Saturday, August 15, 2026
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Digital Defamation: सोशल मीडिया पोस्ट को दोबारा छापना भी अपराध…एक मैगजीन की दलील यूं ठुकराई गई

Digital Defamation: केरल हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया के दौर में ‘संपादकीय जिम्मेदारी’ (Editorial Responsibility) को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम की है।

हाईकोर्ट के जस्टिस जी. गिरीश ने ‘वेल्लीनाक्षत्रम’ (Vellinakshatram) मैगजीन के संपादकों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज मानहानि के केस को रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई अपमानजनक बात पहले से सोशल मीडिया पर मौजूद है, तो उसे दोबारा प्रकाशित करना भी आपराधिक मानहानि (Criminal Defamation) के दायरे में आएगा।

मामला क्या था? (The Background)

  • विवाद: अभिनेता-निर्देशक महेश पी. नायर और निर्देशक बैजू कोट्टारक्करा के बीच एक हाई-प्रोफाइल रेप केस में आरोपी अभिनेता का समर्थन करने को लेकर मतभेद था।
  • अपमानजनक पोस्ट: कोट्टारक्करा ने फेसबुक पर महेश के खिलाफ कथित तौर पर बेहद आपत्तिजनक बातें लिखीं।
  • पुनः प्रकाशन (Republishing): ‘वेल्लीनाक्षत्रम’ मैगजीन ने उन अपमानजनक टिप्पणियों को हूबहू अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित कर दिया।

संपादकों की दलील: “यह तो पहले से ही पब्लिक डोमेन में था”

संपादकों ने कोर्ट में तर्क दिया कि उन्होंने केवल उस पोस्ट को ‘री-डिस्प्ले’ (Redisplay) किया है जो पहले से ही सोशल मीडिया पर उपलब्ध थी। चूंकि वह जानकारी पहले ही जनता तक पहुँच चुकी थी, इसलिए इसे दोबारा दिखाने से IPC की धारा 500 के तहत अपराध नहीं बनता।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: “कॉपी-पेस्ट से जिम्मेदारी खत्म नहीं होती”

  • अदालत ने संपादकों की दलील को सिरे से खारिज करते हुए महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु रखे।
  • आपराधिक दायित्व (Criminal Liability): कोर्ट ने कहा कि अगर कोई बात मानहानिकारक है, तो इस तथ्य से कि वह पहले से पब्लिक डोमेन में थी, संपादकों की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
  • धारा 499 के अपवाद: जब तक संपादकों का कृत्य IPC की धारा 499 में दिए गए 10 अपवादों में से किसी एक में नहीं आता, तब तक उन पर मानहानि का मुकदमा चलेगा।
  • छवि पर प्रभाव: महेश पी. नायर के दोस्तों और शुभचिंतकों ने गवाही दी कि वेबसाइट पर वह खबर पढ़ने के बाद उनकी नजरों में महेश का चरित्र धूमिल हुआ। उन्हें लगा कि महेश ने निजी स्वार्थ के लिए एक आरोपी का समर्थन किया है।

कोर्ट का फैसला और निर्देश

  • मुकदमा जारी रहेगा: हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा जारी समन और कानूनी कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया। संपादकों को अब ट्रायल (Trial) का सामना करना होगा।
  • चेतावनी: कोर्ट ने माना कि वेबसाइट पर अपमानजनक शब्दों को उद्धृत (Quote) करना भी “प्रकाशन” (Publishing) की श्रेणी में आता है और यह किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने के लिए पर्याप्त है।

निष्कर्ष: डिजिटल युग में सावधानी जरूरी

यह फैसला डिजिटल मीडिया और पत्रकारों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। किसी दूसरे व्यक्ति की सोशल मीडिया पोस्ट को बिना सोचे-समझे अपनी वेबसाइट या पोर्टल पर साझा करना भारी पड़ सकता है। ‘सोर्स’ का हवाला देना मानहानि के मामले में पूर्ण बचाव (Defense) नहीं है।

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