Saturday, October 17, 2026
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Varanasi Court Verdict: धनंजय सिंह पर हमले के 24 साल पुराने मामले में आया फैसला…चर्चित केस के बारे में सभी कुछ यहां पढ़ें

Varanasi Court Verdict: वाराणसी की एक विशेष MP-MLA कोर्ट ने 24 साल पुराने बहुचर्चित ‘नदेसर शूटआउट’ मामले में अपना फैसला सुनाया है।

विशेष न्यायाधीश यजुर्वेंद्र विक्रम सिंह ने बुधवार को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश करने में विफल रहा। अदालत ने ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने पूर्व सांसद धनंजय सिंह पर हुए हमले के मामले में अयोध्या के विधायक अभय सिंह और MLC विनीत सिंह सहित सभी 6 आरोपियों को बरी कर दिया है।

क्या था 2002 का वह ‘शूटआउट’? (The Incident)

  • तारीख: यह घटना 4 अक्टूबर, 2002 को वाराणसी के नदेसर इलाके में हुई थी।
  • हमला: तत्कालीन विधायक धनंजय सिंह वाराणसी से जौनपुर लौट रहे थे। आरोप था कि ‘टकसाल सिनेमा’ के पास आरोपियों ने उनकी कार को घेर लिया और जान से मारने की नियत से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
  • जवाबी कार्रवाई: धनंजय सिंह के गनर वासुदेव पांडेय ने आत्मरक्षा में गोलियां चलाईं। पुलिस के पहुँचने पर हमलावर मौके से फरार हो गए थे। इस हमले में धनंजय सिंह, उनके गनर और ड्राइवर दिनेश कुमार गुप्ता घायल हुए थे।

बरी होने वाले मुख्य चेहरे (Who were Acquitted?)

  • अदालत ने 6 व्यक्तियों को आरोपों से मुक्त कर दिया है।
  • अभय सिंह: अयोध्या (गोशाईगंज) से विधायक। (2022 में सपा से चुने गए, 2025 में पार्टी से निष्कासित)।
  • विनीत सिंह: वर्तमान MLC।
  • संजय सिंह रघुवंशी, सत्येंद्र उर्फ बबलू सिंह, संदीप सिंह उर्फ पप्पू, विनोद सिंह।

कानूनी प्रक्रिया का लंबा सफर (24 Years of Trial)

  • FIR और चार्जशीट: घटना के तुरंत बाद कैंट थाने में नामजद FIR दर्ज की गई थी। पुलिस ने 14 दिसंबर, 2002 को चार्जशीट दाखिल की थी।
  • कोर्ट का निष्कर्ष: दो दशक से ज्यादा चले इस ट्रायल के बाद कोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं हैं।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मुख्य आदेशसभी 6 आरोपी ‘बेगुनाह’ करार देते हुए बरी।
आधारसबूतों की कमी (Insufficient Evidence)।
घटना स्थलनदेसर इलाका, वाराणसी (2002)।
राजनीतिक प्रभावउत्तर प्रदेश की राजनीति के दो बाहुबली गुटों के बीच का यह विवाद दशकों तक चर्चा में रहा।

एक लंबे कानूनी अध्याय का अंत

यह मामला उत्तर प्रदेश की ‘गैंगवार’ और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा रहा है। 24 साल बाद आए इस फैसले ने जहां आरोपियों को कानूनी राहत दी है, वहीं यह भी दर्शाता है कि पुराने मामलों में प्रत्यक्ष साक्ष्यों और गवाहों की कमी अक्सर अभियोजन के पक्ष को कमजोर कर देती है।

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