Monday, August 17, 2026
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SC News: कुछ जज बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन कुछ जज बार-बार कॉफी ब्रेक या अन्य ब्रेक लेते हैं…झारखंड HC पर की बात

SC News: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जजों द्वारा बार-बार और अनावश्यक कॉफी ब्रेक लेने पर नाराजगी जताई।

जजों के कामकाज का परफॉर्मेंस ऑडिट किया जाए
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट के जजों को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं। कोर्ट ने कहा कि अब वक्त आ गया है जब हाईकोर्ट के जजों के कामकाज का परफॉर्मेंस ऑडिट किया जाए। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “कुछ जज बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन कुछ जज बार-बार कॉफी ब्रेक या अन्य ब्रेक लेते हैं। लंच ब्रेक के लिए समय तय है, फिर ये अतिरिक्त ब्रेक क्यों? हमें हाईकोर्ट के जजों के प्रदर्शन और उन पर हो रहे खर्च के अनुपात को देखना होगा। अब परफॉर्मेंस ऑडिट जरूरी हो गया है।”

झारखंड हाईकोर्ट में फैसले में देरी से मामला सामने आया
यह टिप्पणी झारखंड हाईकोर्ट के एक मामले की सुनवाई के दौरान आई। चार लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उन्हें हत्या और अन्य आरोपों में दोषी ठहराया गया था और 2022 में हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, लेकिन अब तक फैसला सुनाया नहीं गया। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 5 और 6 मई को हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया। इनमें से तीन को बरी कर दिया गया, जबकि एक को लेकर जजों की राय अलग-अलग थी, इसलिए मामला हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को भेजा गया और आरोपी को जमानत मिल गई।

फैसले के बाद भी जेल में थे आरोपी
वकील फौजिया शकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट का फैसला आए एक हफ्ता हो गया है, लेकिन तीनों बरी किए गए लोग अब तक जेल में हैं। साथ ही हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह नहीं लिखा कि आदेश कब सुरक्षित रखा गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार के वकील से कहा कि लंच ब्रेक से पहले तीनों को रिहा किया जाए। दोपहर बाद सुनवाई में राज्य सरकार ने बताया कि तीनों को रिहा कर दिया गया है, लेकिन ट्रायल कोर्ट से रिहाई आदेश नहीं मिलने के कारण देरी हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने जताया अफसोस
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “हमें अफसोस है कि इन लोगों को न्यायिक व्यवस्था की वजह से इतने साल जेल में रहना पड़ा। अगर हाईकोर्ट समय पर फैसला देता, तो ये लोग तीन साल पहले ही जेल से बाहर आ जाते।”

SC/ST और ओबीसी वर्ग से हैं सभी आरोपी
चारों आरोपी – पिला पाहन, सोमा बड़ांग, सत्यनारायण साहू और धर्मेश्वर उरांव – अनुसूचित जाति, जनजाति या ओबीसी वर्ग से हैं। इनमें से तीन को हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था, लेकिन हाईकोर्ट ने बरी कर दिया। चौथे आरोपी को बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया गया था, लेकिन हाईकोर्ट में जजों की राय अलग होने के कारण उसे जमानत मिल गई।

न्यायिक व्यवस्था की जड़ से जुड़ा है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली की जड़ से जुड़ा है और बेहद महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने इस याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़े एक अन्य मामले के साथ जोड़ दिया, जिसमें फैसले की तारीख और उसे वेबसाइट पर अपलोड करने की तारीख को लेकर जानकारी मांगी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट बनाएगा गाइडलाइन
बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में गहराई से विश्लेषण और कोर्ट की ओर से अनिवार्य गाइडलाइन की जरूरत है, ताकि दोषियों या विचाराधीन कैदियों का न्याय व्यवस्था से भरोसा न उठे। कोर्ट ने कहा कि पहले से तय समयसीमा का पालन जरूरी है और इसके लिए एक सिस्टम भी प्रस्तावित किया जाएगा।

जुलाई में फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स से डेटा जुटाने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई जुलाई में तय की है।

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