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POCSO Case: बिना न्याय के कानून, बिना इंजन की फेरारी जैसा…प्रेमी जोड़ों के मिलन पर हाईकोर्ट की इस नसीहत को जरूर पढ़ें

POCSO Case: कलकत्ता हाई कोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की 10 साल की सजा को रद्द कर दिया है।

प्रेम संबंध से शुरू होकर शारीरिक संबंध तक गया था मामला

जस्टिस अरिजीत बनर्जी और जस्टिस अपूर्वा सिन्हा राय की पीठ ने एक ऐसे परिवार को “तबाह” होने से बचा लिया, जो पिछले 10 सालों से कानूनी लड़ाई लड़ रहा था। एक ऐतिहासिक और मानवीय फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने “न्याय” को “कानून की कठोरता” से ऊपर रखते हुए कहा कि बिना न्याय के कानून वैसा ही है जैसे “बिना इंजन के फेरारी”। यह मामला एक ऐसे प्रेमी जोड़े का था जिनका प्रेम संबंध तब शुरू हुआ जब युवक 24 वर्ष का था और लड़की 14 वर्ष की। शारीरिक संबंधों के कारण लड़की गर्भवती हुई, जिसके बाद अस्पताल की रिपोर्ट पर पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था।

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फेरारी और फ्रिज का उदाहरण

  • अदालत ने कानून और न्याय के बीच के संबंध को समझाने के लिए बहुत ही सटीक उपमाओं का उपयोग किया।
  • व्यर्थ कानून: “न्याय के बिना कानून उतना ही व्यर्थ है जितनी बिना इंजन की फेरारी, और उतना ही बेकार है जितना बिना कंप्रेसर के रेफ्रिजरेटर।”
  • साधन मात्र: कोर्ट ने कहा कि कानून अपने आप में अंत नहीं है, बल्कि एक “न्यायपूर्ण अंत” तक पहुँचने का साधन है। इसे वास्तविकता और मानवता से अलग नहीं किया जा सकता।

“सागर में मिलती नदी” जैसा प्राकृतिक प्रेम

  • कोर्ट ने दोनों के बीच के संबंधों की गहराई को स्वीकार किया।
  • सहमति और मन का मिलन: “लड़की की भावनाओं की तीव्रता इस बात से स्पष्ट थी कि उसने गवाह के कटघरे में खड़े होकर खुलेआम कहा कि वह उसके बच्चे की माँ बनना चाहती थी। यह केवल शारीरिक संबंध नहीं, बल्कि मन का मिलन था।”
  • प्राकृतिक मिलन: जजों ने उनके शारीरिक संबंधों को “सागर में गिरती नदी” की तरह प्राकृतिक माना और कहा कि इसमें वासना या हिंसा की कोई भूमिका नहीं थी।

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परिवार को विनाश (Annihilation) से बचाना

  • कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या कानून की तकनीकी बारीकियों का पालन करते हुए एक हँसते-खेलते परिवार को उजाड़ देना सही होगा?
  • वर्तमान स्थिति: लड़की अब वयस्क हो चुकी है, दोनों ने शादी कर ली है और उनके दो बच्चे (9 और 7 साल) हैं।
  • संभावित परिणाम: यदि कोर्ट सजा बरकरार रखता, तो घर का एकमात्र कमाने वाला सदस्य जेल चला जाता, जिससे पत्नी और बच्चे बेसहारा हो जाते।
  • अदालत का विवेक: कोर्ट ने कहा कि सजा बरकरार रखना न्याय वितरण प्रणाली के लिए “शर्म और अपमान” की बात होती।

पॉक्सो एक्ट (POCSO) की ‘कठोरता’ पर टिप्पणी

  • अदालत ने पॉक्सो एक्ट के उद्देश्य को सराहनीय बताया, लेकिन इसकी “कठोरता” (Rigidity) को इसकी कमी माना।
  • मजबूर निचली अदालत: कोर्ट ने स्वीकार किया कि ट्रायल कोर्ट के पास कानून के कारण सजा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, क्योंकि लड़की उस समय नाबालिग थी।
  • अनुच्छेद 21 का हवाला: हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 पर भरोसा किया और कहा कि एक सुखद वैवाहिक जीवन का मौलिक अधिकार और साथी चुनने का अधिकार किसी भी वैधानिक प्रावधान से ऊपर है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य/कोर्ट की टिप्पणी
मामला10 साल पुराने पोक्सो केस में सजा के खिलाफ अपील।
रिश्ताआपसी सहमति से प्रेम और अब एक सुखी वैवाहिक परिवार।
अदालत का तर्ककानून को मानवता से अलग नहीं किया जा सकता।
फैसलादोषसिद्धि और सजा रद्द; परिवार को साथ रहने की अनुमति।
प्रसिद्ध उपमाकानून बिना न्याय = फेरारी बिना इंजन।

कानून का मानवीय चेहरा

कलकत्ता हाई कोर्ट का यह फैसला एक नजीर है कि अदालतों को “अंधा कानून” लागू करने के बजाय सामाजिक वास्तविकता और मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह आदेश उन हजारों जोड़ों के लिए उम्मीद की किरण है जिनके ‘सहमति वाले संबंधों’ को पोक्सो की तकनीकी जटिलताओं के कारण अपराध मान लिया जाता है।

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