Wednesday, October 28, 2026
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Bail Order: जमानत की शर्तें बदलने पर रोक नहीं…CrPC की धारा 362 का रोड़ा क्यों हटाया; जानिए 12 साल बाद ₹64 लाख फिक्स्ड डिपॉजिट का केस

Bail Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालतों द्वारा जमानत देते वक्त लगाई जाने वाली अव्यावहारिक और दमनकारी शर्तों पर एक बड़ा नजीर बनने वाला विधिक सिद्धांत स्पष्ट किया है।

जमानत देने का आदेश एक अंतरिम या अंतर्वर्ती आदेश होता है: अदालत

हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने 77 वर्ष के एक बुजुर्ग याचिकाकर्ता को बड़ी राहत देते हुए 12 साल पुराने (दिसंबर 2013) जमानत आदेश में शामिल ₹64,00,000 जमा करने की ‘अत्यधिक दमनकारी’ (Onerous) शर्त को पूरी तरह से रद्द (Revoke) कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने बैंक को आदेश दिया है कि वह ब्याज सहित यह रकम बुजुर्ग को वापस करे। कहा, जमानत (Bail) देने का आदेश एक अंतरिम या अंतर्वर्ती आदेश (Interlocutory Order) होता है, न कि किसी मुकदमे का अंतिम फैसला या निर्णय (Judgment)। इसलिए, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 362 के तहत आने वाली यह कानूनी रोक कि अदालतें अपने फैसले को बदल या उसकी समीक्षा नहीं कर सकतीं, जमानत की शर्तों में संशोधन करने या उन्हें शिथिल (Relax) करने पर बिल्कुल भी लागू नहीं होती। अदालतें जनहित और न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) का इस्तेमाल कर सकती हैं।”

मामला क्या है?: 25 लाख के कथित नुकसान पर 64 लाख की ‘जमानत शर्त’

यह कानूनी विवाद साल 2011 से जुड़े एक कथित घोटाले और उसके बाद थोपी गई भारी-भरकम जमानत शर्त से जुड़ा है।

सीबीआई का मुकदमा: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने 2011 में एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी। आरोप था कि वाराणसी एयरपोर्ट के एप्रन विस्तार परियोजना के दौरान ‘मेसर्स ब्राइट अराकोन’ नामक कंपनी ने सीमेंट सप्लाई के बढ़े हुए बिल पेश किए, जिससे सरकारी खजाने को ₹25,74,065 का नुकसान हुआ।

याचिकाकर्ता की स्थिति: बुजुर्ग याचिकाकर्ता का नाम मूल एफआईआर में नहीं था, लेकिन बाद में उन्हें एक सहयोगी कंपनी (M/s B. R. Arora Private Limited) का निदेशक होने के नाते चार्जशीट में शामिल कर लिया गया।

अव्यावहारिक शर्त (2013): दिसंबर 2013 में हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत तो दे दी, लेकिन एक कड़ी शर्त लगा दी कि उन्हें रिहाई के बदले एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) के पक्ष में ₹64 लाख का फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) एक राष्ट्रीयकृत बैंक में जमा करना होगा, जिसे ट्रायल खत्म होने तक रिन्यू कराना होगा। यानी कथित नुकसान (25 लाख) से दोगुनी से ज्यादा रकम (64 लाख) जमानत की शर्त के रूप में ब्लॉक कर दी गई।

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बदला हुआ घटनाक्रम: जब केस ही ठंडे बस्ते में चला गया

समय बीतने के साथ इस मामले के कानूनी समीकरण पूरी तरह बदल गए।

धाराएं घटीं: ट्रायल कोर्ट ने बुजुर्ग को अन्य सभी गंभीर आरोपों से मुक्त (Discharge) कर दिया, जिससे उनके खिलाफ केवल आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी) का एक अकेला आरोप बचा।

सह-आरोपियों का बचना: इस मामले में शामिल सरकारी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी (Prosecution Sanction) को हाई कोर्ट ने 2021 में रद्द कर दिया था, और सुप्रीम कोर्ट ने भी अक्टूबर 2024 में उस फैसले को बरकरार रखा।

ट्रायल बंद: सह-आरोपियों के हटने के कारण ट्रायल कोर्ट ने इस मामले की कार्यवाही को ‘अगले आदेश तक’ के लिए बंद कर दिया और रिकॉर्ड को फाइल रूम (Consigned) भेज दिया। यानी निकट भविष्य में इस ट्रायल के शुरू होने या खत्म होने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची।

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सीबीआई (CBI) का तकनीकी अड़ंगा और हाई कोर्ट का विधिक जवाब

बुजुर्ग याचिकाकर्ता ने जब धारा 482 CrPC के तहत अपनी ₹64 लाख की एफडी वापस पाने के लिए कोर्ट का रुख किया, तो सीबीआई ने तकनीकी आपत्ति उठाई। सीबीआई का तर्क था कि CrPC की धारा 362 के तहत एक बार आदेश पर हस्ताक्षर होने के बाद अदालत ‘फंक्टस ऑफिशियल’ (Functus Officio/ अधिकार विहीन) हो जाती है और लिपिकीय या गणितीय त्रुटियों को छोड़कर अपने ही आदेश की समीक्षा या बदलाव नहीं कर सकती। सीबीआई ने इसके लिए 2022 के अपर्णा पुरोहित बनाम यूपी राज्य के एक फैसले का भी हवाला दिया।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने सीबीआई के इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए देश की न्यायशास्त्र व्यवस्था को स्पष्ट किया कि

‘अपर्णा पुरोहित’ का फैसला ‘पर इनक्यूरियम’ (Per Incuriam) है

हाई कोर्ट ने कहा कि सीबीआई जिस फैसले पर भरोसा कर रही है, वह कानूनन गलत (Per Incuriam) है क्योंकि उसने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित नजीरों को नजरअंदाज किया। कोर्ट ने सर्वोच्च अदालत के अमर नाथ (1977), वीसी शुक्ला (1979) और विशेषकर रामधार साहू बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2023) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि बदली हुई परिस्थितियों के आधार पर जमानत की शर्तों को बदलने या संशोधित करने में धारा 362 की कोई रुकावट आड़े नहीं आती।

रिकवरी का जरिया नहीं हैं आपराधिक अदालतें

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के सुमित मेहता (2013) और गजानन दत्तात्रय गोरे (2025) मामलों का संदर्भ लेते हुए दोहराया कि “आपराधिक कार्यवाहियों और जमानत की शर्तों का इस्तेमाल किसी विभाग या एजेंसी द्वारा अपने विवादित बकाये की वसूली (Realisation of dues) के लिए एक शॉर्टकट के रूप में नहीं किया जा सकता।” हाई कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई कि बिना याचिकाकर्ता का दोष सिद्ध हुए या उसकी संलिप्तता पर प्रथम दृष्टया संतुष्टि दर्ज किए बिना इतनी भारी राशि ब्लॉक रखना पूरी तरह से अनुचित और दमनकारी था।

हाई कोर्ट की संवैधानिक शक्तियां

अदालत ने याद दिलाया कि न्याय सुनिश्चित करने की उसकी अंतर्निहित शक्तियां केवल CrPC की धारा 482 से नहीं आतीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत एक ‘सुपीरियर कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड’ होने के नाते स्वतः ही उसे प्राप्त हैं।

अदालत का अंतिम निर्देश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माना कि एक 77 साल के बुजुर्ग को बिना किसी प्रगति वाले ट्रायल के कारण उनके खुद के पैसे से इतने लंबे समय तक वंचित रखना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। अदालत ने तत्काल प्रभाव से जमानत की उस ₹64 लाख की जमा शर्त को निरस्त (Revoke) कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि बैंक में जमा की गई ₹64,00,000 की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की मूल राशि को उस पर अब तक अर्जित हुए पूरे ब्याज (Accrued Interest) के साथ 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को वापस लौटाया जाए।

केस शीट: इलाहाबाद उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निष्कर्ष
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस सुभाष विद्यार्थी (एकल पीठ)
याचिकाकर्ता77 वर्षीय बुजुर्ग (पूर्व निदेशक, कंस्ट्रक्शन फर्म)
मुख्य कानूनी सिद्धांतजमानत आदेश एक अंतर्वर्ती (Interlocutory) आदेश है, अतः धारा 362 की रोक इस पर लागू नहीं होती।
विवादास्पद शर्त (2013)₹64,00,000 का फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) जमा करने की शर्त।
अदालत का अंतिम आदेशशर्त पूरी तरह रद्द; 30 दिनों के भीतर ब्याज सहित पूरी रकम रिहा करने का निर्देश।
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