Hostile Witness: सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार (Corruption) के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘मुकर जाने वाले गवाहों’ (Hostile Witnesses) को लेकर कानून की स्थिति स्पष्ट की है।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष |
| मुख्य सिद्धांत | गवाह के ‘होस्टाइल’ होने मात्र से केस खत्म नहीं होता। |
| अदालत का कर्तव्य | गवाही के विरोधाभासों के बीच से “सच्चाई” चुनना। |
| स्वतंत्र गवाह (PW2) | कोर्ट ने नोट किया कि स्वतंत्र गवाह की गवाही को बचाव पक्ष हिला भी नहीं सका। |
| नतीजा | हाई कोर्ट द्वारा दी गई ‘बरी’ (Acquittal) रद्द; ट्रायल कोर्ट की ‘सजा’ (Conviction) बहाल। |
तालुका आपूर्ति अधिकारी को रिश्वत मामले में बरी को किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने एक तालुका आपूर्ति अधिकारी (TSO) को रिश्वत के मामले में बरी करने के हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता का मुकर जाना अपने आप में बरी होने का आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई गवाह मुकर जाता है, तो उसकी पूरी गवाही को कूड़ेदान में नहीं फेंका जा सकता; बल्कि कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह उसकी गवाही में से “भरोसेमंद” (Creditworthy) हिस्सों की पहचान करे।
मामला क्या था? (The ₹500 Bribe Trap)
- आरोप: एक सरकारी अधिकारी (TSO) ने एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए ₹500 की रिश्वत मांगी थी।
- विजिलेंस ट्रैप: शिकायतकर्ता ने पैसे देने के बजाय विजिलेंस विभाग से संपर्क किया। विभाग ने ‘रंगे हाथों’ पकड़ने के लिए जाल बिछाया (Trap Raid)। गवाहों की मौजूदगी में अधिकारी को चिह्नित नोटों के साथ पकड़ा गया।
- मोड़: ट्रायल के दौरान, मुख्य गवाह (PW1 – शिकायतकर्ता) ‘होस्टाइल’ (मुकर गया) हो गया और बचाव पक्ष के हर सुझाव को स्वीकार करने लगा। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने उसे बरी कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: दूध से मलाई निकालने जैसा काम
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट का काम गवाही की बारीकी से जांच करना है।
- पूरी गवाही रद्द नहीं: कानून का सिद्धांत है कि किसी गवाह की पूरी गवाही को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने कुछ विरोधाभासी बातें कही हैं।
- भरोसेमंद हिस्सा (Creditworthy Portion): जज को पूरी गवाही पढ़नी चाहिए और सावधानी के साथ उस हिस्से को स्वीकार करना चाहिए जो अन्य सबूतों (जैसे स्वतंत्र गवाह या जब्त नोट) के साथ मेल खाता हो।
- जस्टिस चंद्रन की टिप्पणी: “गवाह की गवाही विरोधाभासों से भरी हो सकती है, लेकिन यह अदालत की जिम्मेदारी है कि वह उसमें से भरोसेमंद हिस्सा खोजे, जैसा कि ट्रायल कोर्ट ने किया था।
नीरज दत्ता केस के गलत इस्तेमाल पर स्पष्टीकरण
- हाई कोर्ट ने नीरज दत्ता बनाम दिल्ली राज्य मामले का हवाला देकर आरोपी को बरी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह संदर्भ गलत था।
- कोर्ट ने सत पाल बनाम दिल्ली प्रशासन (1976) का हवाला देते हुए कहा कि यदि गवाह का चरित्र पूरी तरह से नहीं डगमगाया है, तो उसके ‘विश्वसनीय’ बयानों पर कार्रवाई की जा सकती है।
- इस मामले में, PW1 ने अपनी गवाही के कुछ हिस्सों में ‘रिश्वत की मांग’ की बात स्वीकार की थी, जिसे हाई कोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन भ्रष्ट अधिकारियों के लिए बड़ा झटका है जो गवाहों को डराकर या प्रभावित करके ‘होस्टाइल’ करा देते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर ‘मांग और स्वीकृति’ (Demand and Acceptance) अन्य सबूतों से साबित होती है, तो गवाह के पलटने से अपराधी बच नहीं पाएगा।

