DHCBA Strike: दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) ने दिल्ली हाई कोर्ट के ही फुल कोर्ट (Full Court) फैसले को अदालत में चुनौती दी है।
तत्काल सुनवाई के लिए मेंशन किया
DHCBA के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने इस याचिका को दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ (Division Bench) के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए मेंशन (उल्लेख) किया। पीठ ने इस मामले को 26 मई 2026 को सूचीबद्ध (List) करने पर सहमति जताई है। दरअसल, फुल कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी में जिला अदालतों (District Courts) के आर्थिक क्षेत्राधिकार (Pecuniary Jurisdiction) को ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़ करने के प्रस्ताव की समीक्षा के लिए न्यायाधीशों की एक समिति का गठन किया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि (Background)
मई 2025 का पत्र: दिल्ली की सभी जिला अदालत बार एसोसिएशनों की समन्वय समिति (Coordination Committee) ने केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और विधि आयोग (Law Commission) के सदस्यों को पत्र लिखकर जिला अदालतों के आर्थिक क्षेत्राधिकार को मौजूदा ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़ करने का अनुरोध किया था।
हाई कोर्ट का फैसला: इस पत्र का संज्ञान लेते हुए 2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट की फुल कोर्ट बैठक बुलाई गई, जिसमें हितधारकों (Stakeholders) से बातचीत कर सिफारिशें सौंपने के लिए जजों की एक समिति का गठन किया गया।
समिति के सदस्य: वर्तमान में इस न्यायाधीशों की समिति में जस्टिस वी. कामेश्वर राव, जस्टिस एन. डब्ल्यू. सांब्रे, जस्टिस दिनेश मेहता, जस्टिस विवेक चौधरी, जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस नवीन चावला शामिल हैं।
DHCBA के विरोध और कानूनी चुनौती का आधार
यह है विरोध: दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) इस आर्थिक क्षेत्राधिकार को बढ़ाने और इसके लिए बनी कमेटी दोनों का कड़ा विरोध कर रही है।
अधिकार क्षेत्र से बाहर का संज्ञान: DHCBA का तर्क है कि जिला अदालतों की समन्वय समिति ने यह पत्र केंद्रीय कानून मंत्रालय को संबोधित करके लिखा था, न कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को।
मंत्रालय की ओर से कोई पहल नहीं: याचिका में रेखांकित किया गया है कि केंद्रीय कानून मंत्रालय ने इस संबंध में न तो हाई कोर्ट से कोई टिप्पणी (Comments) मांगी थी और न ही खुद ऐसी कोई प्रक्रिया शुरू की थी। इसके बावजूद हाई कोर्ट की फुल कोर्ट ने स्वतः आगे बढ़कर इस पत्र पर संज्ञान ले लिया।
कारणों का अभाव: बार एसोसिएशन ने अपनी याचिका में कहा है कि हाई कोर्ट द्वारा इस न्यायाधीशों की समिति का गठन करने के पीछे कोई ठोस या स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| सुनवाई करने वाली पीठ | चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया |
| याचिकाकर्ता | दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) |
| मुख्य विवाद | जिला अदालतों का आर्थिक क्षेत्राधिकार ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़ करने का प्रस्ताव। |
| चुनौती का आधार | हाई कोर्ट द्वारा कानून मंत्रालय को लिखे गए पत्र पर बिना किसी प्रशासनिक संदर्भ के स्वतः संज्ञान लेकर कमेटी बनाना। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह कानूनी विवाद दिल्ली में उच्च न्यायालय (High Court) और जिला न्यायालयों (District Courts) के वकीलों के बीच कार्यक्षेत्र और मुकदमों के बंटवारे (Distribution of Litigation) को लेकर होने वाले पुराने वैचारिक टकराव का हिस्सा है। आर्थिक क्षेत्राधिकार बढ़ने से कई बड़े कमर्शियल और दीवानी मामले सीधे जिला अदालतों में ट्रांसफर हो जाएंगे, जिसका हाई कोर्ट के वकील विरोध कर रहे हैं, जबकि जिला अदालतों के वकील इसके पक्ष में हैं। अब इस पर खुद हाई कोर्ट की खंडपीठ को विधिक फैसला सुनाना है।

