Wednesday, June 10, 2026
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Medical Negligence: यरवडा मानसिक अस्पताल में मरीज की हत्या…पता है वहां पर 72 मरीजों पर सिर्फ 3 वार्ड बॉय हैं, घोर लापरवाही का केस पढ़िए

Medical Negligence: बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य द्वारा संचालित मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों में सुरक्षा और बदहाली को लेकर एक बेहद कड़ा और संवेदनशील फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की खंडपीठ ने मृतक की विधवा और दो बच्चों के मौलिक अधिकारों के हनन की बात स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को ₹22 लाख का मुआवजा (Compensation) देने का आदेश दिया है। यह राशि लोकायुक्त के आदेश पर पहले दी गई ₹1 लाख की अनुग्रह राशि के अतिरिक्त होगी। अदालत ने पुणे के प्रसिद्ध यरवडा मानसिक अस्पताल (Yerwada Mental Hospital) में एक मरीज की दूसरे हिंसक मरीज द्वारा पीट-पीटकर की गई हत्या के मामले में महाराष्ट्र सरकार को पूरी तरह जिम्मेदार और दोषी ठहराया है।

यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने अस्पताल प्रशासन की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी टिप्पणी में कहा, यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि रात के समय अस्पताल के वार्ड में अटेंडेंट्स (कर्मचारियों) की संख्या बेहद कम और अपर्याप्त थी, जो कि मानसिक अस्पताल में मरीजों के लिए तय ‘न्यूनतम सुविधाओं’ के नियमों का खुला उल्लंघन है। इस पैमाने पर ही यह साफ हो जाता है कि प्रतिवादी-राज्य यरवडा मानसिक अस्पताल में मरीजों की पर्याप्त देखभाल करने के अपने कर्तव्य में पूरी तरह विफल रहा।

क्या था पूरा मामला? (72 मानसिक मरीजों के भरोसे सिर्फ 3 अटेंडेंट)

हिंसक हमला: यह खौफनाक घटना 20 नवंबर 2013 की रात को यरवडा मानसिक अस्पताल के ऑब्जर्वेशन वार्ड में घटी थी। पेशे से रियल एस्टेट एजेंट (जमीन कारोबारी) रहे एक मरीज को उसी के वार्ड में भर्ती एक अन्य अत्यधिक हिंसक और आक्रामक मरीज (दीपक सुरावसे) ने रात में पीट-पीटकर मार डाला था। इस हिंसक हमले में कुल दो मरीजों की जान गई थी।

अस्पताल की दलील खारिज: अस्पताल प्रशासन ने कोर्ट में दलील दी थी कि उनकी ओर से कोई लापरवाही नहीं हुई। लेकिन हाई कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब प्रशासन को पता था कि दीपक सुरावसे एक हिंसक और आक्रामक प्रवृत्ति का मरीज है, तो उसे सामान्य मरीजों से अलग (Segregate) क्यों नहीं रखा गया? यह अस्पताल के अधिकारियों की बुनियादी जिम्मेदारी थी।

विश्लेषण: नियमों का उल्लंघन और मुआवजे का गणित

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी कस्टडी/अस्पताल में किसी नागरिक की जान जाना सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन है, जिसके लिए सार्वजनिक कानून के तहत वित्तीय मुआवजा देना अनिवार्य है।

कानूनी पैमाना और नियमवास्तविक स्थिति (यरवडा अस्पताल)हाई कोर्ट का निष्कर्ष व आदेश
स्टेट मेंटल हेल्थ रूल्स, 1990नियमों के मुताबिक हर 5 मरीजों पर 1 अटेंडेंट होना अनिवार्य है।वार्ड में 72 मरीज भर्ती थे, लेकिन ड्यूटी पर सिर्फ 3 अटेंडेंट थे। नियम के हिसाब से कम से कम 14-15 कर्मचारी होने चाहिए थे। यह घोर लापरवाही (Gross Negligence) है।
सरकारी मुआवजा नीतिमहाराष्ट्र सरकार के नियमों के मुताबिक कस्टोडियल डेथ पर ₹5 लाख और सामान्य मामलों में ₹2 लाख का प्रावधान है।कोर्ट ने सरकारी नीति को “बेहद कम और अपर्याप्त” बताया और मोटर एक्सीडेंट क्लेम के फॉर्मूले के आधार पर मुआवजा तय किया।
मु मुआवजे का निर्धारण (₹22 लाख)मृतक के इनकम टैक्स रिटर्न के आधार पर वित्तीय नुकसान ₹17 लाख आंका गया।कोर्ट ने ₹5 लाख अतिरिक्त जोड़े क्योंकि मृतक का बेटा 90% स्थायी मानसिक विकलांगता से पीड़ित है और मृतक ही परिवार का एकमात्र कमाने वाला था।

देरी करने पर लगेगा 9% का सालाना ब्याज

बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को सख्त निर्देश दिया है कि मुआवजे की यह ₹22 लाख की पूरी राशि 8 सप्ताह (दो महीने) के भीतर याचिकाकर्ता (विधवा) को ट्रांसफर की जाए। यदि राज्य सरकार इस समय-सीमा के भीतर भुगतान करने में विफल रहती है, तो उसे इस राशि पर 9% की वार्षिक दर से ब्याज (Interest) भी देना होगा।

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