Saturday, August 15, 2026
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Press Freedom: जनहित में सच लिखते हैं तो डरें नहीं, यह कोई मानहानि नहीं…इस तरह Him Himwanti के संपादक की रिहाई बरकरार

Press Freedom: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने मानहानि (Defamation) के एक मामले में हिम हिमवंती (Him Himwanti) अखबार के मुख्य संपादक को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है।

हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप शर्मा ने एक पूर्व IAS अधिकारी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की। अधिकारी ने ‘हिम हिमवंती’ अखबार के संपादक पर भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाकर उनकी छवि धूमिल करने का आरोप लगाया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई खबर सच्चाई, जनहित और नेक नियत (Good Faith) से प्रकाशित की गई है, तो उसे मानहानि नहीं माना जा सकता। यह फैसला उन पत्रकारों के लिए एक बड़ी राहत है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि अगर पत्रकार के पास अपनी बात साबित करने के लिए ठोस आधार और नेक नियत है, तो वे मानहानि के डर के बिना अपना काम कर सकते हैं।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणी: लोक सेवक और आलोचना

  • कोर्ट ने लोक सेवकों (Public Servants) की जवाबदेही पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
  • नेक नियति (Good Faith): “किसी लोक सेवक के सार्वजनिक कार्यों के संबंध में नेक नियति से कोई राय व्यक्त करना मानहानि नहीं है।
  • सत्य ही बचाव है: धारा 499 के तहत, यदि कोई बात सत्य है और उसे जनहित (Public Good) के लिए प्रकाशित किया गया है, तो वह अपराध की श्रेणी में नहीं आती।

मामला क्या था? (The Background)

  • घटना: यह विवाद 2001 का है, जब शिकायतकर्ता अधिकारी सिरमौर के डिप्टी कमिश्नर के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने ‘हिमाचल प्रदेश टेनेंसी एंड लैंड रिफॉर्म्स एक्ट’ के तहत एक फैसला सुनाया था।
  • आरोप: अधिकारी का दावा था कि इस फैसले से नाराज होकर संपादक ने अपने साप्ताहिक अखबार में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाए और राज्यपाल को पत्र लिखकर उनकी छवि खराब की।
  • ट्रायल: निचली अदालत ने संपादक को बरी कर दिया था, जिसे अधिकारी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट के फैसले के मुख्य आधार

  • अदालत ने संपादक के पक्ष में कई महत्वपूर्ण बिंदु पाए।
  • सिविल कोर्ट का फैसला: अधिकारी ने पहले एक दीवानी मामला (Civil Suit) भी दायर किया था जिसे 2009 में खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि सिविल कोर्ट के निष्कर्ष तब तक मान्य रहते हैं जब तक उन्हें पलटा न जाए।
  • आदेशों का रद्द होना: यह पाया गया कि शिकायतकर्ता अधिकारी द्वारा भूमि सुधार अधिनियम के तहत दिए गए आदेशों को बाद में उच्च अधिकारियों (Divisional Commissioner) ने रद्द कर दिया था। इससे संपादक की “उचित आशंका” (Reasonable Apprehension) को बल मिला।
  • बदले की भावना का अभाव: कोर्ट ने माना कि ‘मानहानि’ साबित करने के लिए नुकसान पहुँचाने की मंशा (Intention to Harm) का होना जरूरी है। इस मामले में संपादक ने जनहित में उच्च अधिकारियों को शिकायत की थी, जिसे दुर्भावनापूर्ण नहीं कहा जा सकता।

मानहानि की परिभाषा (Section 499 IPC)

कोर्ट ने याद दिलाया कि IPC की धारा 499 में “Intended to be” (इरादा होना) शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। अगर संपादक ने एक जिम्मेदार पत्रकार के रूप में तथ्यों के आधार पर खबर छापी है, तो वह सजा (धारा 500) का पात्र नहीं है।

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