Friday, October 2, 2026
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Child Custody Case: स्कूल का लंच ही दिन का इकलौता खाना था…इस तरह घर की दहलीज पर लौटा बचपन, पढ़ें फैसला

Child Custody Case: केरल हाई कोर्ट ने एक 11 वर्षीय बच्चे के भविष्य पर बड़ा फैसला सुनाते हुए उसकी कस्टडी उसके जैविक पिता (Biological Father) को सौंप दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस राजा विजयराघवन वी. और जस्टिस के.वी. जयकुमार की बेंच ने एक पिता द्वारा दायर ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। बच्चा एक ऐसे हॉस्टल में रह रहा था जो मुख्य रूप से अनाथ बच्चों के लिए है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के जीवित होते हुए बच्चे को ‘अनाथालय’ (Orphanage) जैसे संस्थान में रखना उसके सर्वोत्तम हित में नहीं है।

मामला क्या था? (Background of Suffering)

  • पारिवारिक स्थिति: माता-पिता के अलग होने के बाद बच्चा कोझिकोड में अपनी मां और नानी के साथ रह रहा था।
  • लापरवाही के आरोप: पिता ने आरोप लगाया कि मां ने दूसरी शादी कर ली और बच्चे को उसकी बुजुर्ग नानी के पास छोड़ दिया। नानी खुद बीमार रहती थीं और काम पर जाने के कारण बच्चे का ध्यान नहीं रख पाती थीं।
  • बच्चे की आपबीती: कोर्ट को पता चला कि बच्चा अस्थमा (Asthma) से पीड़ित था, लेकिन उसे न तो सही इलाज मिल रहा था और न ही पर्याप्त खाना। बच्चे ने बताया कि उसे सुबह का नाश्ता तक नहीं मिलता था और स्कूल में मिलने वाला ‘मिड-डे मील’ ही उसका दिन का इकलौता भरपेट खाना होता था।

कोर्ट का दखल और “बेस्ट इंटरेस्ट” (Best Interest of Child)

  • हाई कोर्ट ने बच्चे और पिता से सीधे बात की और निम्नलिखित टिप्पणियां कीं।
  • अनाथालय अंतिम विकल्प नहीं: “बच्चे को ऐसे संस्थान में रखना जहाँ अनाथ बच्चे रहते हैं, उसके हित में नहीं माना जा सकता, खासकर जब पिता उसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार हो।”
  • भावनात्मक जुड़ाव: बच्चे ने स्पष्ट रूप से अपने पिता के साथ रहने की इच्छा जताई। कोर्ट ने नोट किया कि बच्चे का अपनी बुआ (पिता की बहन) के साथ भी गहरा भावनात्मक लगाव है, जो वर्तमान में विदेश (खाड़ी देश) में रहती हैं और बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाने को तैयार हैं।

शराब के सेवन का तर्क और सुरक्षा उपाय

  • चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसर की रिपोर्ट में उल्लेख था कि पिता शराब का सेवन करते हैं, जिससे बच्चे के भविष्य पर असर पड़ सकता है। कोर्ट ने इस चिंता को दूर करने के लिए कड़े सुरक्षा नियम बनाए।
  • नियमित निगरानी (Monitoring): जिला बाल संरक्षण अधिकारी (DCPU) को हर तीन हफ्ते में एक बार बच्चे के घर जाकर निरीक्षण करने का आदेश दिया गया है।
  • कठोर कार्रवाई: यदि कभी भी यह पाया गया कि बच्चे का कल्याण खतरे में है, तो अधिकारी तुरंत बाल कल्याण समिति (CWC) को सूचित करेंगे और बच्चा वापस लिया जा सकेगा।

मां और नानी की अनुपस्थिति

कोर्ट ने मां और नानी को नोटिस जारी किया था, लेकिन वे न तो खुद पेश हुईं और न ही अपना पक्ष रखने के लिए किसी वकील को भेजा। इसे देखते हुए कोर्ट ने बच्चे की स्वास्थ्य स्थिति और उसकी स्पष्ट इच्छा को प्राथमिकता दी।

निष्कर्ष: घर की दहलीज पर लौटा बचपन

यह फैसला रेखांकित करता है कि कानून की नजर में एक बच्चे के लिए परिवार का माहौल किसी भी सरकारी या निजी संस्थान से बेहतर है। केरल हाई कोर्ट ने सुनिश्चित किया कि बच्चे को न केवल उसके पिता का साथ मिले, बल्कि उसकी सेहत और पढ़ाई पर भी लगातार नजर रखी जाए।

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