Monday, August 17, 2026
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Maintenance Law: बहू से गुजारा भत्ता मांगना ससुर-सास का कानूनी अधिकार नहीं…इस कारण हाईकोर्ट ने दिया फैसला

Maintenance Law: इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला कानूनी अधिकार (Legal Right) और नैतिक जिम्मेदारी (Moral Obligation) के बीच के अंतर को बहुत स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है।

हाईकोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह की सिंगल बेंच ने आगरा के एक बुजुर्ग दंपत्ति की पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज कर दिया। दंपत्ति ने अपने पुलिस कांस्टेबल बेटे की मृत्यु के बाद अपनी बहू (जो खुद एक कांस्टेबल है) से गुजारा भत्ता की मांग की थी। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि केवल सहानुभूति के आधार पर कानून की सीमाओं से बाहर जाकर आदेश नहीं दिया जा सकता। यह फैसला यह याद दिलाता है कि भावनाएं और सामाजिक अपेक्षाएं हमेशा कानून का आधार नहीं होतीं। जहाँ CrPC/BNSS एक त्वरित राहत (Quick Remedy) प्रदान करता है, वहीं पारिवारिक अधिकारों के विस्तृत विवादों के लिए ‘पर्सनल लॉ’ (जैसे HAMA) का सहारा लेना पड़ता है।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणी: कानून बनाम नैतिकता

  • सीमित दायरा: “CrPC की धारा 125 (अब BNSS के संबंधित प्रावधान) के तहत भरण-पोषण का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है और यह केवल उन्हीं श्रेणियों तक सीमित है जिनका कानून में स्पष्ट उल्लेख है।”
  • विधायिका की मंशा: कानून बनाने वालों ने जानबूझकर ‘सास-ससुर’ को इस सूची में शामिल नहीं किया है। इसलिए, बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
  • नैतिकता लागू नहीं: “नैतिक दायित्व, चाहे वह कितना भी अनिवार्य क्यों न लगे, वैधानिक आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।”

मामला क्या था? (The Background)

  • दलील: बुजुर्ग दंपत्ति का कहना था कि वे पूरी तरह से अपने इकलौते बेटे पर निर्भर थे। बेटे की मौत के बाद बहू को अनुकंपा (संभावित) और सेवा-निवृत्ति के सभी लाभ मिले।
  • स्थिति: बहू उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है और उसकी स्वतंत्र आय है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि 65 वर्ष से अधिक उम्र के सास-ससुर की देखभाल करना बहू का नैतिक कर्तव्य है, जिसे कानूनी माना जाना चाहिए।
  • पिछला फैसला: आगरा की फैमिली कोर्ट ने पिछले साल 21 अगस्त को उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसे उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट के निष्कर्ष (Key Findings)

  • अदालत ने याचिका खारिज करने के पीछे तकनीकी और कानूनी कारण बताए।
  • सारांश कार्यवाही (Summary Proceedings): भरण-पोषण की कार्यवाही में संपत्ति के उत्तराधिकार या अनुकंपा नियुक्ति जैसे जटिल मुद्दों पर विचार नहीं किया जा सकता।
  • कोई अवैधता नहीं: फैमिली कोर्ट का आदेश कानून के दायरे में था, इसलिए उसमें हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।

अगला कदम: क्या है दूसरा रास्ता?

  • बुजुर्ग दंपत्ति की वकील मोनिका पाल ने संकेत दिया है कि वे हार नहीं मानेंगे।
  • HAMA एक्ट का सहारा: अब वे ‘हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम’ (Hindu Adoption and Maintenance Act – HAMA) के तहत आगरा के जिलाधिकारी (DM) के पास आवेदन करेंगे।
  • कानूनी प्रावधान: HAMA की धारा 19 के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में एक विधवा बहू से उसके ससुर द्वारा भरण-पोषण की मांग की जा सकती है, बशर्ते ससुर के पास अपनी आय का साधन न हो और वह मृत बेटे की संपत्ति से हिस्सा पाने का हकदार हो।
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