मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय न्यायाधीश | न्यायमूर्ति फरजंद अली (Justice Farjand Ali) |
| स्थान/संस्थान | गुरुद्वारा महताबगढ़ साहिब, हनुमानगढ़ (राजस्थान) |
| संबंधित कानून | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 164 एवं 165 |
| मुख्य सिद्धांत | आस्था या लंबे प्रबंधन से संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिलता; शांति व्यवस्था के लिए जब्ती पूरी तरह वैध है। |
Title of Gurudwara: राजस्थान हाईकोर्ट (Rajasthan High Court) ने हनुमानगढ़ स्थित ‘गुरुद्वारा महताबगढ़ साहिब’ की जब्ती (Attachment) और वहां रिसीवर (Receiver) की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है।
न्यायमूर्ति फरजंद अली (Justice Farjand Ali) की एकल पीठ ने गुरुद्वारे की मुख्य सेवादार हरमीत कौर उर्फ बीबी द्वारा दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल धार्मिक आस्था या लंबे समय से प्रबंधन करने मात्र से किसी संपत्ति पर कानूनी स्वामित्व (Title) या विशेष अधिकार स्थापित नहीं हो जाता। सुनवाई के दौरान पीठ ने महात्मा गांधी के 18 मार्च 1933 को ‘हरिजन’ पत्रिका में प्रकाशित लेख का भी संदर्भ दिया, जिसमें पूजा स्थलों को मनुष्य की “अदृश्य” तक पहुँचने की इच्छा का प्रतीक बताया गया था।
हाई कोर्ट की प्रमुख और ऐतिहासिक टिप्पणियां
- आस्था बनाम कानूनी स्वामित्व:“याचिकाकर्ता या किसी भी श्रद्धालु की आस्था वास्तविक, गहरी और अटूट हो सकती है; लेकिन ऐसी आस्था, चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो, स्वयं संपत्ति पर स्वामित्व स्थापित नहीं कर सकती। किसी धार्मिक स्थान पर लंबे समय तक रहना धार्मिक जुड़ाव या प्रबंधन स्थापित कर सकता है, लेकिन किसी कानूनी अधिकार के बिना यह मालिकाना हक या विशेष कब्जे को सिद्ध नहीं करता।”
- महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख
- अदालत ने गांधीजी के लेख का हवाला देते हुए कहा कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए न तो पेन, स्याही, कागज और न ही भाषा की आवश्यकता होती है। मूक पूजा ही सबसे सुंदर आस्था का रूप बनती है। पूजा स्थल आस्था द्वारा निर्मित होते हैं और मनुष्य की परमात्मा से जुड़ने की लालसा का उत्तर हैं।
- BNSS की धारा 164 व 165 के तहत कार्रवाई का उद्देश्य
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 164 (शांति भंग की आशंका) और धारा 165 (संपत्ति की जब्ती व रिसीवर की नियुक्ति) के तहत की गई कार्रवाई निरोधात्मक (Preventive) होती है।
- इसका उद्देश्य शांति बनाए रखना है, किसी पक्ष को विजेता घोषित करना या मालिकाना हक तय करना नहीं।
- SGPC की भूमिका पर स्पष्टीकरण
- कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान या परंपरा नहीं है कि हर गुरुद्वारे का केंद्रीय नियंत्रण शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के पास ही हो। स्थानीय व्यवस्थाओं द्वारा भी गुरुद्वारों की स्थापना और संचालन हो सकता है।
विवाद का बैकग्राउंड (Case Background)
- घटना: 3 अक्टूबर 2025 को तड़के लगभग 3:15 बजे हथियारों से लैस 50-60 लोगों के समूह ने गुरुद्वारे की बाउंड्री वॉल लांघकर परिसर में घुसने का प्रयास किया था।
- कानून-व्यवस्था का संकट: दो एफआईआर (FIR) दर्ज होने के बाद क्षेत्र में लगातार तनाव और हिंसा की आशंका बनी हुई थी।
- प्रशासनिक आदेश: कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) ने 3 अक्टूबर 2025 को गुरुद्वारे को अटैच कर गोलूवाला पुलिस स्टेशन के SHO को रिसीवर नियुक्त कर दिया था। इस आदेश को पहले ट्रायल कोर्ट ने और अब हाई कोर्ट ने सही ठहराया है।
अदालत का अंतिम निर्देश
- याचिका को खारिज करते हुए SDM के जब्ती आदेश को सही ठहराया गया।
- गोलूवाला पुलिस स्टेशन के वर्तमान SHO को निर्देश दिया गया कि वे क्षेत्र की कानून-व्यवस्था की स्थिति का नए सिरे से मूल्यांकन करें और हनुमानगढ़ के पुलिस अधीक्षक (SP) को रिपोर्ट सौंपें।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने संपत्ति के अंतिम स्वामित्व या स्थायी प्रबंधन पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है। इसके लिए पक्षकार सक्षम सिविल कोर्ट (Competent Forum) का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

