Divorce Settlement: सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाक समझौते (Divorce Settlement) को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि एक मां को उसकी 3 साल की बेटी से मिलने से पूरी तरह रोकना “विचलित करने वाला” (Disturbing) है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | कोर्ट का निर्देश |
| बच्चे की उम्र | 3 वर्ष। |
| विवादित शर्त | मां को मिलने के अधिकार से वंचित करना। |
| कोर्ट का निष्कर्ष | समझौता ‘अमानवीय’ और ‘बच्चे के हितों के खिलाफ’ है। |
| मुख्य संदेश | वैवाहिक कलह से ऊपर बच्चे का भावनात्मक कल्याण है। |
| अनुच्छेद 142 | कोर्ट ने पूर्ण न्याय करने के लिए अपनी विशेष शक्ति का प्रयोग किया। |
आपसी सहमति से तलाक वाली याचिका पर सुनवाई
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि बच्चा केवल 3 साल का है और जैसे-जैसे वह बड़ा होगा, उसे माता और पिता दोनों के प्यार और ध्यान की आवश्यकता होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के आपसी विवादों के बीच बच्चे का कल्याण (Welfare of the Child) सबसे ऊपर होना चाहिए। यह मामला एक स्थानांतरण याचिका (Transfer Petition) और आपसी सहमति से तलाक (Section 13B) के लिए दायर आवेदन से जुड़ा था। मध्यस्थता केंद्र (Mediation Centre) में दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ था, जिसकी एक शर्त ने जजों को हैरान कर दिया।
“विचलित करने वाली” शर्त
समझौते में एक ऐसी क्लॉज (Clause) शामिल थी जिसमें लिखा था कि बेटी की कस्टडी केवल पति के पास रहेगी और पत्नी को कोई मुलाकाती अधिकार (No visitation rights) नहीं मिलेगा। मां की भविष्य में बच्चे के प्रति कोई जिम्मेदारी या दायित्व नहीं होगा।सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को पढ़ते ही इसे “disturbing” बताया और कहा कि वह ऐसे किसी भी समझौते पर अपनी मुहर नहीं लगाएगा जो बच्चे के भावनात्मक अधिकारों का हनन करता हो।
सुलह की नई उम्मीद: “कोई गंभीर विवाद नहीं है”
- जजों ने जब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और फिर व्यक्तिगत रूप से पति-पत्नी से बातचीत की, तो उन्हें लगा कि यह रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
- मामूली गलतफहमी: कोर्ट ने दर्ज किया कि दोनों के बीच कोई बड़ी नफरत या गंभीर आरोप नहीं हैं। वे केवल छोटी-मोटी गलतफहमियों की वजह से अलग हुए हैं।
- समझौता रद्द: कोर्ट ने कहा, “दंपति से बात करने के बाद, हम इस समझौते को सीधे तौर पर खारिज करते हैं।”
- सुलह की सलाह: जजों ने उन्हें सलाह दी कि अपनी बेटी के भविष्य के लिए वे फिर से साथ रहने पर विचार करें।
वरिष्ठ मध्यस्थ के पास दोबारा भेजा मामला
- कोर्ट ने अब मामले को एक वरिष्ठ मध्यस्थ (Senior Mediator) को सौंप दिया है, जिसे विशेष निर्देश दिए गए हैं।
- समान व्यवस्था: मध्यस्थ को एक ऐसा रास्ता निकालना होगा जिसमें मां को मिलने का अधिकार मिले।
- यात्रा का खर्च: कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि मध्यस्थता के लिए महिला को कहीं जाना पड़े, तो पति उसके यात्रा और ठहरने का खर्च उठाएगा।
कानून से ऊपर भावनाएं
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक नजीर है कि तलाक के मामलों में पति-पत्नी अपनी शर्तों पर समझौता तो कर सकते हैं, लेकिन वे बच्चे के “माता-पिता पाने के अधिकार” का सौदा नहीं कर सकते। कानून की नजर में बच्चा कोई संपत्ति नहीं है, बल्कि एक जीवित इकाई है जिसके अधिकारों की रक्षा करना अदालत का “पैरेंट्स पैट्रिया” (Parens Patriae) कर्तव्य है।

