Bail Pleas: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के उच्च न्यायालयों में लंबित जमानत याचिकाओं (Bail Pleas) के “पहाड़” पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए एक विस्तृत गाइडलाइन जारी की है।
जमानत के मामलों में देरी अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि जमानत के मामलों में देरी सीधे तौर पर अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। अदालत ने ‘इलाहाबाद’ और ‘पटना’ हाई कोर्ट की स्थिति को विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण माना और समाधान के लिए “सॉफ्टवेयर आधारित ऑटोमेशन” का सुझाव दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल से प्राप्त डेटा का विश्लेषण करने के बाद दिया है। कोर्ट ने माना कि अधिकांश हाई कोर्ट प्रयास कर रहे हैं, लेकिन सिस्टम में बुनियादी बदलाव की जरूरत है।
प्रमुख सुझाव: कैसे खत्म होगी देरी?
- सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों की रफ़्तार बढ़ाने के लिए निम्नलिखित तकनीकी और प्रशासनिक उपाय सुझाए हैं।
- ऑटोमैटिक सॉफ्टवेयर लिस्टिंग: जमानत याचिकाओं को लिस्ट करने के लिए एक स्वचालित प्रणाली हो, जिससे हर याचिका कम से कम दो सप्ताह में एक बार कोर्ट के सामने जरूर आए।
- नोटिस की परंपरा खत्म हो: कोर्ट ने कहा कि जमानत अर्जी स्वीकार करने और नोटिस जारी करने की लंबी प्रक्रिया के बजाय सीधे लिस्टिंग और सुनवाई होनी चाहिए।
- अनिवार्य स्टेटस रिपोर्ट: पहली सुनवाई से पहले ही जांच एजेंसी को ‘स्टेटस रिपोर्ट’ फाइल करनी होगी। इसके लिए डिजिटल पोर्टल का उपयोग किया जाए।
- निश्चित समय सीमा (Outer Timeline): हाई कोर्ट्स को अपने स्तर पर एक बाहरी समय सीमा तय करनी चाहिए कि किसी भी जमानत याचिका का निपटारा अधिकतम कितने दिनों में हो जाएगा।
इलाहाबाद और पटना हाई कोर्ट पर विशेष टिप्पणी
- इलाहाबाद हाई कोर्ट: पीठ ने नोट किया कि यहाँ लंबित मामलों की संख्या “अत्यधिक” है। हालांकि जज दिन में 100-200 केस सुन रहे हैं, फिर भी वॉल्यूम अनियंत्रित है। कोर्ट ने यहाँ के मुख्य न्यायाधीश को “विशेष तंत्र” विकसित करने की छूट दी है।
- पटना हाई कोर्ट: यहां मामलों को लंबे समय के लिए स्थगित (Adjourn) करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई गई और सुधार के निर्देश दिए गए।
जांच अधिकारियों (IO) और FSL की जवाबदेही
- कोर्ट ने देरी के लिए केवल न्यायपालिका को नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों को भी जिम्मेदार ठहराया।
- FSL रिपोर्ट: विशेष रूप से NDPS (नशीले पदार्थ) मामलों में, फोरेंसिक रिपोर्ट समय पर न मिलने से जमानत में देरी होती है। कोर्ट ने इसे उचित समय के भीतर उपलब्ध कराने को कहा है।
- पीड़ितों के अधिकार: जांच अधिकारियों (IO) को यह सुनिश्चित करना होगा कि पीड़ित पक्ष को सुनवाई की सूचना मिले और उन्हें अपनी बात रखने का कानूनी अवसर प्राप्त हो।
- सरकारी वकीलों पर लगाम: कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट्स को सरकारी वकीलों द्वारा ली जाने वाली ‘कैजुअल’ या ‘अनावश्यक’ तारीखों (Adjournments) को हतोत्साहित करना चाहिए।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| समस्या | सुप्रीम कोर्ट का समाधान |
| लिस्टिंग में देरी | सॉफ्टवेयर आधारित ऑटोमैटिक लिस्टिंग (हर 15 दिन में)। |
| रिपोर्ट का इंतजार | पहली सुनवाई से पहले डिजिटल पोर्टल पर स्टेटस रिपोर्ट अनिवार्य। |
| तारीख पे तारीख | सरकारी वकीलों के अनावश्यक स्थगन पर रोक। |
| स्वतंत्रता का हनन | अनुच्छेद 21 के तहत समयबद्ध निपटारे को ‘पवित्र कर्तव्य’ माना। |
डिजिटल जस्टिस’ की ओर कदम
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश संकेत देता है कि अब न्यायपालिका मैन्युअल प्रक्रियाओं के बजाय एल्गोरिदम और सॉफ्टवेयर पर भरोसा करना चाहती है ताकि मानवीय हस्तक्षेप और देरी को कम किया जा सके। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि जमानत के मामले में “प्रतीक्षा” (Wait) कोई विकल्प नहीं होना चाहिए, क्योंकि जेल में बंद व्यक्ति के लिए हर दिन उसकी स्वतंत्रता का हनन है।

