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Judicial Independence: तबादले का डर जजों को कमजोर नहीं बनाना चाहिए…न्यायिक स्वतंत्रता व कॉलेजियम पर जस्टिस मनमोहन की राय

Judicial Independence: जस्टिस मनमोहन ने कहा कि हाई कोर्ट का जज तभी प्रभावी ढंग से काम कर सकता है जब वह पूर्ण अधिकार और स्वतंत्रता के साथ सुरक्षित महसूस करे।

जस्टिस मनमोहन का यह भाषण न्यायपालिका के भीतर चल रहे ‘आत्ममंथन’ को दर्शाता है। उनका स्पष्ट संदेश है कि “स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए जजों का निडर होना अनिवार्य है।”

जस्टिस मनमोहन के बिदुवार वक्तव्य

जजों का तबादला और ‘डर’ की राजनीति

  • जस्टिस मनमोहन ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि तबादले का डर जजों की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है।
  • कमजोर करना (Emasculation): उन्होंने कहा कि तबादले के डर से किसी हाई कोर्ट जज को “शक्तिहीन” (Emasculate) नहीं किया जाना चाहिए।
  • पूर्ण अधिकार: एक जज तभी स्वतंत्र रूप से काम कर सकता है जब वह ट्रांसफर की चिंता किए बिना फैसले ले। उन्होंने इस मुद्दे पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस (Wider debate) की जरूरत बताई।
  • संदर्भ: यह टिप्पणी जस्टिस अतुल श्रीधरन के मध्य प्रदेश से इलाहाबाद हाई कोर्ट तबादले के हालिया विवाद के संदर्भ में देखी जा रही है, जहां सरकार के हस्तक्षेप की बात सामने आई थी।

कोलेजियम सिस्टम पर सवाल (Mistrust in the System)

  • जस्टिस मनमोहन ने वर्तमान कोलेजियम सिस्टम की आंतरिक चुनौतियों पर भी प्रहार किया।
  • चीफ जस्टिस पर भरोसा: उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी राज्य के हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस (जो एक संवैधानिक पद है) किसी नाम की सिफारिश करता है, तो उस पर संदेह क्यों किया जाता है?
  • देरी का कारण: “सिस्टम में यह अविश्वास हमें बहुत भारी पड़ रहा है।” सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम, सरकार और आईबी (IB) की लंबी प्रक्रिया प्रतिभा (Talent) को न्यायपालिका में आने से रोक रही है।
  • पारदर्शिता: उन्होंने कोलेजियम सिस्टम की ‘थ्रेडबेयर’ (पूरी तरह से) जांच और बहस करने की वकालत की।

कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका (Executive’s Role)

  • जस्टिस मनमोहन ने इस बात पर भी दुःख जताया कि अदालतों को अब बुनियादी जरूरतों के लिए हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।
  • बुनियादी मुद्दे: ताजी हवा और साफ पानी जैसे मुद्दे, जिन्हें पहले सामान्य माना जाता था, अब रोजाना अदालतों में पहुंच रहे हैं।
  • सरकार की जिम्मेदारी: यह काम सरकार और कार्यपालिका (Executive) का है, न कि न्यायपालिका का। लोग केवल इसलिए कोर्ट आते हैं क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प या फोरम नहीं बचा है।

लंबित मामलों (Pendency) का असली कारण

  • पेंडेंसी (मामलों के बोझ) पर उन्होंने कहा कि यह केवल संख्याओं का खेल नहीं है।
  • बुनियादी ढांचे की कमी: जमीनी स्तर पर संसाधनों और न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है।
  • स्ट्रक्चरल समस्या: जब तक हम संसाधनों की कमी जैसी संरचनात्मक समस्याओं को ठीक नहीं करेंगे, तब तक न्याय में देरी बनी रहेगी।
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