मुख्य विवाद और याचिकाकर्ता के तर्क (Key Issues)
- 1961 के नियम बनाम वर्तमान में वकीलों की संख्या:याचिका में तर्क दिया गया कि 1961 में कानून बनाते समय 25 सदस्यों की सीमा तय की गई थी। परंतु अब अकेले दिल्ली बार काउंसिल (Bar Council of Delhi) में लगभग 2 लाख पंजीकृत अधिवक्ता हैं, जिसके लिए निर्वाचित संस्था में पर्याप्त और आनुपातिक प्रतिनिधित्व आवश्यक है।
- 30% महिला आरक्षण से उत्पन्न जटिलता:
- सुप्रीम कोर्ट ने योगमाया एमजी बनाम भारत संघ (8 दिसंबर 2025) मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए स्टेट बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30% आरक्षण लागू किया था।
- याचिकाकर्ता रोहित पांडे ने इस साल बार काउंसिल ऑफ दिल्ली का चुनाव लड़ा और उन्हें 2,259 वोट मिले, लेकिन वे 25वें स्थान से केवल 63.5 वोटों से चूक गए।
- 30% महिला कोटा पूरा करने के लिए केवल 265 वोट पाने वाली महिला उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित कर दिया गया। याचिकाकर्ता का तर्क है कि कुल 25 सीटों की सीमा में यह आरक्षण 1961 के अधिनियम के मूल वैधानिक ढांचे के विपरीत परिणाम दे रहा है।
- अनुच्छेद 142 (Article 142) की सीमाएं:वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने तर्क दिया कि कानून के स्पष्ट वैधानिक ढांचे को बदलने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग न्यायिक आदेश द्वारा नहीं किया जा सकता।
नई दिल्ली: देश भर की राज्य बार काउंसिलों (State Bar Councils – SBCs) में निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या, अधिवक्ताओं की तेजी से बढ़ती मतदाता संख्या के अनुपात में आनुपातिक प्रतिनिधित्व और महिलाओं के लिए लागू किए गए 30% आरक्षण के समायोजन पर देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार के शीर्ष विधि अधिकारी का रुख जानना चाहा है।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने दिल्ली बार काउंसिल (BCD) चुनाव लड़ने वाले अधिवक्ता रोहित पांडे द्वारा दायर रिट याचिका पर यह आदेश पारित किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि विधायी प्रावधानों में संशोधन एक नीतिगत निर्णय (Policy Decision) का विषय है, इसलिए अदालत अपनी सीमाओं को समझते हुए सीधे न्यायिक आदेश पारित करने के बजाय अटॉर्नी जनरल को इस पर विचार करने के लिए अधिकृत कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (1 अक्टूबर 2026) को भारत के महान्यायवादी (Attorney General) आर. वेंकटरमणी से अनुरोध किया कि वे अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 3(2)(b) के तहत राज्य बार काउंसिलों के सदस्यों की मौजूदा 25 की वैधानिक सीमा को बढ़ाने की मांग वाली याचिका पर नीतिगत रूप से विचार करें।
सुप्रीम कोर्ट का मौखिक अवलोकन: न्यायिक संयम का परिचय
सुनवाई के दौरान जब वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि 25 सीटों की सीमा वैधानिक है और महिला आरक्षण को समायोजित करने के लिए कुल सीटों में वृद्धि जरूरी है, तो न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने न्यायिक सीमाओं (Judicial Limitations) को रेखांकित करते हुए कहा: “हम अपनी न्यायिक सीमाओं से पूरी तरह अवगत हैं, और यही कारण है कि हम (सीधे आदेश पारित करने के बजाय) अटॉर्नी जनरल से इस पर विचार करने का अनुरोध कर रहे हैं। यदि महान्यायवादी (AG) इस पर कोई विपरीत दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो उसके बाद अदालत इस पर विचार करेगी।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि 2 सितंबर 2026 को महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल से जुड़े मामले में पारित किया गया आदेश—जिसके तहत याचिका को एक प्रत्यावेदन (Representation) मानकर राज्य बार काउंसिलों के परामर्श से निर्णय लेने का अनुरोध किया गया था—अखिल भारतीय स्तर (Pan-India) पर लागू होगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं याचिकाकर्ता की दलीलें
- 1961 के कानून बनाम 2026 की वास्तविकता:
- याचिकाकर्ता (अधिवक्ता रोहित पांडे) ने एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड (AoR) निखिल जैन के माध्यम से याचिका दायर कर दलील दी कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 3(2)(b) के तहत राज्य बार काउंसिल में निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम सीमा 25 उस समय तय की गई थी जब मतदाताओं (अधिवक्ताओं) की संख्या सीमित थी।
- वर्तमान में केवल दिल्ली बार काउंसिल (Bar Council of Delhi) में ही 2 लाख से अधिक पंजीकृत अधिवक्ता हैं। ऐसे विशाल मतदाता वर्ग का लोकतांत्रिक और प्रभावी प्रतिनिधित्व मात्र 25 सदस्यों द्वारा किया जाना अपर्याप्त और असंगत है।
- दिल्ली बार काउंसिल चुनाव और महिला आरक्षण का विवाद:
- याचिकाकर्ता रोहित पांडे ने इस वर्ष हुए दिल्ली बार काउंसिल के चुनावों में भाग लिया था और उन्हें 2,259 वोट प्राप्त हुए थे। वे 25 सदस्यों की सामान्य मेरिट सूची में स्थान बनाने से मात्र 63.5 मतों से चूक गए।
- हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य बार काउंसिलों में महिला अधिवक्ताओं के लिए लागू किए गए 30% आरक्षण के निर्देश के कारण एक कम रैंकिंग वाली महिला उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित कर दिया गया, जिन्होंने मात्र 265 वोट प्राप्त किए थे।
- याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि कानून के स्पष्ट प्रावधानों के विपरीत जाकर कम वोट पाने वाली उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित करना 1961 के अधिनियम की मूल लोकतांत्रिक योजना को प्रभावित करता है, और इस विसंगति का एकमात्र तार्किक समाधान बार काउंसिल की कुल सीटों की संख्या में वृद्धि करना है।
- अनुच्छेद 142 के उपयोग की सीमा पर वरिष्ठ अधिवक्ताओं के तर्क:
- वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह और अन्य वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय की असाधारण शक्तियों का उपयोग किसी ऐसे परिणाम के लिए नहीं किया जा सकता जो किसी प्राथमिक संसद निर्मित कानून (Statutory Scheme) के स्पष्ट प्रावधानों के विपरीत जाता हो। यदि महिलाओं को 30% प्रतिनिधित्व देना है, तो वैधानिक सीटों की संख्या का विस्तार किया जाना ही विधिक दृष्टि से उपयुक्त मार्ग है।
पूर्ववर्ती घटनाक्रम और पैन-इंडिया आदेश का संदर्भ
- योगमाया एम.जी. बनाम भारत संघ (8 दिसंबर 2025 का ऐतिहासिक निर्णय):
- सुप्रीम कोर्ट ने 8 दिसंबर 2025 को योगमाया एम.जी. बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए देश भर की सभी राज्य बार काउंसिलों में महिला अधिवक्ताओं के लिए 30% सीटों के आरक्षण को अनिवार्य किया था।
- 2 सितंबर 2026 का आदेश (महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल):
- बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा में सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग को लेकर दायर एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने माना था कि यह एक बड़ा नीतिगत मामला है।
- अदालत ने अटॉर्नी जनरल से अनुरोध किया था कि वे याचिका को एक औपचारिक प्रतिनिधित्व के रूप में लें और संबंधित राज्य बार काउंसिलों के साथ विमर्श करके उचित कदम उठाएं।
- तमिलनाडु बार काउंसिल मामला:
- इसके बाद तमिलनाडु बार काउंसिल में महिलाओं के 30% कोटे को समायोजित करने के लिए सीटें बढ़ाने की मांग उठी, जिस पर पीठ ने साफ कर दिया कि उसका 2 सितंबर का आदेश पूरे देश की बार काउंसिलों पर समान रूप से प्रभावी होगा।
विधिक एवं संवैधानिक सिद्धांत
- विधायी सीमा बनाम न्यायिक पुनर्लेखन:
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 3 संसद द्वारा पारित मूल कानून है। अदालतें विधि निर्माण या किसी अधिनियम में संशोधन का आदेश (Mandamus to Legislate) जारी नहीं कर सकतीं। इसलिए न्यायालय ने कार्यपालिका और विधायिका के समन्वय हेतु अटॉर्नी जनरल के माध्यम से नीतिगत निर्णय लेने का मार्ग चुना।
- आनुपातिक प्रतिनिधित्व और संस्थागत लोकतंत्र:
- कानूनी बिरादरी के तेजी से हो रहे विस्तार और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बीच विधिक नियामक संस्थाओं का आकार बढ़ाना समय की मांग माना जा रहा है, ताकि बार काउंसिलों में विविधता, समावेशिता और लोकतांत्रिक संतुलन बना रहे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: रोहित पांडे बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना
- आदेश की तिथि: 1 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) निखिल जैन
- केंद्र सरकार / विधिक सहायता: भारत के महान्यायवादी (AG) आर. वेंकटरमणी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961):
- धारा 3(2)(b) (राज्य बार काउंसिलों में अधिकतम 25 निर्वाचित सदस्यों की वैधानिक सीमा)
- धारा 4 एवं धारा 8 (बार काउंसिल का कार्यकाल और चुनाव प्रक्रिया)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 142 (सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण न्याय करने की असाधारण शक्ति एवं उसकी वैधानिक सीमाएं)
- अनुच्छेद 14 एवं 15(3) (समानता का अधिकार और महिलाओं के पक्ष में विशेष प्रावधान)
- अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार)
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961):
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- योगमाया एम.जी. बनाम भारत संघ (8 दिसंबर 2025, सुप्रीम कोर्ट) — ‘राज्य बार काउंसिलों में महिला अधिवक्ताओं के लिए 30% आरक्षण अनिवार्य।’
- प्रेम चंद गर्ग बनाम आबकारी आयुक्त (सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘अनुच्छेद 142 के तहत जारी आदेश किसी विशिष्ट विधायी वैधानिक निषेध या कानून के मूल ढांचे को दरकिनार नहीं कर सकते।’
- अंतिम निर्देश: याचिका को औपचारिक प्रत्यावेदन के रूप में मानते हुए अटॉर्नी जनरल को राज्य बार काउंसिलों की सीट संख्या बढ़ाने पर नीतिगत निर्णय लेने का अनुरोध; 2 सितंबर का समन्वय आदेश पूरे देश पर लागू।
State Bar Councils: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | अधिवक्ता रोहित पांडे (वकील निखिल जैन के माध्यम से) |
| संबंधित कानून | अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 3(2)(b) (Section 3(2)(b) of Advocates Act, 1961) |
| मुख्य मांग | मतदाताओं की बढ़ती संख्या और महिलाओं के 30% आरक्षण के कारण बार काउंसिलों की सदस्य संख्या (25) बढ़ाई जाए। |

