FSL Test: दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह फॉरेंसिक साइंस लैब (एफएसएल) को अनावश्यक पोस्टमॉर्टम नमूनों की जांच से बचाने के लिए गाइडलाइन बनाने पर विचार करे।
डॉक्टर सुभाष विजयन की जनहित याचिका पर सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय व न्यायमूर्ति अनीश दयाल की डिविजन बेंच ने कहा कि इस तरह के बेतरतीब रेफरल से एफएसएल पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है, जिससे जरूरी नमूनों की जांच में देरी होती है और आपराधिक मामलों की जांच और न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है। यह निर्देश मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में फॉरेंसिक मेडिसिन में एमडी कर रहे डॉक्टर सुभाष विजयन की जनहित याचिका पर दिए गए। याचिका में कहा गया कि डॉक्टर अक्सर बिना जरूरत के विसरा, खून और ऊतक जैसे जैविक नमूने एफएसएल को भेज देते हैं, जबकि कई मामलों में इसकी न तो मेडिकल और न ही कानूनी जरूरत होती है।
डॉक्टरों में कानूनी डर, इसलिए हर केस में भेजते हैं नमूने
याचिका में कहा गया कि कई डॉक्टर साफ-साफ मामलों में भी नमूने भेजते हैं, जहां किसी तरह की साजिश या संदेह नहीं होता। वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि भविष्य में किसी कानूनी जांच से बचा जा सके। कई बार पुलिस अधिकारी भी साफ कहते हैं कि जांच के लिए लैब एनालिसिस की जरूरत नहीं है, फिर भी डॉक्टर नमूने भेज देते हैं।
एफएसएल में अनावश्यक केस बढ़ रहे: कोर्ट
कोर्ट का कहना है कि इस डर और सावधानी के चलते एफएसएल में अनावश्यक केस बढ़ रहे हैं, जिससे जरूरी मामलों की जांच में देरी हो रही है। इससे न सिर्फ राज्य के संसाधनों पर असर पड़ता है, बल्कि मृतकों के परिजनों को भी अनावश्यक तनाव झेलना पड़ता है।
पुरानी तकनीकों और पुलिस की देरी भी समस्या
याचिका में यह भी कहा गया कि ऑटोप्सी में अभी भी पुरानी तकनीकों और मैनुअल टॉक्सिकोलॉजी तरीकों का इस्तेमाल हो रहा है। साथ ही, पुलिस द्वारा नमूने लैब में भेजने में देरी भी इस समस्या को और बढ़ा रही है। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे इस मुद्दे की जांच करें और तीन महीने के भीतर इस पर निर्णय लें।

