Wednesday, September 9, 2026
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Child Rights First: पिता का अत्ता-पत्ता नहीं तो क्या हुआ… बच्चे का भविष्य दांव पर नहीं लग सकता, यह है केस

Child Rights First: सुप्रीम कोर्ट ने एक मानवीय और दूरगामी फैसला सुनाते हुए दिल्ली सरकार को एक ऐसे बच्चे की देखभाल करने का निर्देश दिया है जिसके पितृत्व (Paternity) को लेकर विवाद था।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने ‘महिला एवं बाल विकास विभाग’ (WCD), दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह बच्चे की शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उठाए। कोर्ट ने कहा कि भले ही कानूनी रूप से पिता की जिम्मेदारी तय न हो पाई हो, लेकिन एक बच्चे के कल्याण और उसके न्यूनतम जीवन स्तर को सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है।

मामला क्या था? (The Legal Timeline)

  • पृष्ठभूमि: एक महिला एक व्यक्ति के घर घरेलू सहायिका के रूप में कार्यरत थी। महिला का आरोप है कि शादी के झांसे में आकर उनके बीच संबंध बने और मार्च 2016 में उन्होंने शादी कर ली। बाद में एक बच्ची का जन्म हुआ।
  • विवाद: संबंध बिगड़ने पर महिला ने घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) के तहत ₹25,000 प्रति माह गुजारा भत्ता माँगा।
  • DNA टेस्ट: पति ने पितृत्व को चुनौती देते हुए DNA टेस्ट की मांग की। टेस्ट रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि वह व्यक्ति बच्ची का जैविक पिता (Biological Father) नहीं है।
  • हाई कोर्ट का फैसला: दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि चूंकि DNA रिपोर्ट रिकॉर्ड पर है, इसलिए बच्ची भरण-पोषण की हकदार नहीं है। हालांकि, महिला के गुजारा भत्ता मामले को फिर से विचार के लिए निचली अदालत भेज दिया गया।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 (Section 112 of Evidence Act)

  • कानून क्या है? धारा 112 कहती है कि यदि किसी बच्चे का जन्म शादी के दौरान होता है, तो वह ‘वैध’ (Legitimate) माना जाता है। इसे “Legitimacy की धारणा” कहा जाता है।
  • कोर्ट का निष्कर्ष: हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 112 का संरक्षण केवल तब तक मिलता है जब तक कोई वैज्ञानिक सबूत (जैसे DNA) मौजूद न हो। एक बार जब DNA टेस्ट से साबित हो जाए कि व्यक्ति पिता नहीं है, तो कानून उसे भरण-पोषण के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट का ‘Parens Patriae’ रुख

  • सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पिता की पहचान न होने से बच्ची का भविष्य अंधकार में नहीं जाना चाहिए।
  • दिल्ली सरकार को निर्देश: कोर्ट ने WCD सचिव को निर्देश दिया कि वे एक अनुभवी अधिकारी को बच्ची के घर भेजें।
  • कल्याण की जांच: यह अधिकारी सुनिश्चित करेगा कि बच्ची को सही पोषण (Nutrition), शिक्षा (Education) और स्वास्थ्य (Health) सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं।
  • उपचारात्मक उपाय (Remedial Measures): जहाँ भी बच्ची की स्थिति में कमी पाई जाएगी, सरकार को तुरंत हस्तक्षेप कर सुधार करना होगा ताकि बच्ची का जीवन स्तर बेहतर बना रहे।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
बच्ची का हकजैविक पिता न होने के कारण कानूनी रूप से भरण-पोषण से इनकार, लेकिन राज्य द्वारा संरक्षण मंजूर।
DNA की भूमिकाधारा 112 की धारणा को DNA रिपोर्ट से काटा जा सकता है।
राज्य का दायित्वदिल्ली सरकार की जिम्मेदारी तय की गई कि वह बच्ची के बुनियादी जरूरतों को पूरा करे।
महिला का केसमहिला के अंतरिम भरण-पोषण पर ट्रायल कोर्ट फिर से विचार करेगी।

कानून और मानवता का संतुलन

यह फैसला एक नजीर है कि कैसे अदालतें कानून की तकनीकी बारीकियों (जैसे DNA रिपोर्ट) का सम्मान करते हुए भी मानवीय आधार पर न्याय सुनिश्चित कर सकती हैं। कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि पितृत्व विवादों की कानूनी लड़ाई में किसी बच्चे का बचपन और उसकी बुनियादी जरूरतें नहीं पिसनी चाहिए।

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