Friday, October 2, 2026
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matrimonial cases: तलाक के मामलों में पति-पत्नी की रिकॉर्ड की गई बातचीत सबूत मानी जाएगी… सुप्रीम कोर्ट

matrimonial cases: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसले में कहा कि पति-पत्नी के बीच गुप्त रूप से रिकॉर्ड की गई बातचीत तलाक जैसे वैवाहिक विवादों में सबूत के तौर पर मान्य होगी।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को किया खारिज

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि अगर पति-पत्नी एक-दूसरे की जासूसी कर रहे हैं, तो यह खुद इस बात का संकेत है कि रिश्ता टूट चुका है और उनमें विश्वास नहीं बचा है। ऐसे में यह कहना गलत होगा कि कोर्ट द्वारा ऐसे सबूत को मान्यता देने से वैवाहिक संबंधों में दरार आती है। कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि ऐसी बातचीत गोपनीय होती है और इसे सबूत के तौर पर नहीं लिया जा सकता।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 पर चर्चा

जज ने कहा कि पति-पत्नी के बीच जासूसी करना वैवाहिक कलह का कारण नहीं, बल्कि उसका नतीजा होता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही विवाह के दौरान की बातचीत को गोपनीय माना गया हो, लेकिन यह निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है और इसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 में दिए गए अपवादों के तहत देखा जाना चाहिए।

फैमिली कोर्ट का फैसला बहाल, अब रिकॉर्डिंग को सबूत माना जाएगा

सुप्रीम कोर्ट ने बठिंडा की फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बहाल कर दिया, जिसमें पति द्वारा पत्नी के साथ की गई रिकॉर्ड बातचीत को तलाक के केस में सबूत के तौर पर स्वीकार किया गया था। कोर्ट ने कहा कि अब फैमिली कोर्ट इस रिकॉर्डिंग को ध्यान में रखते हुए केस की सुनवाई आगे बढ़ाए।

यह है मामला

यह केस एक दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी 2009 में हुई थी और 2011 में उनकी एक बेटी हुई। पति ने 2017 में तलाक की अर्जी दी और 2018 में इसे संशोधित किया। पति ने सबूत के तौर पर 2010 से 2016 के बीच पत्नी के साथ की गई बातचीत की रिकॉर्डिंग, मेमोरी कार्ड, सीडी और ट्रांसक्रिप्ट कोर्ट में पेश की थी। फैमिली कोर्ट ने 2020 में इन्हें स्वीकार कर लिया था, लेकिन पत्नी ने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने कहा था- निजता का उल्लंघन

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए कहा था कि यह सबूत बिना सहमति के जुटाए गए हैं और इससे पत्नी की निजता का हनन होता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में निजता का अधिकार पूर्ण नहीं होता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के सामने यह झुकता है।

न्याय के लिए जरूरी है सबूत पेश करने का अधिकार

कोर्ट ने कहा कि जब रिश्ता पूरी तरह टूट चुका हो और एक पक्ष न्याय की मांग कर रहा हो, तो उसे जरूरी सबूत पेश करने से रोकना न्याय से इनकार करने जैसा होगा। ऐसे मामलों में निजता का अधिकार निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के सामने कमजोर पड़ता है।

धारा 122 का अपवाद लागू होगा

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 के तहत पति-पत्नी के बीच विवाह के दौरान की बातचीत को गोपनीय माना गया है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह गोपनीयता पूर्ण नहीं है और इसका उद्देश्य केवल वैवाहिक संबंधों की आत्मीयता को बनाए रखना है। जब मामला कोर्ट में पहुंचता है, तो निष्पक्ष सुनवाई के लिए जरूरी सबूतों को प्राथमिकता दी जाती है।

यह रहा कोर्ट का निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि तलाक जैसे मामलों में पति-पत्नी के बीच रिकॉर्ड की गई बातचीत को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, भले ही वह बिना सहमति के रिकॉर्ड की गई हो। कोर्ट ने निजता के अधिकार को निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से कमतर माना है।

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