Monday, September 21, 2026
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SEXUAL HARASSMENT-REGULATIONS: परिसर में यौन उत्पीड़न रोकने की नई नियमावली…अवांछित शारीरिक स्पर्श भी होगा गलत

SEXUAL HARASSMENT-REGULATIONS: केरल हाईकोर्ट ने अपने परिसर के भीतर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने और लैंगिक संवेदनशीलता (Gender Sensitisation) सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियम अधिसूचित किए हैं।

केरल हाईकोर्ट (निवारण, निषेध और निवारण) विनियम, 2026′ को 17 मार्च को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित किया गया। ये नियम 23 मार्च, 2026 से प्रभावी होंगे, जिनका मुख्य उद्देश्य हाईकोर्ट परिसर में महिलाओं के लिए एक सुरक्षित और गरिमामय कार्य वातावरण तैयार करना है।

GSICC समिति का गठन

  • इन नियमों के तहत एक ‘लैंगिक संवेदनशीलता और आंतरिक शिकायत समिति’ (GSICC) का गठन किया जाएगा, जिसमें 7 से 13 सदस्य होंगे।
  • अध्यक्षता: पैनल में एक या दो जज शामिल होंगे, जिनमें से एक अध्यक्ष होगा।
  • अधिवक्ता सदस्य: केरल हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (KHCAA) के 20 साल के अनुभव वाले 1-2 वकील।
  • महिला प्रतिनिधित्व: केरल फेडरेशन ऑफ विमेन लॉयर्स और क्लर्क एसोसिएशन से एक-एक महिला सदस्य।
  • विशेषज्ञ: मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित NGO या महिला एवं बाल विकास विभाग के विशेषज्ञ।
  • कार्यकाल: प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 2 वर्ष का होगा। समिति हर तीन महीने में कम से कम एक बार बैठक करेगी।

क्या ‘यौन उत्पीड़न’ की श्रेणी में आएगा?

  • नई नियमावली में यौन उत्पीड़न की परिभाषा को काफी व्यापक रखा गया है।
  • शारीरिक संपर्क: अवांछित शारीरिक स्पर्श या आगे बढ़ने की कोशिश।
  • यौन पक्ष (Favours): यौन संबंधों की मांग या अनुरोध करना।
  • अश्लीलता: पोर्नोग्राफी दिखाना या अश्लील संदेश/सामग्री भेजना।
  • पीछा करना (Stalking): किसी महिला का लगातार पीछा करना या उसकी निजी गतिविधियों पर नजर रखना (Voyeurism)।
  • पद का दुरुपयोग: करियर में उन्नति का लालच देकर या नौकरी को नुकसान पहुँचाने की धमकी देकर यौन लाभ मांगना।
  • विषाक्त वातावरण: काम में बाधा डालना या ऐसा माहौल बनाना जिससे महिला के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़े।

कार्यवाही की प्रक्रिया

  • जांच: GSICC शिकायत की जांच के बाद अपनी रिपोर्ट और सिफारिशें मुख्य न्यायाधीश को सौंपेगी।
  • सुनवाई: मुख्य न्यायाधीश दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देंगे और उसके बाद उचित आदेश पारित करेंगे।
  • कानूनी प्राथमिकता: यह स्पष्ट किया गया है कि ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013’ (POSH Act) इन नियमों पर प्रभावी रहेगा। जो शिकायतें 2013 के अधिनियम के दायरे में आती हैं, उन पर GSICC विचार नहीं करेगी।

समिति की जिम्मेदारी

GSICC न केवल शिकायतों का निपटारा करेगी, बल्कि समय-समय पर लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देने के लिए नीतियों का निर्माण और उनके कार्यान्वयन की निगरानी भी करेगी।

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