Monday, May 18, 2026
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Reinstates Judge: न्यायिक अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार केवल चीफ जस्टिस को, रजिस्ट्रार जनरल को नहीं, केस पढ़ें

Reinstates Judge: सुप्रीम कोर्ट ने देश की न्यायिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

उत्तराखंड की सिविल जज दीपाली शर्मा को सेवा में बहाल करने का फैसला बरकरार

चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि ऐसी किसी भी अनुशासनात्मक कार्यवाही को संवैधानिक रूप से तब तक अमान्य माना जाएगा, जब तक कि उसे संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) या उनके द्वारा गठित समिति द्वारा विशेष रूप से अधिकृत (Authorised) न किया गया हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) के पास न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) के खिलाफ स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लेकर अनुशासनात्मक जांच शुरू करने का कोई अधिकार नहीं है। इस ऐतिहासिक व्यवस्था के साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड की सिविल जज दीपाली शर्मा को सेवा में बहाल करने के उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा है।

वर्ष 2020 में एक अनाम ईमेल से हुई थी शिकायत

यह पूरा मामला वर्ष 2020 में उत्तराखंड की एक सिविल जज (सीनियर डिवीजन) दीपाली शर्मा के खिलाफ आई एक अनाम (Anonymous) ई-मेल शिकायत से शुरू हुआ था। उन पर अपने घर में काम करने वाली एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप था। इस शिकायत के बाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने जांच शुरू की थी और अंततः उन्हें सेवा से बर्खास्त (Dismiss) कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का संवैधानिक फैसला (Constitutional Ruling)

  • सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 235 (Article 235 of the Constitution) की व्याख्या की।
  • सामूहिक शक्ति: न्यायिक अधिकारियों पर अनुशासनात्मक नियंत्रण की शक्ति स्पष्ट रूप से पूरे हाई कोर्ट (सामूहिक रूप से) में निहित है, जिसमें अनिवार्य रूप से मुख्य न्यायाधीश और उनके साथी न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • क्षेत्राधिकार की कमी (Jurisdictional Infirmity): इस मामले में रजिस्ट्रार जनरल ने दावा किया था कि उन्हें तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने फोन पर जांच करने और निलंबन आदेश जारी करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि बिना लिखित और औपचारिक मंजूरी के शुरू की गई जांच की बुनियाद ही अवैध (Non-existent) थी।

उत्तराखंड हाई कोर्ट का पूर्व रुख: “राई का पहाड़ बनाया गया”

  • इससे पहले, 6 जनवरी 2026 को उत्तराखंड हाई कोर्ट ने दीपाली शर्मा की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए बेहद सख्त टिप्पणियां की थीं, जिन्हें अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सही माना है।
  • साक्ष्यों का अभाव: हाई कोर्ट ने कहा था कि सिविल जज के खिलाफ मामला न केवल “कोई सबूत नहीं” होने का उदाहरण है, बल्कि यह “बिना नींव के सावधानीपूर्वक खड़ी की गई एक इमारत” जैसा है। कोर्ट ने इसे “राई का पहाड़ बनाना” (A mountain made out of a molehill) करार दिया था।
  • जांच अधिकारियों को फटकार: हाई कोर्ट ने उन न्यायिक अधिकारियों के रवैये की भी कड़ी निंदा की थी जिन्होंने जांच का नेतृत्व किया था। कोर्ट इस बात से स्तब्ध था कि एक सिविल जज के घर पर भारी पुलिस बल और दो वीडियोग्राफरों के साथ छापा मारा गया था, जिसे कोर्ट ने “दुर्भावना से प्रेरित” और “ओवर-किल” (ज़रूरत से ज्यादा आक्रामक) बताया था।

वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न का मामला

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी नोट किया कि वह सिविल जज की बहाली में इसलिए भी हस्तक्षेप नहीं करना चाहती क्योंकि जज दीपाली शर्मा ने यह सफलतापूर्वक साबित किया है कि वे कुछ वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न (Harassment) का शिकार हुई थीं।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य कानूनी बिंदुसुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
माननीय न्यायाधीशमुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची
मुख्य न्यायिक सिद्धांतरजिस्ट्रार जनरल को न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ Suo Motu अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।
पीड़ित पक्षदीपाली शर्मा (सिविल जज, उत्तराखंड), जिन्हें अब पिछले बकाए और निरंतरता (Deemed Continuity) के साथ सेवा में बहाल रखा जाएगा।
हाई कोर्ट की अपील खारिजउत्तराखंड हाई कोर्ट के प्रशासनिक पक्ष (Administrative Side) की अपील को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया।

निचली न्यायपालिका के संरक्षण के लिए बड़ा कदम

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश की निचली न्यायपालिका (Subordinate Judiciary) के जजों के लिए एक बड़े सुरक्षा कवच की तरह है। इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि किसी अनाम शिकायत या प्रशासनिक अधिकारियों (जैसे रजिस्ट्रार जनरल) की व्यक्तिगत सक्रियता के आधार पर किसी जज के करियर को नष्ट नहीं किया जा सकता। अनुशासनात्मक मामलों में केवल और केवल ‘चीफ जस्टिस’ की संस्थागत और लिखित संप्रभुता ही सर्वोपरि होगी।

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