हाईकोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां और निष्कर्ष
- आरोपों की विश्वसनीयता पर सवाल: 14 सितंबर को पारित अपने आदेश में हाईकोर्ट ने FIR की विषय-वस्तु पर स्पष्ट रूप से अविश्वास जताया:“प्राथमिकी (FIR) की सामग्री और उसका टोन प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं है जो शिकायतकर्ता (पति) द्वारा अपनी पत्नी के खिलाफ गढ़ जा रहे आख्यान पर विश्वास पैदा कर सके।”
- पुलिस द्वारा जल्दबाजी में कार्रवाई: अदालत ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को गंभीरता से लिया कि पुलिस ने पति द्वारा शिकायत पेश किए जाने के उसी दिन (Same Day) बिना किसी प्राथमिक जांच के जल्दबाजी में FIR दर्ज कर ली।
- पीठ ने कहा कि थाना प्रभारी (SHO) को शिकायत में लगाए गए आरोपों और आक्षेपों की प्रकृति की निष्पक्ष जांच करने के लिए कोई समय ही नहीं मिला।
- अंतरिम राहत और नोटिस: हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं का पक्ष प्रथम दृष्टया मजबूत है। कोर्ट ने राज्य सरकार और शिकायतकर्ता पति को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और तब तक के लिए पुलिस जांच पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है।
श्रीनगर/जम्मू: जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy), गर्भ का चिकित्सीय समापन (MTP Act) और वैवाहिक विवादों में जल्दबाजी में दर्ज की जाने वाली आपराधिक प्राथमिकियों पर एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है।
न्यायमूर्ति राहुल भारती की एकल पीठ ने आरोपी महिला और उसकी बहन द्वारा एफआईआर रद्द (Quashing) कराने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पाया कि मामले में लगाए गए आरोपों की भाषा और कथानक प्रथम दृष्टया विश्वास के योग्य प्रतीत नहीं होते। अदालत ने पति द्वारा अपनी पत्नी और साली के खिलाफ बिना उसकी सहमति के 4-5 महीने का गर्भ गिराने (Causing Miscarriage) के आरोप में दर्ज कराई गई आपराधिक प्राथमिकी (FIR) की संपूर्ण जांच पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. एफआईआर की सामग्री और भाषा पर अदालत का संदेह पति द्वारा दर्ज कराए गए आपराधिक मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए न्यायमूर्ति राहुल भारती ने 14 सितंबर के अपने आदेश में कहा: “प्राथमिकी (FIR) की भाषा, लहजे और अंतर्वस्तु को देखने से प्रथम दृष्टया शिकायतकर्ता-पति (प्रतिवादी संख्या 3) द्वारा अपनी पत्नी/याचिकाकर्ता संख्या 1 के खिलाफ गढ़े गए पूरे कथानक पर कोई भरोसा पैदा नहीं होता।”
2. पुलिस द्वारा बिना जांच किए उसी दिन आनन-फानन में FIR दर्ज करना
- अदालत ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क का विशेष संज्ञान लिया कि पुलिस ने शिकायत मिलते ही उसी दिन अत्यधिक जल्दबाजी में एफआईआर दर्ज कर ली।
- पीठ ने रेखांकित किया कि थाने के थाना प्रभारी (SHO) ने शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की सत्यता, पृष्ठभूमि या कानूनी वैधता का प्रारंभिक परीक्षण करने के लिए कोई समय तक नहीं लिया, जो पुलिस की यांत्रिक और गैर-जिम्मेदाराना कार्यशैली को दर्शाता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (पति का परिवाद और BNS की धाराएं)
- शिकायतकर्ता-पति का आरोप: पति ने पुलिस में दी गई शिकायत में आरोप लगाया कि उसकी पत्नी ने अपनी बहन (साली) की सहायता से उसकी सहमति या जानकारी के बिना 4 से 5 महीने का गर्भपात करा लिया। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे गलत तरीके से रोका गया, धमकाया गया और शांति भंग करने के इरादे से अपमानित किया गया।
- दर्ज की गई BNS धाराएं: पुलिस ने पत्नी और उसकी बहन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की निम्नलिखित गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया था:
- धारा 88: गर्भपात कारित करना (पूर्ववर्ती धारा 312 IPC)
- धारा 126(2): गलत तरीके से रोकना / परिरोध (पूर्ववर्ती धारा 341/342 IPC)
- धारा 351(2): आपराधिक धमकी (पूर्ववर्ती धारा 506 IPC)
- धारा 352: शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना (पूर्ववर्ती धारा 504 IPC)
- धारा 3(5): सामान्य आशय (पूर्ववर्ती धारा 34 IPC)
- याचिकाकर्ताओं की दलील: आरोपी महिलाओं ने अधिवक्ता इरफान खान के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर को दुर्भावनापूर्ण, आधारहीन और कानून की स्थापित प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए रद्द करने की मांग की।
हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश
- जांच पर रोक: अदालत ने संबंधित पुलिस थाने को निर्देश दिया कि उक्त विवादित एफआईआर के संबंध में की जा रही सभी आपराधिक जांच कार्रवाइयों पर अंतरिम रोक रहेगी।
- नोटिस जारी: उच्च न्यायालय ने प्रथम दृष्टया मामला पाते हुए केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन और शिकायतकर्ता-पति को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। यह अंतरिम आदेश प्रतिवादी पक्ष द्वारा पेश की जाने वाली आपत्तियों के अधीन रहेगा।
- अगली सुनवाई: मामले को अगली सुनवाई के लिए 23 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: पत्नी एवं अन्य (याचिकाकर्ता) बनाम जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश एवं अन्य [धारा 528 BNSS (पूर्ववर्ती 482 CrPC) याचिका – जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 88, 126(2), 351(2), 352 एवं धारा 3(5); गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 (MTP Act, 1971); भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- सुप्रीम कोर्ट (एक्स बनाम प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, 2022) — ‘एक महिला का अपनी शारीरिक अखंडता और प्रजनन विकल्पों पर पूर्ण अधिकार है; गर्भधारण जारी रखना या न रखना पूरी तरह महिला का निजी संवैधानिक अधिकार (Reproductive Autonomy) है, जिसमें पति की सहमति अनिवार्य शर्त नहीं है।’
- ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (सुप्रीम कोर्ट) — ‘वैवाहिक विवादों और पारिवारिक मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) की जानी चाहिए।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (महिला और उसकी बहन) की ओर से: अधिवक्ता इरफान खान
- पीठ: न्यायमूर्ति राहुल भारती (जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय)
MTP Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति राहुल भारती (Justice Rahul Bharti) |
| याचिकाकर्ता | शिकायतकर्ता की पत्नी और उसकी बहन |
| मूल मामला | पति की सहमति के बिना 4-5 महीने का गर्भपात कराने का आरोप |
| लागू धाराएं | BNS, 2023 की धारा 88 (गर्भपात कराना), 126(2), 351(2), 352, और 3(5) |
| अदालत का अंतरिम आदेश | FIR की जांच पर रोक लगाई; अगली सुनवाई 23 अक्टूबर 2026 |

