Pension Ruling: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और संवैधानिक स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि ‘असाधारण पेंशन’ (Extraordinary Pension) प्रदान करना राज्यपाल का विवेकाधीन अधिकार (Discretionary Power) है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने स्पष्ट किया कि जब तक राज्यपाल ने किसी मामले की जांच कर अपनी सहमति नहीं दी है, तब तक अदालत अपनी ओर से पेंशन देने का आदेश (Writ of Mandamus) जारी नहीं कर सकती। अदालत ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें राज्य सरकार को एक दिवंगत डॉक्टर की पत्नी को यह पेंशन देने का निर्देश दिया गया था।
मामला क्या था? (The Background)
- घटना: साल 2016 में उत्तराखंड के जसपुर में एक बाल रोग विशेषज्ञ (Paediatrician) की ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो गई थी।
- विवाद: उनकी विधवा ने उत्तर प्रदेश सिविल सेवा (असाधारण पेंशन) नियमावली, 1981 (जिसे उत्तराखंड ने अपनाया है) के तहत पेंशन की मांग की।
- हाई कोर्ट का स्टैंड: 2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की देरी पर नाराजगी जताई थी और लगभग ₹1.99 करोड़ का मुआवजा और असाधारण पेंशन देने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट ने माना था कि डॉक्टर की मौत “जोखिम भरी” ड्यूटी के दौरान हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण (Discretionary Power)
- नियम 4 की अनिवार्यता: 1981 के नियमों के तहत, असाधारण पेंशन केवल राज्यपाल की मंजूरी (Sanction of the Governor) के बाद ही दी जा सकती है।
- क्षेत्राधिकार का उल्लंघन: कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने राज्यपाल को इस मामले में अपने विवेक का उपयोग करने का अवसर दिए बिना ही सीधे फैसला सुना दिया, जो कि “अनुचित” है।
- अदालत की सीमा: यदि किसी प्राधिकारी (Authority) को प्रशासनिक निर्णय लेने की शक्ति दी गई है, तो कोर्ट उसकी जगह खुद फैसला नहीं ले सकता। कोर्ट केवल तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब प्राधिकारी ने निर्णय लेने से मना कर दिया हो या निर्णय पूरी तरह मनमाना (Arbitrary) हो।
जोखिम भरे पद (Posts of Risk) का सवाल
राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि डॉक्टर का पेशा नियमों में परिभाषित “जोखिम भरे पदों” की श्रेणी में नहीं आता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन सभी पहलुओं की जांच पहले राज्यपाल या संबंधित सक्षम अधिकारी को करनी चाहिए, न कि सीधे अदालत को।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| विषय | सुप्रीम कोर्ट का आदेश / निष्कर्ष |
| मुख्य आदेश | उत्तराखंड हाई कोर्ट का फैसला रद्द। |
| राज्यपाल की भूमिका | असाधारण पेंशन देना राज्यपाल का प्रशासनिक और विवेकाधीन अधिकार है। |
| पीड़ित को राहत | डॉक्टर की पत्नी को 4 सप्ताह के भीतर राज्यपाल को नए सिरे से आवेदन करने की छूट दी गई है। |
| समय सीमा | सक्षम प्राधिकारी को आवेदन मिलने के 12 सप्ताह के भीतर इस पर निर्णय लेना होगा। |
संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कार्यपालिका (Executive) और न्यायपालिका (Judiciary) के बीच शक्तियों के संतुलन को रेखांकित करता है। अदालत ने साफ कर दिया कि मानवीय आधार पर सहानुभूति अपनी जगह है, लेकिन पेंशन जैसे वित्तीय और प्रशासनिक लाभ केवल स्थापित नियमों और सक्षम संवैधानिक प्राधिकारी (राज्यपाल) की मंजूरी के बाद ही दिए जा सकते हैं।

