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POCSO Row: बच्चे की पहचान न होना, आरोपी के बचने का रास्ता नहीं… कहा- चाइल्ड पोर्नोग्राफी केस में सख्ती नहीं, प्रथम दृष्टया संतुष्टि ही काफी

POCSO Row: दिल्ली हाई कोर्ट ने चाइल्ड पोर्नोग्राफी (CSEM) से जुड़े मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी कानूनी व्यवस्था दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच ने सत्र अदालत (Sessions Court) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने आरोपियों को धारा 15(2) के तहत इस आधार पर बरी कर दिया था कि वीडियो में दिखने वाले बच्चों की उम्र साबित नहीं हो सकी।अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी वीडियो या फोटो में पीड़ित बच्चे की पहचान नहीं हो पा रही है या उसकी उम्र का कोई दस्तावेजी/मेडिकल सबूत नहीं है, तो केवल इस आधार पर आरोपी को बरी (Discharge) नहीं किया जा सकता।

मामला क्या था? (The CBI Probe)

  • आरोप: CBI ने आरोपियों के खिलाफ मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिए चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSEM) स्टोर करने और शेयर करने का मामला दर्ज किया था।
  • निचली अदालत का रुख: सेशन्स कोर्ट ने कहा कि चूंकि वीडियो में दिखने वाले बच्चे अज्ञात हैं और उनकी उम्र का कोई मेडिकल या दस्तावेजी प्रमाण (जैसे बर्थ सर्टिफिकेट) नहीं है, इसलिए POCSO एक्ट के तहत मामला नहीं बनता।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: “कानून का मकसद न भूलें”

  • हाई कोर्ट ने सेशन्स कोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए कुछ बुनियादी बातें स्पष्ट कीं।
  • पहचान का संकट: “अधिकांश मामलों में वीडियो में दिखने वाले बच्चे अज्ञात और अप्राप्य (Untraceable) होते हैं। यदि हम उम्र के पुख्ता सबूत पर अड़ गए, तो POCSO की धारा 15 निष्प्रभावी हो जाएगी और आरोपी आसानी से बच निकलेंगे।”
  • बच्चों पर खतरा: कोर्ट ने कहा कि इससे उन अनगिनत बच्चों को असुरक्षित छोड़ दिया जाएगा, जिन्हें शायद यह भी नहीं पता कि उनके आपत्तिजनक वीडियो ऑनलाइन सर्कुलेट हो रहे हैं।

‘Subjective Satisfaction’ का टेस्ट (The New Standard)

  • अदालत ने उम्र निर्धारण के लिए एक नया और व्यावहारिक पैमाना (Test) बताया।
  • दिखने में बच्चा (Appear to depict a child): POCSO एक्ट की धारा 2(1)(da) में ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ की परिभाषा में स्पष्ट है कि यदि कोई व्यक्ति दिखने में बच्चा (18 साल से कम) लग रहा है, तो वह कानून के दायरे में आएगा।
  • सामान्य विवेक: कोर्ट को केवल ‘प्रथम दृष्टया व्यक्तिपरक संतुष्टि’ (Prima Facie Subjective Satisfaction) की आवश्यकता है। यानी एक साधारण समझदार व्यक्ति की नजर में यदि वीडियो में दिखने वाला व्यक्ति बच्चा लग रहा है, तो वह पर्याप्त है।
  • विशेषज्ञ राय: जांच के दौरान विशेषज्ञों ने विकासात्मक विशेषताओं (Developmental Characteristics) के आधार पर कहा था कि वीडियो में दिखने वाले लोग 18 साल से कम के हैं। कोर्ट ने कहा कि चार्ज फ्रेम करने के लिए यह सबूत काफी है।

फैसले के मुख्य कानूनी बिंदु (Key Legal Takeaways)

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 34 (POCSO) और धारा 94 (JJ Act) यानि उम्र साबित करने के ये कड़े नियम केवल तब लागू होते हैं जब पीड़ित सामने हो और पहचाना जा सके।
  • CSEM के मामले अलग हैं: यहाँ पीड़ित अज्ञात होते हैं, इसलिए कड़े दस्तावेजी प्रमाण की मांग करना विधायी मंशा (Legislative Intent) के खिलाफ है।
  • IT एक्ट के साथ जुड़ाव: यह मामला IT एक्ट की धारा 67B और IPC 120B के साथ मिलकर चलना चाहिए।

निष्कर्ष: सुरक्षा का कवच हुआ मजबूत

दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले से अब उन अपराधियों पर नकेल कसना आसान होगा जो विदेशी या अज्ञात बच्चों के वीडियो शेयर कर इस तकनीकी कमी का फायदा उठाते थे कि “उम्र साबित नहीं हो सकती”। कोर्ट ने सेशन्स कोर्ट को आदेश दिया है कि वह आरोपियों पर तुरंत आरोप तय (Frame Charges) करे और मुकदमे को आगे बढ़ाए।

IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
CORAM: HON’BLE DR. JUSTICE SWARANA KANTA SHARMA
CRL.REV.P. 691/2024
COURT ON ITS OWN MOTION
Versus
STATE AND ORS.

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