GainBitcoin Scam: दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने करोड़ों रुपये के ‘गैन बिटकॉइन’ (GainBitcoin) क्रिप्टोकरेंसी घोटाले में IIT कानपुर के पूर्व छात्र और डार्विन लैब्स के सह-संस्थापक आयुष वार्ष्णेय को जमानत दे दी है।
सीबीआई (CBI) ने 10 मार्च को आयुष वार्ष्णेय को गिरफ्तार किया था। उन्हें इस घोटाले का “टेक्निकल ब्रेन” कहा गया था, लेकिन अदालत ने सबूतों की कमी और जांच में उनके सहयोग को देखते हुए राहत प्रदान की। अदालत ने माना कि जमानत का उद्देश्य सजा देना नहीं, बल्कि मुकदमे के दौरान आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करना है।
क्या है ‘गैन बिटकॉइन’ पोंजी स्कीम?
- धोखाधड़ी का तरीका: मुख्य आरोपी (दिवंगत) अमित भारद्वाज की कंपनी ‘Variabletech Pte Ltd’ ने निवेशकों को बिटकॉइन में 10% मासिक रिटर्न का लालच दिया।
- MCAP टोकन का खेल: जब निवेशकों को पैसे लौटाने की बारी आई, तो उन्हें बिटकॉइन के बदले ‘MCAP टोकन’ थमा दिए गए। जांच में इन टोकन को “बेकार” (Worthless) पाया गया, जिन्हें केवल निवेशकों को ठगने के लिए लॉन्च किया गया था।
- प्रचार: 2017 में राष्ट्रीय समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर बड़े विज्ञापन देकर लोगों को इस स्कीम में फंसाया गया।
कौन हैं आयुष वार्ष्णेय?
- आयुष वार्ष्णेय की पहचान एक बेहद मेधावी छात्र और सफल उद्यमी के रूप में रही है।
- शिक्षा: 2014 में IIT कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक। वे साइंस और साइबर ओलंपियाड के ऑल इंडिया टॉपर भी रह चुके हैं।
- उपलब्धियां: 2018 में उन्हें ‘फोर्ब्स 30 अंडर 30’ (Forbes 30 Under 30) की प्रतिष्ठित सूची में शामिल किया गया था।
- करियर: वे ‘Nash Ventures’, ‘Testbook’ और ‘Grexa AI’ जैसे कई स्टार्टअप्स से जुड़े रहे हैं।
कोर्ट में चली कानूनी जिरह
- CBI की दलील (जमानत का विरोध): आयुष इस घोटाले के पीछे का “तकनीकी दिमाग” थे। उन्होंने ही MCAP टोकन और माइनिंग पूल सॉफ्टवेयर बनाया।
वह तकनीकी रूप से इतने सक्षम हैं कि डिजिटल सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं। उन्होंने सह-आरोपियों और ठगी गई क्रिप्टोकरेंसी के ठिकाने के बारे में जानकारी छिपाकर जांच में सहयोग नहीं किया। - आयुष वार्ष्णेय का पक्ष (एडवोकेट ध्रुव गुप्ता): आयुष की भूमिका केवल अमित भारद्वाज (जिसकी 2022 में मृत्यु हो गई) के लिए ‘G B Miners’ सॉफ्टवेयर विकसित करने तक सीमित थी। वे ईडी (ED) की जांच में 5 बार शामिल हुए और कभी भागने की कोशिश नहीं की।
अदालत के मुख्य निष्कर्ष (Court’s Observations)
- अदालत ने आयुष वार्ष्णेय को जमानत देते हुए कड़े तर्क दिए।
- पर्याप्त समय: “अगर आरोपी को सबूत मिटाने होते, तो उसके पास गिरफ्तारी से पहले 9 साल का लंबा समय था।”
- सहयोग: आरोपी ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में हिस्सा लिया था, जिससे पता चलता है कि उसका भागने का कोई इरादा नहीं था।
- पुरानी गतिविधियाँ: रिकॉर्ड बताते हैं कि अमित भारद्वाज, आयुष द्वारा सॉफ्टवेयर बनाने से पहले (2016 से पहले) भी बिटकॉइन ट्रेडिंग और निवेश का काम कर रहे थे।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| विषय | अदालत का रुख |
| जमानत का आधार | देरी से गिरफ्तारी, सबूतों की कमी और जांच में सहयोग। |
| जमानत का उद्देश्य | यह दंडात्मक (Punitive) नहीं, बल्कि केवल कोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए है। |
| CBI का दावा | आरोपी “टेक्निकल मास्टरमाइंड” है; डिजिटल सबूत मिटा सकता है। |
| नतीजा | जमानत मंजूर; ट्रायल का सामना करेंगे। |
निष्कर्ष: मेधावी छात्र बनाम गंभीर आरोप
यह मामला एक मेधावी इंजीनियर के करियर और उस पर लगे गंभीर वित्तीय अपराध के आरोपों के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध की गंभीरता अपनी जगह है, लेकिन बिना ठोस सबूत के किसी व्यक्ति को जेल में बंद रखना न्यायसंगत नहीं है, खासकर जब उसने जांच में सहयोग दिखाया हो।

