Wednesday, September 9, 2026
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Time for UCC: मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों पर सुप्रीम टिप्पणी…UCC लागू करने का समय अब आ गया

Time for UCC: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का समय अब आ गया है।

कोर्ट ने शरीयत कानून (1937) के उन प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका को एक “बहुत मजबूत मामला” बताया, जो मुस्लिम महिलाओं के साथ उत्तराधिकार (Inheritance) के मामले में भेदभाव करते हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने हालांकि स्पष्ट किया कि न्यायिक हस्तक्षेप से कानूनी शून्यता (Legal Vacuum) पैदा हो सकती है, इसलिए इस पर फैसला लेना विधायिका (Legislature) के विवेक पर निर्भर करना बेहतर होगा।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां

  • कानूनी शून्यता का डर: सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण से कहा, “सुधारों की अति-उत्सुकता में हम उन्हें (मुस्लिम महिलाओं को) उससे भी वंचित कर सकते हैं जो उन्हें अभी मिल रहा है। अगर 1937 का शरीयत अधिनियम हटा दिया जाता है, तो उत्तराधिकार के लिए कोई वैधानिक कानून नहीं बचेगा।
  • UCC ही समाधान: बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस भेदभाव का असली समाधान समान नागरिक संहिता (UCC) में ही निहित है। जस्टिस बागची ने कहा, “संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों (DPSP) के तहत विधायिका के पास UCC बनाने का जनादेश है, और यह कोर्ट बार-बार इसकी सिफारिश कर चुका है।”
  • नारसू अप्पा माली केस का जिक्र: कोर्ट ने 1951 के ऐतिहासिक बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले (Narasu Appa Mali) का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि ‘पर्सनल लॉ’ संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत “कानून” नहीं हैं और उन्हें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

याचिकाकर्ता और प्रशांत भूषण के तर्क

  • समान अधिकार: प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि कोर्ट यह घोषणा कर सकता है कि मुस्लिम महिलाएं पुरुषों के समान उत्तराधिकार की हकदार हैं और शरीयत कानून रद्द होने पर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) उन पर लागू होना चाहिए।
  • तीन तलाक का हवाला: भूषण ने 2017 के ‘शायरा बानो’ फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि जब ‘तीन तलाक’ को असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है, तो उत्तराधिकार में भेदभाव क्यों जारी रहना चाहिए?
  • आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं: उन्होंने तर्क दिया कि उत्तराधिकार एक नागरिक अधिकार (Civil Right) है और इसे अनुच्छेद 25 के तहत ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ के रूप में संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

आगे का रास्ता

अदालत ने इस मामले को “अत्यंत महत्वपूर्ण” मानते हुए प्रशांत भूषण को याचिका में संशोधन करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा, आप थोड़ा होमवर्क करें और कुछ और अदालती फैसलों (Citations) तथा वैकल्पिक उपायों के साथ आएं। न्यायिक हस्तक्षेप तब अधिक उचित होगा जब ऐसी पीड़ित मुस्लिम महिलाएं सामने आएं जो 1937 के अधिनियम से बाहर निकलना चाहती हैं।

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