Friday, October 2, 2026
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SC News: जो मामला समाप्त हो चुका है, उसे दोबारा नहीं खोला जा सकता…यह रही सुप्रीम टिप्पणी

SC News: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जो मामला समाप्त हो चुका है, उसे दोबारा नहीं खोला जा सकता, अन्यथा न्याय प्रशासन में अराजकता फैल जाएगी।

पेंशन लाभ की मांग की थी

न्यायमूर्ति सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और उज्जल भुइयां की पीठ ने हिमाचल प्रदेश स्टेट फॉरेस्ट डेवेलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड के पूर्व कर्मचारियों द्वारा दायर एक रिट याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने पेंशन लाभ की मांग की थी, जबकि यह मुद्दा 2016 में एक अलग मुकदमे में अंतिम रूप से तय हो चुका था। कहा, किसी मुकदमे का अंतिम निर्णय न्यायिक प्रणाली की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।

अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी…

पीठ ने कहा, “यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि वर्तमान रिट याचिका पूरी तरह से गलत धारणा पर आधारित है और खारिज किए जाने योग्य है। हालांकि, रिकॉर्ड से विदा लेने से पहले, हम निर्णय प्रक्रिया की अंतिमता के सिद्धांत पर बल देना और इसे दोहराना चाहेंगे। किसी मुकदमे की अंतिमता एक सशक्त न्यायिक प्रणाली का मुख्य पहलू है। ऐसा मुकदमा जो समाप्त हो चुका हो या अंतिम निर्णय तक पहुँच चुका हो, उसे दोबारा नहीं खोला जा सकता। पीठ ने आगे कहा कि जो पक्ष सुप्रीम कोर्ट के विशेष अनुमति याचिका या उससे उत्पन्न दीवानी अपील में दिए गए निर्णय से असंतुष्ट हो, वह पुनर्विचार याचिका और उसके बाद उपचारात्मक याचिका के माध्यम से पुनरावलोकन मांग सकता है। “लेकिन ऐसे निर्णय को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती। यदि ऐसा किया गया, तो न तो कोई अंतिमता रहेगी और न ही मुकदमों का कोई अंत होगा। इससे न्याय प्रशासन में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी।

2016 का राजेश चंदर सूद फैसला याचिकाकर्ताओं पर बाध्यकारी है

पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत ने 2002 में ग्रीन व्यू टी एंड इंडस्ट्रीज़ बनाम कलेक्टर मामले में यह विचार व्यक्त किया था कि सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश की अंतिमता को हल्के में अस्थिर नहीं किया जाना चाहिए। यह सिद्धांत 2011 में इंडियन काउंसिल फॉर एन्वायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ के फैसले में फिर से दोहराया गया था। पीठ ने कहा, “इस प्रकार, उपरोक्त चर्चा को ध्यान में रखते हुए, हम बिना किसी संकोच के यह मानते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर वर्तमान रिट याचिका पूरी तरह से ग़लत और असंगत है। इस न्यायालय का 2016 का राजेश चंदर सूद फैसला याचिकाकर्ताओं पर बाध्यकारी है। ऐसी स्थिति में, याचिका में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।”

2018 में, फॉरेस्ट कॉरपोरेशन के तीन पूर्व कर्मचारी शीर्ष अदालत पहुंचे…

2018 में, फॉरेस्ट कॉरपोरेशन के तीन पूर्व कर्मचारी शीर्ष अदालत पहुंचे और अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की। वे हिमाचल प्रदेश कॉर्पोरेट सेक्टर कर्मचारी (पेंशन, पारिवारिक पेंशन, पेंशन का समपीकरण और ग्रेच्युटी) योजना, 1999 के तहत पेंशन लाभ से वंचित किए जाने से आहत थे। यह योजना 2 दिसंबर, 2004 की अधिसूचना के माध्यम से बंद कर दी गई थी, हालांकि उन कर्मचारियों को इससे अलग रखा गया था जिन्होंने योजना को चुना था और 2 दिसंबर, 2004 से पहले सेवानिवृत्त हो गए थे। उन्होंने राज्य सरकार से यह निर्देश देने की मांग की कि उन्हें उस योजना के अनुसार पेंशन दी जाए, जिस तरह उन्हीं जैसे अन्य कर्मचारियों को दी गई थी, जो 2 दिसंबर, 2004 से पहले सेवानिवृत्त हुए थे और उनकी पेंशन योग्य सेवा को नियुक्ति की तारीख से सेवानिवृत्ति तक गिना जाए। इससे पहले पेंशन लाभ का मुद्दा निगम के कुछ पूर्व कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय में उठाया था, जिसने 2013 में उनकी याचिका स्वीकार कर राज्य सरकार को उस योजना के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन देने का निर्देश दिया था।

उच्च न्यायालय के 2013 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी

राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के 2013 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसने 2016 में उच्च न्यायालय के आदेश को पलट दिया। 2018 में दायर रिट याचिका में उसी राहत की मांग की गई थी और यह तर्क दिया गया था कि 2016 के फैसले में शीर्ष अदालत ने कई बाध्यकारी उदाहरणों की अनदेखी की थी और उस निर्णय को per incuriam (कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण) करार दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च, 2018 को इस याचिका पर नोटिस जारी किया और चूंकि 2016 के दो-न्यायाधीशीय फैसले की वैधता पर सवाल उठाया गया था, इसलिए मामला तीन न्यायाधीश की पीठ के समक्ष रखा गया।

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