Sunday, October 18, 2026
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Banking Alert: बैंक की लापरवाही से चेक की समय सीमा समाप्त हुई तो…यह रहेगी बैंक की सेवा में कमी, कैसे समझें

Banking Alert: सुप्रीम कोर्ट ने बैंकिंग सेवाओं और ग्राहकों के अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुसुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष
बैंक की भूमिकाग्राहक के लिए एक ‘एजेंट’ (Agent) के समान।
लापरवाही का आधारकार्य दिवस होने के बावजूद चेक पेश न करना।
हड़ताल का प्रभावहड़ताल की अवधि के लिए छूट मिली, लेकिन उसके बाद की देरी ‘अक्षम्य’ है।
कानूनी संदेशबैंक अपनी तकनीकी विफलताओं का बहाना बनाकर ग्राहक का अधिकार नहीं छीन सकते।

बैंक अपने ग्राहकों के लिए एक एजेंट

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी.वी. नागरथ्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा कि अगर बैंक ग्राहकों द्वारा जमा किए गए चेक को उनकी वैधता अवधि (Validity Period) के भीतर क्लियरिंग के लिए नहीं भेजता है, तो यह उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बैंक अपने ग्राहकों के लिए एक ‘एजेंट’ के रूप में कार्य करते हैं और यह उनकी ‘वैधानिक जिम्मेदारी’ (Statutory Obligation) है कि वे चेक के ‘स्टेल’ (Stale – समय सीमा समाप्त) होने से पहले उसे कलेक्शन के लिए प्रस्तुत करें।

मामला क्या था? (The Dispute History)

  • घटना: मई 2018 में कविता चौधरी ने केनरा बैंक में ₹1.06 करोड़ के दो चेक जमा किए।
  • डेडलाइन: चेक की तारीख 3 मार्च 2018 थी, जिसका अर्थ था कि वे 2 जून 2018 को एक्सपायर होने वाले थे।
  • लापरवाही: बैंक में 30 और 31 मई को हड़ताल थी। कोर्ट ने हड़ताल की देरी को तो माफ कर दिया, लेकिन पाया कि बैंक ने 1 और 2 जून (जो कामकाजी दिन थे) को भी चेक पेश नहीं किए। जब बैंक ने प्रोसेसिंग शुरू की, तब तक चेक ‘स्टेल’ हो चुके थे और खारिज कर दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट के कड़े निष्कर्ष: एजेंट की तरह है बैंक

  • अदालत ने बैंक की दलीलों को खारिज करते हुए कुछ बुनियादी सिद्धांत तय किए।
  • ड्यू डिलिजेंस (सक्रियता): बैंक की जिम्मेदारी है कि वह पूरी सावधानी बरते। यदि बैंक के पास कोई उचित कारण नहीं है और चेक उसकी वजह से बेकार हो जाता है, तो यह बैंकिंग कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही है।
  • कानूनी अधिकार का हनन: बैंक ने तर्क दिया था कि चेक जारी करने वाली कंपनी दिवालिया (Liquidation) हो चुकी है, इसलिए पैसे वैसे भी नहीं मिलते।
  • कोर्ट का जवाब: कोर्ट ने कहा कि अगर बैंक समय पर चेक लगाता और वह बाउंस होता, तो ग्राहक को Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत कंपनी के डायरेक्टर्स पर केस करने का हक मिलता। बैंक की देरी ने ग्राहक के इस कानूनी अधिकार को “शुरुआत में ही कुचल दिया” (Nipped in the bud)।

हर्जाने (Compensation) में बदलाव

  • अदालत ने बैंक की लापरवाही तो मानी, लेकिन मुआवजे की राशि में संशोधन किया।
  • NCDRC का आदेश: राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने चेक राशि का 10% और 8% ब्याज देने का आदेश दिया था।
  • SC का नया आदेश: कोर्ट ने कहा कि वास्तविक नुकसान का सटीक अंदाजा लगाना मुश्किल है क्योंकि कंपनी दिवालिया है। इसलिए मुआवजे को घटाकर चेक की मूल राशि का 6% कर दिया गया, साथ ही शिकायत दर्ज करने की तारीख से 6% वार्षिक ब्याज भी देना होगा। इसके अलावा ₹50,000 कानूनी खर्च (Litigation cost) के रूप में देने होंगे।

ग्राहकों के लिए बड़ी राहत

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बैंकों को अपनी कार्यप्रणाली के प्रति अधिक जवाबदेह बनाता है। यह सुनिश्चित करता है कि ग्राहकों की मेहनत की कमाई केवल इसलिए बेकार न चली जाए क्योंकि बैंक के कर्मचारी या सिस्टम ने समय पर अपना काम नहीं किया।

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