MINORITIES case: मेघालय हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वे यह स्पष्ट करें कि क्या भाषायी अल्पसंख्यकों के विकास और कल्याण से जुड़ी भाषायी अल्पसंख्यक आयुक्त (Commissioner for Linguistic Minorities) की वर्ष 2016 की सिफारिशों को लागू किया गया है या नहीं।
जनहित याचिका पर सुनवाई
यह आदेश मेघालय लिंग्विस्टिक माइनॉरिटी डेवलपमेंट फोरम द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें राज्य में भाषायी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की मांग की गई है। मुख्य न्यायाधीश आई. पी. मुखर्जी और न्यायमूर्ति डब्ल्यू. डिएंगडोह की पीठ ने कहा, हम केंद्र और राज्य सरकार के अधिवक्ताओं को निर्देश देते हैं कि वे 29 मार्च 2016 की रिपोर्ट की स्थिति को लेकर उपयुक्त निर्देश प्राप्त करें और अगली सुनवाई से पहले अदालत को अवगत कराएं।
2016 की सिफारिशों में क्या था?
भाषायी अल्पसंख्यक आयुक्त की रिपोर्ट में राज्य सरकार को निम्न सिफारिशें दी गई थीं। सरकारी दस्तावेजों का अल्पसंख्यक भाषाओं में अनुवाद, स्कूलों में भाषा वरीयता रजिस्टर का निर्माण, अल्पसंख्यक भाषायी शिक्षण संस्थानों को मान्यता और सहायता, और भाषायी कल्याण बोर्ड का गठन। राज्य की स्थिति और याचिकाकर्ता की मांग
कोर्ट ने कहा कि भले ही राज्य में खासी और गारो भाषा बोलने वालों की बहुलता हो, लेकिन एक बड़ी आबादी बंगाली, नेपाली, हिंदी, असमिया और अन्य भाषाएं भी बोलती है। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट से “भाषायी कल्याण बोर्ड” के गठन के लिए सरकार को निर्देश देने की मांग भी की, जो कि 2016 की सिफारिशों में शामिल था।
यह रहा सरकार का पक्ष
सरकारी वकील ने दलील दी कि भाषायी अल्पसंख्यक आयुक्त के पास पूर्ण अधिकार नहीं हैं, और रिपोर्ट को राष्ट्रपति की समीक्षा और संसद की मंजूरी मिलना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से अगली सुनवाई से पहले विस्तृत स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है, ताकि यह तय हो सके कि क्या सिफारिशों पर अमल हुआ है या नहीं। यह मामला राज्य में भाषायी विविधता और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

