Friday, July 10, 2026
HomeLaw Firms & Assoc.Professional Misconduct: वकील के खिलाफ पेशेवर कदाचार…पुलिस नहीं करेगी जांच, यह शक्ति...

Professional Misconduct: वकील के खिलाफ पेशेवर कदाचार…पुलिस नहीं करेगी जांच, यह शक्ति सिर्फ बार काउंसिल के पास, अधिवकतागण जान लें

Professional Misconduct: बॉम्बे हाई कोर्ट ने वकीलों के पेशेवर आचरण और पुलिस के जांच अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा कानूनी फैसला सुनाया है।

अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज कई प्राथमिकी का मामला

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और जस्टिस सुमन श्याम की खंडपीठ ने एक अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज कई प्राथमिकियों (FIRs) को रद्द करते हुए यह व्यवस्था दी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी वकील के खिलाफ पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) के आरोपों की जांच करने का अधिकार पुलिस के पास नहीं है। यह शक्ति कानूनी रूप से विशेष रूप से केवल बार काउंसिल (Bar Council) में निहित है।

हाई कोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियां (Key Legal Observations)

बार काउंसिल का विशेष क्षेत्राधिकार: अदालत ने एडवोकेट्स एक्ट के तहत बार काउंसिल की स्वायत्तता को रेखांकित करते हुए कहा, बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा ही वह एकमात्र संस्था है जो अपने पास पंजीकृत वकीलों के खिलाफ कदाचार के मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Proceeding) शुरू करने के लिए अधिकृत है। किसी निजी शिकायतकर्ता के कहने पर पुलिस जांच के दौरान कदाचार के ऐसे आरोपों की समीक्षा नहीं कर सकती। अदालत ने आगे जोड़ा कि पुलिस द्वारा ऐसे मामलों में की जाने वाली कोई भी जांच या पूछताछ सीधे तौर पर बार काउंसिल की वैधानिक शक्तियों का अतिक्रमण (Invasion) मानी जाएगी, जिसकी कानूनन अनुमति नहीं है।

आधिकारिक कार्यों की वैधता का सिद्धांत: शिकायतकर्ता का मुख्य आरोप था कि संबंधित वकील ने कथित तौर पर फर्जी या गैर-मौजूद नियुक्ति आदेशों के आधार पर अदालतों में ‘विशेष लोक अभियोजक’ (Special Public Prosecutor – SPP) के रूप में उपस्थिति दर्ज कराई थी। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 114 (इलास्ट्रेशन e) और कानूनी सिद्धांत ‘omnia praesumuntur rite esse acta’ (सभी आधिकारिक कार्य सही ढंग से किए गए माने जाते हैं) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की सिफारिशें और अधिसूचनाएं उनकी नियुक्ति को वैध साबित करती हैं।

Also Read; Bombay HC: जेलों में भीड़ ज्यादा, ट्रायल में लग रहा लंबा वक्त, जमानत नियम है, इनकार अपवाद…यह रही कोर्ट की टिप्पणी

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद (Case Background)

विवाद की जड़: शिकायतकर्ता और कुछ व्यवसायियों व पुलिस अधिकारियों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। अधिवक्ता शेखर जगताप इस मामले में विशेष लोक अभियोजक (SPP) के रूप में पेश हो रहे थे।

आरोप: शिकायतकर्ता को उन मामलों में प्रतिकूल अदालती आदेशों का सामना करना पड़ा था। इसके बाद उसने बदला लेने की भावना से वकील, पुलिस अधिकारियों और कुछ निजी व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, प्रतिरूपण (Impersonation) और डराने-धमकाने के आरोपों के तहत ठाणे नगर और कोलाबा पुलिस स्टेशनों में दो एफआईआर (CR No. 742/2024 और 46/2024) दर्ज करा दीं।

वकील का पक्ष: आरोपी पक्ष ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर दलील दी कि ये एफआईआर पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण, व्यक्तिगत विद्वेष से प्रेरित हैं और इनमें किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का खुलासा नहीं होता।

अदालत का अंतिम निर्णय (Conclusion)

पूरी तरह निरस्त: हाई कोर्ट ने सभी एफआईआर और आपराधिक कार्यवाहियों को पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर दिया। अदालत ने इस निर्णय के पीछे निम्नलिखित मुख्य आधार बताए।

दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधी आचरण: अदालत ने माना कि ये शिकायतें एक “हताश और प्रतिशोधी दिमाग” का नतीजा हैं। शिकायतकर्ता केवल इसलिए आपराधिक जांच की मांग कर रहा था क्योंकि वह वकील के कानूनी तर्कों और अदालती फैसलों से असंतुष्ट था। किसी पब्लिक प्रोसिक्यूटर की कानूनी राय या कामकाज को आपराधिक जांच का आधार नहीं बनाया जा सकता।

देरी से दर्ज एफआईआर: जिन घटनाओं का जिक्र शिकायत में किया गया था, वे लगभग तीन साल पुरानी थीं और एफआईआर दर्ज कराने में हुई अत्यधिक देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था।

भजन लाल केस का हवाला: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल (1992) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब कोई आपराधिक कार्यवाही स्पष्ट रूप से दुर्भावना से प्रेरित हो और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करती हो, तो उसे जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी बिंदुबॉम्बे हाई कोर्ट का निर्णय
सुनवाई करने वाली पीठमुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और जस्टिस सुमन श्याम
केंद्रीय कानूनी सिद्धांतवकीलों के पेशेवर आचरण की जांच का विशेष अधिकार केवल बार काउंसिल के पास है।
विशेष लोक अभियोजक (SPP)किसी एसपीपी की नियुक्ति की वैधता की जांच रिट क्षेत्राधिकार के तहत संवैधानिक अदालत कर सकती है, पुलिस एफआईआर के जरिए नहीं।
अंतिम आदेशएफआईआर रद्द (Quashed); वकील के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाहियां समाप्त।

निष्कर्ष (Takeaway)

यह फैसला वकीलों की पेशेवर स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा सुरक्षा कवच है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मुकदमों में हारने वाले मुवक्किल या विरोधी पक्ष अपनी खुन्नस निकालने के लिए वकीलों को आपराधिक मामलों में नहीं घसीट सकते। वकीलों के आचरण पर नियंत्रण रखने के लिए कानून ने बार काउंसिल जैसी एक समर्पित वैधानिक संस्था बनाई है, और पुलिस को उस दायरे में दखल देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
light rain
30.8 ° C
30.8 °
30.8 °
69 %
1.9kmh
100 %
Fri
37 °
Sat
32 °
Sun
32 °
Mon
31 °
Tue
33 °

Recent Comments