Monday, August 17, 2026
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SEXUAL VIOLENCE: जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता का निवास…महिला की गरिमा से समझाैता नहीं

SEXUAL VIOLENCE: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब कोई पिता अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ यौन हिंसा करता है, तो यह परिवारिक भरोसे की नींव को चीर देता है।

10.50 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश

शीर्ष कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी पिता की सजा को सही ठहराया है। साथ ही पीड़िता को राज्य सरकार की ओर से 10.50 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार और संदीप कुमार की बेंच ने कहा कि महिलाओं की गरिमा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून को इस तरह के मामलों में झूठी सहानुभूति या तथाकथित प्रक्रिया की निष्पक्षता के नाम पर महिला की गरिमा को बार-बार ठेस पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि न्याय केवल दोष सिद्ध करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें पीड़िता को न्यायिक राहत और पुनर्वास भी शामिल होना चाहिए।

पिता द्वारा यौन हिंसा सबसे गंभीर अपराध

कोर्ट ने कहा कि जब कोई पिता, जो कि एक रक्षक और नैतिक मार्गदर्शक माना जाता है, वही अपनी बेटी की गरिमा और शारीरिक अखंडता को ठेस पहुंचाता है, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत नहीं बल्कि संस्थागत विश्वासघात होता है। ऐसे अपराधों को किसी भी सूरत में माफ नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराधों को सबसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए और समाज को यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि घर, जो एक सुरक्षित स्थान होना चाहिए, वह कभी भी पीड़ा का केंद्र नहीं बन सकता।

दया की अपील को कोर्ट ने ठुकराया

कोर्ट ने आरोपी की अंतरिम जमानत की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में दया दिखाना न्याय व्यवस्था के साथ विश्वासघात होगा। कोर्ट ने कहा कि यह महिलाओं की गरिमा का अपमान और हर उस मां के विश्वास को ठेस पहुंचाना होगा, जो अपने बच्चे को न्याय पर भरोसा करना सिखाती है।

मनुस्मृति का हवाला

कोर्ट ने अपने फैसले में मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा, “जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं और जहां उनका अपमान होता है, वहां सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।” कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ सांस्कृतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक सोच भी है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराधों में सजा में कोई नरमी नहीं बरती जा सकती, क्योंकि ये अपराध परिवार को एक सुरक्षित स्थान मानने की अवधारणा को ही खत्म कर देते हैं। आरोपी को पहले ही हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट की धारा 6 और आईपीसी की धारा 506 के तहत दोषी ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले को बरकरार रखा है।

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