा सकती है?
न्यायालय का निर्णयनहीं। चाहे निकाह वैध न हो या जोड़ा लिव-इन में हो, बालिग होने पर उन्हें सुरक्षा पाने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।
संवैधानिक संरक्षणअनुच्छेद 21 के तहत जाति, पंथ या धर्म की परवाह किए बिना अपना जीवनसाथी चुनना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।

व्यक्तिगत स्वायत्तता की जीत

यह फैसला भारत की बहुलवादी संस्कृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूती देता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब दो बालिग आपसी सहमति से एक साथ रहने का फैसला करते हैं, तो न तो उनका परिवार (माता-पिता) और न ही राज्य की मशीनरी (पुलिस/प्रशासन) अपनी नैतिक मान्यताओं को उन पर थोप सकती है।

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