Sunday, August 16, 2026
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Widow’s Rights: पति की मौत के बाद ससुर की जिम्मेदारी…वह बहू को भरण-पोषण दे, यह केस पति खो चुकी महिलाओं के लिए अहम

Widow’s Rights: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विधवा महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पति की मृत्यु के बाद भी एक महिला अपने ससुर से भरण-पोषण (Maintenance) प्राप्त करने की हकदार है।

हाईकोर्ट के जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की बेंच ने अकुल रस्तोगी द्वारा दायर एक अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने माना कि पति की अपनी पत्नी को बनाए रखने की जिम्मेदारी उसकी मृत्यु के बाद ससुर पर स्थानांतरित हो जाती है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विधवा महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पति की मृत्यु के बाद भी एक महिला अपने ससुर से भरण-पोषण (Maintenance) प्राप्त करने की हकदार है।

कोर्ट का मुख्य तर्क: अधिकार खत्म नहीं होता

  • अदालत ने हिंदू कानून के सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए कहा।
  • स्थापित सिद्धांत: “यह तय है कि पति अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य है। यह दायित्व पति की मृत्यु के बाद भी बना रहता है, जिससे विधवा अपने ससुर से भरण-पोषण का दावा कर सकती है।”
  • कानूनी आधार: कोर्ट ने हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA) के प्रावधानों का हवाला दिया।

भरण-पोषण के लिए शर्तें (Key Conditions)

कानून के अनुसार, एक विधवा बहू अपने ससुर से तभी मदद मांग सकती है जब स्वयं की असमर्थता हो यानि वह अपनी कमाई या संपत्ति से अपना गुजारा करने में पूरी तरह असमर्थ हो। वहीं विकल्पों की कमी हो, जिससे उसे अपने मृत पति की संपत्ति, अपने माता-पिता की संपत्ति या अपने बच्चों से कोई आर्थिक मदद न मिल रही हो। इसके अतिरिक्त उसके ससुर की क्षमता, मतलब ससुर के पास पैतृक या सह-दायिक (Coparcenary) संपत्ति हो, जिससे वह भरण-पोषण देने में सक्षम हो।

धारा 21 (viii) का महत्व

अधिनियम की धारा 21 (viii) विधवा बहू को ससुर की संपत्ति (Estate) से भरण-पोषण का दावा करने का दायरा प्रदान करती है। यह अधिकार तब तक बना रहता है जब तक कि महिला पुनर्विवाह (Remarriage) नहीं कर लेती।

फैसले का सामाजिक प्रभाव

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन महिलाओं के लिए एक सुरक्षा कवच है जो पति की मृत्यु के बाद बेसहारा हो जाती हैं। यह सुनिश्चित करता है कि संयुक्त हिंदू परिवार में बहू के अधिकारों की अनदेखी न की जा सके, बशर्ते परिवार के पास इसके लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हों।

निष्कर्ष: सम्मान के साथ जीने का हक

यह आदेश स्पष्ट करता है कि वैवाहिक संबंध केवल पति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी का हिस्सा हैं। ससुर का यह दायित्व कानूनी रूप से बाध्यकारी है ताकि समाज में विधवाओं को आर्थिक तंगी के कारण दर-दर न भटकना पड़े।

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