Bar-Bench: सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHCAA) के अध्यक्ष यतिन ओझा को बड़ी राहत देते हुए उनकी सजा और दोषसिद्धि को निलंबित कर दिया है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | तथ्य |
| सुप्रीम कोर्ट की शक्ति | अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की शक्ति)। |
| मुख्य शर्त | हर 2 साल में आचरण की समीक्षा। |
| तात्कालिक प्रभाव | दोषसिद्धि और सजा पर रोक (Indefinite Stay)। |
| बड़ी टिप्पणी | न्यायपालिका की गरिमा को ‘धमकाने’ (Browbeating) की अनुमति नहीं। |
पीठासीन न्यायाधीश पर “फोरम शॉपिंग”का आरोप
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने इसे ‘क्षमा का अंतिम कार्य’ (Final act of forgiveness) करार दिया है। यह मामला अप्रैल 2024 की एक घटना से जुड़ा है, जब यतिन ओझा ने कथित तौर पर एक पीठासीन न्यायाधीश पर “फोरम शॉपिंग” (अपनी पसंद की बेंच चुनना) का आरोप लगाया था। इसके बाद गुजरात हाई कोर्ट ने उन्हें अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुए ‘कोर्ट उठने तक’ की सजा सुनाई थी।
अनुच्छेद 142 का प्रयोग और ‘प्रोबेशन’
- सुप्रीम कोर्ट ने ओझा की दोषसिद्धि (Conviction) को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया है, लेकिन कुछ कड़ी शर्तों के साथ।
- द्विवार्षिक समीक्षा: गुजरात हाई कोर्ट की ‘फुल कोर्ट’ (सभी जजों की बैठक) हर दो साल में ओझा के आचरण की समीक्षा करेगी।
- अंतिम चेतावनी: यदि ओझा भविष्य में फिर से ऐसा ही आचरण करते हैं, तो हाई कोर्ट उनकी सजा को तत्काल प्रभावी करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में आवेदन कर सकेगा।
- वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा: कोर्ट ने हाई कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह ओझा के ‘सीनियर गाउन’ (Senior Advocate status) को वापस लेने या बनाए रखने के बारे में स्वतंत्र रूप से निर्णय ले, जिसे इस द्विवार्षिक समीक्षा का हिस्सा बनाया जा सकता है।
अयोग्यता से बचाव
- इस निलंबन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ओझा पर अब कोई कानूनी अयोग्यता प्रभावी नहीं होगी।
- एडवोकेट्स एक्ट की धारा 24-A: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस दोषसिद्धि के कारण ओझा पर ‘एडवोकेट्स एक्ट’ के तहत कोई अयोग्यता या नुकसान नहीं होगा।
- 19वीं बार अध्यक्ष: बता दें कि यतिन ओझा दिसंबर 2025 में 19वीं बार GHCAA के अध्यक्ष चुने गए हैं।
अदालतें न्याय का पवित्र मंदिर हैं
- फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की गरिमा पर कुछ अत्यंत मार्मिक टिप्पणियां कीं।
- अस्थायी किराएदार: “न्यायाधीश, वकील और कर्मचारी इस न्याय के मंदिर के केवल अस्थायी किराएदार हैं, लेकिन यह संस्था स्वयं अमर है। यह हम सभी के बाद भी जीवित रहेगी।”
- सामूहिक कर्तव्य: कोर्ट ने कहा कि भारत के नागरिक होने के नाते हमारा सामूहिक कर्तव्य है कि हम न्याय वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता को बनाए रखें और इसे कम न होने दें।
विवादों का इतिहास (Recap of the case)
- 2020: ओझा ने हाई कोर्ट को “जुआ घर” (Gambling den) कहा था, जिसके बाद उनका ‘सीनियर एडवोकेट’ का दर्जा छीन लिया गया था।
- 2021: सुप्रीम कोर्ट ने “एक आखिरी मौका” देते हुए उनका दर्जा बहाल किया था।
- 2024: फिर से न्यायाधीश पर “फोरम शॉपिंग” का आरोप लगाने के कारण उन्हें दोबारा अवमानना का सामना करना पड़ा।
गरिमा और माफी के बीच संतुलन
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश दर्शाता है कि न्यायपालिका अपने सदस्यों के प्रति उदारता दिखा सकती है, लेकिन संस्था की मर्यादा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यतिन ओझा के लिए यह वास्तव में ‘करो या मरो’ की स्थिति है—अगली कोई भी गलती उनके दशकों लंबे करियर को हमेशा के लिए खत्म कर सकती है।

