Monday, August 24, 2026
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Sabarimala Row in SC: सबरीमाला का मामला आस्था से जुड़ा, कोर्ट इसमें दखल न दे…केंद्र ने 2018 के ‘छुआछूत’ वाले तर्क पर जताई कड़ी आपत्ति

Sabarimala Row in SC: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ के सामने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े विवाद पर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की बेंच ने विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश कीं। केंद्र सरकार ने इस मामले में अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध धार्मिक विश्वास और संप्रदाय की स्वायत्तता का मामला है, जो न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर होना चाहिए। इस मामले की विस्तृत सुनवाई अभी जारी रहेगी।

“आस्था को विज्ञान की कसौटी पर नहीं कस सकते”

  • सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि धार्मिक ग्रंथों और प्रथाओं को समझना केवल आध्यात्मिक स्तर पर ही संभव है।
  • न्यायिक समीक्षा की सीमा: “क्या आवश्यक धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) है और क्या नहीं, यह तय करने के लिए अदालत को धार्मिक ग्रंथों की समीक्षा करनी होगी, जो कि उचित नहीं है।”
  • विधायिका का कार्य: उन्होंने कहा कि यदि कुछ ‘अवैज्ञानिक’ है, तो उसका समाधान विधायिका के पास है, अदालतों के पास नहीं। हालांकि, कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि कोई सामाजिक बुराई धार्मिक प्रथा के नाम पर चल रही है, तो कोर्ट उसकी जांच कर सकता है।

छुआछूत (Article 17) के तर्क पर विवाद

  • 2018 के फैसले में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक को ‘अस्पृश्यता’ (Untouchability) का एक रूप बताया था। केंद्र ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई।
  • सॉलिसिटर जनरल: “सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होना छुआछूत नहीं है। यह केवल एक विशिष्ट आयु वर्ग (10-50 वर्ष) तक सीमित है। देश और दुनिया के अन्य सभी अय्यप्पा मंदिर महिलाओं के लिए खुले हैं।”
  • जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी: बेंच में शामिल जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “एक महिला को महीने में तीन दिन अछूत नहीं माना जा सकता और चौथे दिन वह अछूत नहीं रहती। अनुच्छेद 17 (छुआछूत का अंत) के संदर्भ में इस पर विचार करना जरूरी है।”

पितृसत्ता के आरोपों को नकारा

  • केंद्र ने अदालत में कहा कि भारतीय समाज हमेशा से महिलाओं को उच्च स्थान देता रहा है।
  • नारी शक्ति का सम्मान: “हम शायद इकलौता समाज हैं जो महिलाओं की पूजा करते हैं। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के जज तक, हम महिला देवी-देवताओं के आगे झुकते हैं। इसलिए इस बहस में ‘पितृसत्ता’ (Patriarchy) जैसे शब्दों को नहीं लाना चाहिए।”

Key Legal Questions before the 9-Judge Bench

मुख्य बिंदुविवरण
अनुच्छेद 25क्या धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्तिगत अधिकारों से बड़ा है?
आवश्यक धार्मिक प्रथाकौन तय करेगा कि किसी धर्म के लिए ‘अनिवार्य’ क्या है?
सार्वजनिक व्यवस्थाक्या धार्मिक प्रथाएं नैतिकता और स्वास्थ्य के मानकों पर खरी उतरती हैं?
समीक्षा का दायराक्या कोर्ट किसी संप्रदाय की आंतरिक परंपराओं में हस्तक्षेप कर सकता है?

मामले का भविष्य

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह अभी 2018 के सबरीमाला फैसले के गुण-दोष (Merits) पर नहीं जाएगा, बल्कि उन 7 बड़े संवैधानिक सवालों पर विचार करेगा जो इस मामले से निकले हैं। ये सवाल केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे व्यापक मुद्दों को भी प्रभावित करेंगे।

निष्कर्ष: आस्था और संविधान के बीच संतुलन

यह सुनवाई केरल विधानसभा चुनावों के पास होने के कारण राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार का मानना है कि सबरीमाला एक ‘सुई जेनेरिस’ (Sui Generis – अपने आप में अनूठा) मामला है और इसे सामान्य पितृसत्तात्मक ढांचे के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

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