Intimate Partners: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने समलैंगिक (Same-Sex) और लिव-इन जोड़ों के मौलिक अधिकारों और सुरक्षा को लेकर एक बेहद प्रगतिशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
लिव-इन पार्टनर या अंतर-जातीय जोड़ों को सुरक्षा देने का मामला
हाईकोर्ट के जस्टिस एच. एस. ग्रेवाल ने पटियाला (पंजाब) के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को निर्देश दिया कि वे दो वयस्क महिलाओं (जो लिव-इन रिलेशनशिप में हैं) की याचिका पर तुरंत कार्रवाई करें और उनके परिवारों से मिल रही धमकियों के खिलाफ उन्हें तत्काल सुरक्षा प्रदान करें। अदालत ने स्पष्ट किया है कि LGBTQ+ समुदाय, लिव-इन पार्टनर या अंतर-जातीय जोड़ों को तत्काल पुलिस सुरक्षा पाने के लिए यह साबित करने की आवश्यकता नहीं है कि उनकी जान को ‘गंभीर खतरा’ है।
अदालत का मुख्य कानूनी सिद्धांत: जोखिम स्तर जांचने से पहले सुरक्षा
हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों में पारंपरिक प्रक्रिया (जहां पहले पुलिस या कोर्ट खतरे के स्तर की जांच करती है) का पालन करने से देरी हो सकती है, जो जोड़े के जीवन के अधिकार के लिए घातक हो सकती है।
सामाजिक कलंक (Social Stigma) को स्वीकार करना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए जस्टिस ग्रेवाल ने अपने आदेश में कहा, अदालतों को यह स्वीकार करना होगा कि कुछ अंतरंग साथियों (Intimate Partners) को उनके रिश्ते के कारण गंभीर सामाजिक कलंक और विरोध का सामना करना पड़ता है। इसलिए, जब कोई समलैंगिक, ट्रांसजेंडर, अंतर-धार्मिक या अंतर-जातीय जोड़ा सुरक्षा के लिए अदालत आता है, तो खतरे के स्तर (Threshold Risk) की विस्तृत जांच करने से पहले ही उन्हें अंतरिम उपाय (Ad-interim measure) के रूप में तुरंत पुलिस सुरक्षा दी जानी चाहिए।
तटस्थ रुख (Neutral Approach) मौलिक अधिकारों के खिलाफ: अदालत ने माना कि ऐसे संवेदनशील मामलों में कानून का पारंपरिक या ‘तटस्थ’ रुख अपनाना (कि जब तक सीधे हमले का सबूत न हो, सुरक्षा न दी जाए) इन जोड़ों की बुनियादी स्वतंत्रता और गरिमा को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का आधार
हाई कोर्ट ने अपने फैसले को मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध मामले देवू जी. नायर बनाम केरल राज्य (Devu G Nair vs State of Kerala) का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने LGBTQ+ समुदाय और उनके जीवन साथी के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक गाइडलाइंस जारी की थीं।
- तत्काल अंतरिम राहत: सुरक्षा याचिकाओं पर बिना देरी किए तत्काल अंतरिम सुरक्षा आदेश पारित किए जाएं।
- गोपनीयता और गरिमा: सुरक्षा प्रदान करते समय पुलिस या प्रशासन द्वारा जोड़े की गोपनीयता (Privacy) और सम्मान का पूरा ध्यान रखा जाए।
- संवेदनशीलता: ऐसे जोड़ों से निपटने के दौरान पुलिस तंत्र को संवेदनशील और गैर-भेदभावपूर्ण रवैया अपनाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि और तथ्य (The Case in Context)
याचिकाकर्ताओं की दलील: एडवोकेट राहुल सोई ने अदालत को बताया कि दोनों याचिकाकर्ता वयस्क महिलाएं हैं और पटियाला में अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही हैं। उनके परिवार इस रिश्ते के सख्त खिलाफ हैं और उन्हें लगातार धमकियां दे रहे हैं। उन्होंने पटियाला एसएसपी से सुरक्षा मांगी थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
हाई कोर्ट का आदेश: हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के रिश्ते की वैधता या सामाजिक नैतिकता पर कोई टिप्पणी किए बिना (Without expressing opinion on legality), साफ तौर पर उनके ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ (अनुच्छेद 21) की रक्षा के लिए पटियाला एसएसपी को निर्देश जारी किए।
ऐसा ही एक और हालिया फैसला (Khanna, Ludhiana Case)
हाई कोर्ट ने इसी तर्ज पर हाल ही में दिए गए एक अन्य फैसले का भी जिक्र किया, जहां जस्टिस मनदीप पन्नू की पीठ ने खन्ना (लुधियाना) की दो समलैंगिक महिलाओं को सुरक्षा दी थी। उस मामले में, अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद पहचान दस्तावेजों से यह सत्यापित किया कि दोनों महिलाएं वयस्क (Major) हैं। कोर्ट ने एसएसपी खन्ना को उनकी जान-माल की रक्षा सुनिश्चित करने का आदेश देते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी बात जोड़ी थी। कहा, वयस्क होने के नाते इन्हें सुरक्षा दी जा रही है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अदालत इनके रिश्ते की कानूनी वैधता पर कोई अंतिम मुहर लगा रही है। यदि ये किसी संज्ञेय अपराध (Cognisable Offence) में संलिप्त पाई जाती हैं, तो यह सुरक्षा इन्हें आपराधिक कार्रवाई या गिरफ्तारी से कोई छूट नहीं देगी।
केस मैट्रिक्स (Key Principles at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | अदालत का नया दृष्टिकोण |
| सुरक्षा का आधार | संविधान का अनुच्छेद 21 (जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) |
| खतरे का प्रमाण | तत्काल अंतरिम सुरक्षा के लिए खतरे का कोई ‘गंभीर या प्रत्यक्ष प्रमाण’ देना अनिवार्य नहीं है। |
| लागू श्रेणियां | समलैंगिक (LGBTQ+), ट्रांसजेंडर, लिव-इन, अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय जोड़े। |
| अदालत का स्पष्टीकरण | पुलिस सुरक्षा देने का अर्थ रिश्ते को विवाह या कानूनी मान्यता देना नहीं, बल्कि नागरिक के जीवन की रक्षा करना है। |
निष्कर्ष (Takeaway)
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का यह दृष्टिकोण सुरक्षा याचिकाओं को देखने के नजरिए में एक बड़ा बदलाव है। अदालत ने साफ कर दिया है कि जब मामला किसी नागरिक की जान पर मंडराते खतरे का हो, तो प्रशासनिक और कानूनी औपचारिकताएं पूरी होने का इंतजार नहीं किया जा सकता। ‘सुरक्षा पहले, जांच बाद में’ का यह सिद्धांत लीक से हटकर रहने वाले जोड़ों को सामाजिक हिंसा (Honor Crimes) से बचाने में मील का पत्थर साबित होगा।

